Last Updated:
कारगिल युद्ध में टाइगर हिल की लड़ाई भारतीय सेना के साहस, रणनीति और अदम्य हौसले की सबसे बड़ी मिसाल मानी जाती है. टोलोलिंग पर जीत के बाद सेना ने 16,500 फीट ऊंची टाइगर हिल पर कब्जा करने के लिए कई दिशाओं से ऑपरेशन शुरू किया. लेफ्टिनेंट बलवान सिंह, ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव, कैप्टन सचिन निम्बालकर समेत कई जांबाजों ने असाधारण वीरता दिखाई. लगातार आर्टिलरी फायर, कठिन चढ़ाई और आमने-सामने की लड़ाई के बाद भारतीय सेना ने टाइगर हिल पर तिरंगा फहराकर कारगिल युद्ध का रुख बदल दिया था.
टाइगर हिल में भारतीय सेना की अद्भुत जीत.
टोलोलिंग पर जीत मिलने के बाद भारतीय सेना का अगला सबसे बड़ा टारगेट टाइगर हिल था. करीब 16,500 फीट ऊंची यह चोटी द्रास की सबसे ऊंची पहाड़ियों में एक थी. टाइगर हिल पर जिसका भी कब्जा होता, पूरे इलाके में उसकी पकड़ खुद-ब-खुद बन जाती. इसलिए अब असली और सबसे कठिन लड़ाई यहीं लड़ी जानी थी.
ब्रिगेडियर एमपीएस बाजवा को 192 माउंटेन ब्रिगेड के साथ द्रास पहुंचने का आदेश मिला. उनके कमांड में 8 सिख, 18 ग्रेनेडियर्स, 13 जैक रिफ और 2 नागा यूनिट्स थीं. दुश्मन को चारों तरफ से घेरने के लिए तीन अलग-अलग दिशाओं से अटैक करने की प्लानिंग की गई. हर सैनिक जानता था कि यह मिशन आसान नहीं होगा.
Add News18 as
Preferred Source on Google
3 जुलाई को 18 ग्रेनेडियर्स के जवान टाइगर हिल की ओर बढ़े. लेकिन खराब मौसम, बर्फ और बेहद कठिन रास्तों ने उनकी रफ्तार काफी धीमी कर दी. हर कदम खतरे से भरा था, फिर भी भारतीय जांबाज बिना रुके आगे बढ़ते रहे. उनका सपना सिर्फ टाइगर हिल पर तिरंगा फहराना था.
लेफ्टिनेंट बलवान सिंह की अगुवाई में कमांडो प्लाटून खामोशी के साथ आगे बढ़ती रही और टाइगर हिल की चोटी के बेहद करीब पहुंच गई. लेकिन तभी दुश्मन से आमने-सामने की जबरदस्त हैंड-टू-हैंड फाइट शुरू हो गई. भारतीय जांबाजों ने पूरी ताकत से मुकाबला किया, लेकिन लगातार हमलों के कारण उन्हें धीरे-धीरे पीछे हटना पड़ा.
पीछे हटने के बाद लेफ्टिनेंट बलवान सिंह और उनकी प्लाटून डी कंपनी की उस पोजीशन तक पहुंचे, जो टाइगर हिल की चोटी से सिर्फ 30 मीटर दूर थी. जीत अब बिल्कुल सामने दिखाई दे रही थी. भारतीय जांबाज थके जरूर थे, लेकिन उनका हौसला अभी भी बुलंद था.
04 और 05 जुलाई की रात फायर बेस को आगे बढ़ाकर टाइगर हिल टॉप के बिल्कुल पास लाया गया. इन सभी को सी कंपनी के कर्नल मिजार के नेतृत्व में लाया गया था. पूरी तैयारी के बाद भारतीय सेना ने आखिरी और सबसे अहम कदम उठाने का फैसला किया.
कैप्टन निम्बालकर अपनी डी कंपनी और कमांडो प्लाटून के साथ बिना किसी आवाज के पहाड़ी पर चढ़ते रहे. यह स्टेल्थ मूव पूरी तरह सफल रहा. आखिरकार भारतीय जांबाज टाइगर हिल की चोटी तक पहुंच गए. अब जीत बस कुछ ही पलों की दूरी पर थी.
4 जुलाई की कार्रवाई के दौरान ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव ने ऐसी वीरता दिखाई, जिसे पूरी दुनिया ने सलाम किया. उन्होंने दुश्मन के सामने असाधारण साहस का परिचय दिया. उनकी बहादुरी के लिए उन्हें देश का सर्वोच्च वीरता सम्मान परम वीर चक्र दिया गया.
भारतीय सेना ने जबरदस्त आर्टिलरी और मशीन गन फायर के साथ दुश्मन पर लगातार दबाव बनाया. 8 सिख और 18 ग्रेनेडियर्स ने मिलकर ऐसा हमला किया कि आखिरकार टाइगर हिल पर चल रहा ऑपरेशन पूरी तरह सफल हो गया. लंबे संघर्ष के बाद भारतीय सेना ने ऐतिहासिक विजय हासिल कर ली.
टाइगर हिल की इस कठिन लड़ाई में कई भारतीय जांबाजों ने अद्भुत साहस दिखाया. कुल दस सैनिकों को उनकी वीरता के लिए सम्मानित किया गया. ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव को परमवीर चक्र, लेफ्टिनेंट बलवान सिंह को महावीर चक्र, जबकि कैप्टन सचिन निम्बालकर और हवलदार मदन लाल (मरणोपरांत) को वीर चक्र से सम्मानित किया गया.

