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गर्मियों में कद्दूवर्गीय फसलों पर पाउडरी मिल्ड्यू का खतरा बढ़ गया है, जिससे पैदावार घटने की आशंका है. कृषि एक्सपर्ट का कहना है कि पत्तियों पर सफेद पाउडर दिखते ही सल्फर या ट्राइकोडर्मा का छिड़काव करना चाहिए. समय पर पहचान और उचित उपचार न केवल संक्रमण रोकता है, बल्कि फसल की गुणवत्ता और किसानों का मुनाफा भी बढ़ाता है.
शाहजहांपुर: गर्मियों के मौसम में कद्दूवर्गीय सब्जियों जैसे लौकी, तरोई, कद्दू और खीरे की खेती करने वाले किसानों के लिए इस समय पाउडरी मिल्ड्यू (Powdery Mildew) रोग एक बड़ी चुनौती बनकर आया है. यह रोग न केवल पौधों की ग्रोथ को रोकता है, बल्कि पैदावार को भी भारी नुकसान पहुंचाता है. कृषि एक्सपर्ट का कहना है कि समय रहते इसकी पहचान और उपचार न किया जाए तो पूरी फसल बर्बाद हो सकती है. अगर किसान समय रहते इसके लक्षणों को पहचान लें तो फसल को नुकसान होने से बचाया जा सकता है.
कृषि एक्सपर्ट डॉ. हादी हुसैन खान ने बताया कि पाउडरी मिल्ड्यू एक फफूंद जनित रोग है, जिसमें पत्तियों पर सफेद पाउडर सा दिखने लगता है. यह पाउडर प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को बाधित करता है, जिससे पौधे कमज़ोर हो जाते हैं. इसके नियंत्रण के लिए सल्फर 80% का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए. इसके अलावा, ओस के समय सल्फर का भुरकाव या ट्राइकोडर्मा का 5 ग्राम प्रति लीटर की दर से उपयोग भी किया जा सकता है. सल्फर न केवल फफूंदनाशक का काम करता है, बल्कि एक महत्वपूर्ण पोषक तत्व भी है.
पाउडरी मिल्ड्यू के प्रमुख लक्षण
पाउडरी मिल्ड्यू रोग की सबसे बड़ी पहचान ये है पत्तियों पर सफेद धब्बे दिखाई देने लगते हैं. शुरुआत में ये धब्बे छोटे होते हैं, लेकिन धीरे-धीरे पूरी पत्ती सफेद पाउडर से ढक जाती है. अगर आप पत्ती को छूकर देखेंगे, तो वह पाउडर आपके हाथों में भी लग सकता है. यह रोग मुख्य रूप से पत्तियों की ऊपरी सतह को प्रभावित करता है. इसके कारण पत्तियां पीली पड़कर सूखने लगती हैं, जिससे पौधे की भोजन बनाने की क्षमता खत्म हो जाती है और फल का विकास रुक जाता है.
सल्फर का बहुआयामी उपयोग
सल्फर खेती में दोहरी भूमिका निभाता है. यह एक बेहतरीन फफूंदनाशक होने के साथ-साथ पौधों के लिए एक जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्व भी है. जब इसका उपयोग पाउडरी मिल्ड्यू के खिलाफ किया जाता है, तो यह रोग को जड़ से खत्म करता है और साथ ही मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ाता है. तिलहनी फसलों में सल्फर के उपयोग से दानों में चमक आती है और तेल की मात्रा में भी इजाफा होता है, जो किसानों के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद है.
जैविक और रासायनिक नियंत्रण विधियां
रोग के प्रभावी नियंत्रण के लिए किसान दो तरीके अपनाएं. पहला रासायनिक उपचार के रूप में सल्फर 80% का छिड़काव सबसे बेहतर होता है. वहीं, जैविक खेती करने वाले किसान ट्राइकोडर्मा का इस्तेमाल कर सकते हैं. 5 ग्राम प्रति लीटर पानी में इसका घोल बनाकर छिड़काव करने से भी इस फफूंद को नियंत्रित किया जा सकता है. सुबह के समय जब पत्तियों पर ओस हो, तब सल्फर का भुरकाव करना भी एक पारंपरिक और असरदार तरीका माना जाता है.
फसल चक्र और प्रकाश संश्लेषण का महत्व
किसी भी फसल की ग्रोथ और उत्पादन उसकी पत्तियों के स्वास्थ्य पर निर्भर करती है. अगर पत्तियां पाउडरी मिल्ड्यू से ग्रस्त होंगी, तो प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की क्रिया प्रभावित होगी, जिससे उत्पादन में भारी गिरावट आती है. ऐसे में किसान नियमित रूप से अपने खेत का निरीक्षण करें. रोग के शुरुआती लक्षण दिखते ही उपचार शुरू कर देना चाहिए. उचित देखरेख और समय पर दवाओं के प्रयोग से कद्दूवर्गीय फसलों को रोगों से बचाकर बम्पर पैदावार ली जा सकती है.
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विवेक कुमार एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें मीडिया में 10 साल का अनुभव है. वर्तमान में न्यूज 18 हिंदी के साथ जुड़े हैं और हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की लोकल खबरों पर नजर रहती है. इसके अलावा इन्हें देश-…और पढ़ें

