कोलकाता. पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में एक मेडिकल छात्रा के साथ सामूहिक दुष्कर्म की कथित घटना के बाद सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच अपराजिता विधेयक के भविष्य को लेकर जुबानी जंग सोमवार को एक बार फिर शुरू हो गई. अपराजिता विधेयक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार की ओर से प्रस्तावित एक ऐसा कानून है, जिसका उद्देश्य पश्चिम बंगाल में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के लिए सजा को और कठोर बनाना है.
भाजपा ने दुर्गापुर ‘सामूहिक बलात्कार’ मामले को लेकर ममता सरकार पर राज्य में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने में ‘पूरी तरह से विफल’ रहने का आरोप लगाया. वहीं, तृणमूल कांग्रेस ने पलटवार करते हुए दावा किया कि केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार अपराजिता विधेयक को ‘लटकाकर’ इसे कानून की शक्ल लेने से रोक रही है.
ओडिशा के बालासोर जिले की रहने वाली 23 वर्षीय छात्रा के साथ शुक्रवार रात कथित तौर पर सामूहिक बलात्कार किया गया था, जब वह अपने एक मित्र के साथ रात का खाना खाने के लिए निजी मेडिकल कॉलेज के बाहर गई थी. ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी के कार्यालय ने सोशल मीडिया पर एक अपील पोस्ट की, जिसमें ममता से दोषियों के लिए ‘कड़ी सजा’ सुनिश्चित करने का आग्रह किया गया.
हालांकि, ममता ने पोस्ट पर सीधे जवाब देने से परहेज किया, लेकिन तृणमूल नेतृत्व ने अपराजिता (महिला एवं बाल संरक्षण) विधेयक 2025 पर बहस फिर से छेड़ दी और दावा किया कि अगर केंद्र ने इसे रोका न होता, तो यह एक मजबूत निवारक के रूप में काम कर सकता था.
तृणमूल नेता अरूप चक्रवर्ती ने ‘पीटीआई’ से कहा, “हमारी सरकार ने अपना कर्तव्य निभाया. हमने विधानसभा में सभी दलों की सहमति से अपराजिता विधेयक पारित किया. उस समय भाजपा ने भी इसका समर्थन किया था. लेकिन केंद्र सरकार और राज्यपाल ने इसे ‘राजनीतिक बंधक’ बना दिया है.”
क्या है अपराजिता विधेयक?
अपराजिता विधेयक को सितंबर 2024 में पश्चिम बंगाल विधानसभा के विशेष सत्र में ममता की मौजूदगी में सर्वसम्मति से पारित किया गया था. यह विधेयक अगस्त 2024 में कोलकाता के सरकारी आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में एक प्रशिक्षु महिला चिकित्सक के बलात्कार-हत्या की घटना के बाद देशभर में भड़के आक्रोश के बाद पेश किया गया था. इसमें महिलाओं और बच्चों के साथ बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराधों के लिए मृत्युदंड और बिना किसी छूट के आजीवन कारावास सहित कठोर सजा का प्रावधान किया गया है.
हालांकि, राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने अपराजिता विधेयक को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी के लिए भेजा, जिसके बाद यह संवैधानिक गतिरोध में फंस गया. इस साल जुलाई में केंद्र सरकार ने स्पष्टीकरण मांगते हुए विधेयक को राज भवन को लौटा दिया, जिसे बाद में राज्य सरकार के पास भेज दिया गया. राज भवन के सूत्रों के मुताबिक, केंद्र ने अपराजिता विधेयक में प्रस्तावित कुछ प्रावधानों पर ‘गंभीर आपत्ति’ जताई है, जिनके जरिये भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के कई प्रावधानों को बदलने का प्रयास किया गया है.
राज भवन के एक अधिकारी ने जुलाई में कहा था, “केंद्र ने पाया कि विधेयक में बलात्कार और उससे संबंधित अपराधों के लिए प्रस्तावित दंड अत्यधिक कठोर और बीएनएस के तहत निर्धारित सजा के अनुपात में नहीं है.” उन्होंने कहा, “केंद्र ने पूछा है कि जब ऐसे अपराधों से निपटने के लिए पहले से ही एक व्यापक राष्ट्रीय कानून मौजूद है, तो राज्य में नये कानून की आवश्यकता क्यों है.”
कानून के जानकारों का कहना है कि मामला अब अधर में लटक गया है और राज्य सरकार जब तक केंद्र की ओर से उठाई गई संवैधानिक एवं कानूनी चिंताओं का संतोषजनक समाधान नहीं करती, तब तक विधेयक आगे नहीं बढ़ सकता. विशेषज्ञों के अनुसार, दुर्गापुर मामले ने भाजपा को राज्य में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के ममता के दावों पर सवाल उठाने का नया मौका प्रदान किया है.
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने ‘पीटीआई’ से कहा, “दिल्ली पर दोष मढ़ने के बजाय मुख्यमंत्री को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए. बंगाल महिलाओं के लिए असुरक्षित हो गया है. कानून-व्यवस्था की स्थिति चरमरा गई है.” पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि यह शर्म की बात है कि एक महिला मुख्यमंत्री के शासन में भी महिलाओं की सुरक्षा की स्थिति इतनी खराब है. शुभेंदु ने कहा, “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम ओडिशा की अपनी बहन की रक्षा करने में विफल रहे. महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के बजाय, मुख्यमंत्री महिलाओं से कह रही हैं कि वे अपनी सुरक्षा का ख्याल खुद रखें.”
तृणमूल ने भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर पलटवार करते हुए उस पर पाखंड करने का आरोप लगाया. पश्चिम बंगाल की महिला एवं बाल विकास मंत्री शशि पांजा ने कहा, “वही भाजपा जिसने विधानसभा में अपराजिता विधेयक का समर्थन किया था, अब दिल्ली में इसके क्रियान्वयन को रोक रही है. मोदी सरकार ‘बेटी बचाओ’ के बारे में बहुत कुछ कहती है, लेकिन जब कोई राज्य कुछ ठोस करने की कोशिश करता है, तो वे उसे रोक देते हैं.” उन्होंने कहा, “बंगाल के लोग देख रहे हैं. अगर केंद्र इस विधेयक को कानून की शक्ल नहीं लेने देता है, तो इसे महिलाओं के लिए न्याय में बाधा डालने के रूप में देखा जाएगा.”
इस विवाद ने आपराधिक कानून बनाने में केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन पर बहस को भी फिर से शुरू कर दिया है. भारतीय संविधान के तहत, ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ और ‘पुलिस’ राज्य सूची में आते हैं, जबकि आपराधिक कानून समवर्ती सूची में, जिसके चलते बीएनएस जैसे राष्ट्रीय कानूनों में किसी भी संशोधन के लिए केंद्र की सहमति की जरूरत होती है.

