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देश में तेजी से सड़कें, ब्रिज और फ्लाईओवर बन रहे हैं. मकसद लोगों का सफर आसान करना है लेकिन कई प्रोजेक्ट अपने डिजाइन को लेकर सवालों में आ जाते हैं. दिल्ली के बारापुला फेज-3 में छह लेन का ट्रैफिक तीन लेन में सिमटता है. भोपाल के 90 डिग्री रेलवे ओवरब्रिज का मोड़ भी चर्चा में रहा है. इंदौर के जेड-शेप ब्रिज में दो तेज मोड़ हैं. मीरा-भयंदर फ्लाईओवर में चार लेन से दो लेन होने पर सवाल उठे हैं. वहीं मुंबई एयरपोर्ट के पास मेट्रो वायडक्ट की ऊंचाई विमानन सुरक्षा मानकों से जुड़ी चर्चा में है. देखिए खराब इंजीनियरिंग के ऐसे पांच मामले.
भारत इन दिनों तरक्की की राह पर फर्राटे भर रहा है. गांवों से लेकर शहरों तक ब्रिज, फ्लाईओवर और पुल बनाए जा रहे हैं. इंजीनियरिंग की ईजाद ही हमारी सहूलियत के लिए हुई थी. लेकिन कभी आपने सोचा है कि अगर इंजीनियरिंग अच्छे के लिए की जा रही हो और उसमें ही गड़बड़ हो जाए तो क्या होगा? ऐसा होने पर वही प्रोजेक्ट खराब इंजीनियरिंग के नमूनों में शामिल हो जाता है. डिजाइन में गलतियां, लेन की गलत काउंटिंग और सुरक्षा मानकों की अनदेखी जैसी शिकायतें सामने आती रहती हैं. दिल्ली के बारापुला से मध्य प्रदेश के 90 डिग्री ब्रिज और बिहार में बार-बार गिरते पुलों तक ऐसे उदाहरण चर्चा में रहे हैं. तो इस खबर में आइए देखते हैं देश के 5 ऐसे इंजीनियरिंग नमूनों को जिन पर सवाल उठे हैं.
सबसे पहले बात दिल्ली के बारापुला फेज-3 फ्लाईओवर की. इसे दिल्ली के ट्रैफिक को आसान करने के लिए बनाया गया था. उम्मीद थी कि इससे लोगों को जाम से राहत मिलेगी. लेकिन इसके खुलने के बाद तस्वीर कुछ अलग नजर आई. हिंदुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक दो तीन-लेन वाले हिस्से आगे जाकर एक ही तीन-लेन वाली सड़क में मिलते हैं. यानी छह लेन का ट्रैफिक अचानक तीन लेन में सिमट जाता है. सनडायल पार्क के पास यह मर्ज पॉइंट करीब 90 डिग्री के एंगल पर बताया गया. ट्रैफिक पुलिस के ड्रोन सर्वे में भी इसे डिजाइन से जुड़ी बड़ी समस्या बताया गया है.
अब चलते हैं मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल. यहां ऐशबाग इलाके के पास करीब 18 करोड़ रुपए की लागत से रेलवे ओवरब्रिज बनाया गया. इस ब्रिज का सबसे ज्यादा चर्चा में आने वाला हिस्सा इसका तेज 90 डिग्री का मोड़ है. दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक जगह की कमी को देखते हुए इस तरह के डिजाइन को मंजूरी दी गई थी. ब्रिज की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं तो मामला काफी चर्चा में आ गया. इसके बाद सरकार ने आठ इंजीनियरों को निलंबित कर दिया. वाहन चालकों को इस मोड़ से गुजरते समय काफी धीमी रफ्तार रखनी पड़ती है.
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भोपाल के बाद मध्य प्रदेश में ही एक और ब्रिज का डिजाइन सवालों के घेरे में आया है. यह मामला इंदौर के जेड-शेप्ड ब्रिज का है. नाम से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसका आकार सामान्य पुलों से अलग है. इस ब्रिज में दो तेज 90 डिग्री के मोड़ बनाए जा रहे हैं. रिपोर्ट्स में इसकी डिजाइन को लेकर सवाल उठे और जगह की कमी को इसके पीछे की बड़ी वजह बताया गया. किसी पुल पर अचानक आने वाले तेज मोड़ वाहन चालकों के लिए चुनौती बन सकते हैं. खासकर जब सड़क पर ट्रैफिक ज्यादा हो या गाड़ी की रफ्तार अधिक हो तो ऐसे मोड़ हादसे का जोखिम बढ़ा सकते हैं.
अब बात मुंबई के पास मीरा-भयंदर इलाके के फ्लाईओवर की. यहां नए फ्लाईओवर को लेकर सबसे बड़ा सवाल इसकी लेन व्यवस्था पर उठाया गया. बताया गया कि फ्लाईओवर चार लेन से अचानक दो लेन में सिमट जाता है. MMRDA की ओर से इसे भविष्य की ट्रैफिक योजना का हिस्सा बताया गया है. लेकिन आलोचकों का कहना है कि सड़क की चौड़ाई अचानक कम होने से वाहन चालकों के सामने मुश्किल पैदा हो सकती है. चार लेन से दो लेन में आने के दौरान वाहनों को एक-दूसरे की लेन में जगह बनानी पड़ती है. इससे ट्रैफिक धीमा होने के साथ जाम और दुर्घटना का खतरा भी बढ़ सकता है.
पांचवां मामला मुंबई एयरपोर्ट के पास बने मेट्रो वायडक्ट से जुड़ा है. एयरपोर्ट के आसपास किसी भी ऊंचे निर्माण के लिए विमानन सुरक्षा मानकों का खास ध्यान रखना पड़ता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक मुंबई एयरपोर्ट के पास मेट्रो लाइन के एक वायडक्ट की ऊंचाई तय विमानन सुरक्षा मानकों से ज्यादा पाई गई. मामला सामने आने के बाद यह सवाल उठा कि निर्माण से पहले ऊंचाई और एयरपोर्ट जोन के नियमों की जांच किस स्तर पर हुई. अगर संबंधित प्राधिकरण से ऊंचाई की छूट नहीं मिलती है तो करीब एक किलोमीटर लंबे हिस्से को तोड़कर दोबारा बनाने की नौबत आ सकती है. ऐसा हुआ तो लागत और समय दोनों बढ़ेंगे.

