नई दिल्ली: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत आ रहे हैं. कल यानी 4 दिसंबर से 5 दिसंबर तक भारत में रहेंगे. इस दौरान पीएम मोदी से न केवल मुलाकात होगी, बल्कि भारत और रूस के बीच कई डील होंगी. पुतिन की यात्रा से पहले यूरोप के तीन देशों ने भारत-रूस की दोस्ती वाले रंग में भंग डालने की कोशिश की है. पुतिन की यात्रा से ठीक पहले फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन के राजनयिकों ने एक संयुक्त लेख लिखा है. इसे अखबार में प्रकाशित किया गया है. इस लेख में तीनों देशों के राजनयिकों यानी राजदूतों ने पुतिन की आलोचना की है और उन पर यूक्रेन में शांति प्रयासों को बाधित करने का आरोप लगाया है. हालांकि, भारत ने भी उस लेख पर ऐतराज जताया है. भारत ने पुतिन की यात्रा से पहले फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन के राजदूतों के संयुक्त लेख असामान्य करार दिया है.
दरअसल, भारतीय अधिकारियों ने एक अंग्रेजी के एक प्रमुख समाचार पत्र टाइम्स ऑफ इंडिया में फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन के दूतों द्वारा संयुक्त रूप से लिखे गए लेख पर आपत्ति जताई. उन्होंने बताया कि पुतिन की भारत यात्रा के दौरान दोनों पक्ष भारतीय श्रमिकों के रूस में आवागमन को सुगम बनाने के लिए गतिशीलता संबंधी एक समझौते पर भी हस्ताक्षर कर सकते हैं. इसमें भारतीय श्रमिकों की भर्ती की शर्तों को भी स्पष्ट किया जाएगा. राष्ट्रपति पुतिन गुरुवार से भारत की दो दिवसीय यात्रा करेंगे और इस दौरान वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ वार्षिक शिखर वार्ता करेंगे. इस बैठक से व्यापार और रक्षा सहित कई क्षेत्रों में ऐसे महत्वपूर्ण परिणाम मिलने की उम्मीद है, जो द्विपक्षीय रणनीतिक संबंधों को और मजबूत करेंगे.
भारतीय विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की मानें तो मोदी-पुतिन वार्ता में यूक्रेन संघर्ष का मुद्दा उठने की संभावना है. उन्होंने भारत के दीर्घकालिक रुख को दोहराया कि युद्ध का समाधान युद्ध के मैदान में नहीं किया जा सकता तथा बातचीत और कूटनीति ही आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है. अधिकारियों ने कहा कि अमेरिका द्वारा संघर्ष को समाप्त करने के प्रयासों के संदर्भ में भारत किसी भी ऐसे कदम का समर्थन करता है, जो लड़ाई रोकने और स्थायी शांति की दिशा में ले जाए.
भारत ने आपत्ति जताई
अधिकारियों ने एक प्रमुख समाचार पत्र में फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन के दूतों द्वारा संयुक्त रूप से लिखे गए लेख का हवाला देते हुए इस पर आपत्ति जताई. इस लेख में राजदूतों ने पुतिन की आलोचना की है और उन पर यूक्रेन में शांति प्रयासों को बाधित करने का आरोप लगाया है. अधिकारियों ने कहा कि यह ‘असामान्य’ है और ‘कूटनीतिक दृष्टि से स्वीकार्य चलन नहीं’ है. अधिकारियों ने कहा कि भारतीय निर्यात बढ़ाने के लिए प्रयास तेज कर दिए गए हैं, जिनमें आलू और अनार जैसे कृषि उत्पाद, समुद्री उत्पाद, प्रसंस्कृत खाद्य सामग्री और उपभोक्ता वस्तुएं शामिल हैं.
भारत-रूस के बीच क्या होगा?
समझा जाता है कि भारत का रूस को दवाइयों, कृषि, खाद्य उत्पादों और उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्रों में निर्यात उल्लेखनीय रूप से बढ़ने की संभावना है. यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है, जब नयी दिल्ली रूस के पक्ष में बढ़ते व्यापार घाटे को लेकर चिंतित है. भारत द्वारा रूस से प्रतिवर्ष लगभग 65 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के सामान एवं सेवाएं खरीदी जाती हैं, जबकि रूस का भारत से आयात लगभग पांच अरब अमेरिकी डॉलर है. अधिकारियों ने बताया कि भारत उर्वरक क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है. रूस हर साल भारत को 30 से 40 लाख टन उर्वरक आपूर्ति करता है. उन्होंने बताया कि दोनों पक्ष व्यापार, शिक्षा, कृषि और संस्कृति जैसे क्षेत्रों में कई समझौतों पर हस्ताक्षर कर सकते हैं.
लेख किसने लिखा और इसमें क्या है?
चलिए जानते हैं कि इस लेख को किस-किसने मिलकर लिखा है और इसमें क्या है. एक अखबार में छपा यह लेख ब्रिटेन की हाई कमिश्नर लिंडी कैमरन, फ्रांसीसी राजदूत थिएरी माथू और जर्मन राजदूत फिलिप एकरमन की ओर से लिखा गया है. इस लेख का शीर्षक हिंदी में है- दुनिया चाहती है कि यूक्रेन युद्ध खत्म हो जाए, मगर रूस शांति को लेकर गंभीर नहीं लगता’. इस लेख में रूस पर युद्ध की शुरुआत करने का आरोप लगाया गया है और कहा गया कि रूस की सैन्य कार्रवाई पूर्ण क्रूरता के साथ युद्ध छेड़ने की सुनियोजित रणनीति है. आगे कहा गया है कि रूस साइबर हमलों और दुष्प्रचार के माध्यम से वैश्विक स्तर पर दुर्भावनापूर्ण गतिविधियों को अंजाम दे रहा है, जो यह दर्शाता है कि रूसी नेतृत्व की क्षेत्रीय विस्तार और वैश्विक अस्थिरता की लालसा यूक्रेन से कहीं आगे तक जाती है. लेख में आरोप है कि पुतिन शांति वार्ता में देरी करते हैं और गंभीर बातचीत से बचते हैं. इसमें पीएम मोदी का भी जिक्र किया गया है.

