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7 अगस्त 1947, आजादी से ठीक पहले का वो दिन, जब देश दंगों और बंटवारे की उथल-पुथल के बीच एक नए दौर की तरफ बढ़ रहा था. इसी दिन महात्मा गांधी ने नए राष्ट्रध्वज में चरखे की जगह अशोक चक्र लगाए जाने पर अपनी नाराजगी जाहिर की. इसी दिन विजयलक्ष्मी पंडित के मॉस्को पहुंचने पर भारत का नया तिरंगा पहली बार आधिकारिक तौर पर फहराया गया. वहीं रावलपिंडी में पाकिस्तानी हिंदू महासभा ने पाकिस्तान में रह रहे हिंदुओं को मुस्लिम लीग का झंडा अपनाने की सलाह दी. 7 अगस्त की इन तीन घटनाओं ने देश में कैसे हलचल बढ़ा दी, आइए विस्तार से जानें…
7 अगस्त 1947 के घटित तीन घटनाक्रम ने देश में हलचल बढ़ा दी थी.
7 अगस्त 1947: करीब दो साल के लंबे संघर्ष के बाद वह मुकाम अब सिर्फ आठ दिनों की दूरी पर था, जिसकी तमन्ना देश के हर दिल में बसी हुई थी. लेकिन देश के हालात कुछ ऐसे थे कि लोगों के चेहरे पर खुशी की जगह एक लंबी खामोशी पसरी हुई थी. हिंदू-मुस्लिम दंगों की आग में झुलसते महौल ने हर दिल में खौफ भर हुआ. भारत-पाकिस्तान के बंटवारे की नई तस्वीर किसी बड़ी अनहोनी की आहट दे रही थी. इसी खामोशी, खौफ और अनहोनी की आहट के बीच 7 अगस्त 1947 की तीन कहानियों ने देश को हिलाकर रख दिया था.
एक तरफ महात्मा गांधी नए राष्ट्रध्वज को लेकर आपे से बाहर थे. उन्होंने नए राष्ट्रध्वज में चरखे की जगह अशोक चक्र लगाए जाने पर सवाल खड़े कर दिए थे. दूसरी तरफ, भारत का नया तिरंगा पहली बार देश के बाहर आधिकारिक तौर पर फहराया गया. इस घटना ने लोगों को अजीब से कशमकश में डाल दिया था. महात्मा गांधी के कड़े ऐतराज के बावजूद नए राष्ट्रध्वज को विदेश में आधिकारिक तौर पर फहरा दिया गया था. तीसरी तरफ, पाकिस्तानी हिंदू महासभा ने मुस्लिम लीग के झंडे को अपना कर अलग हलचल पैदा कर दी थी.
तिरंगे को लेकर क्यों आपे से बाहर थे महात्मा गांधी
- 7 अगस्त 1947 की शुरुआत देश के लगभग सभी प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित महात्मा गांधी के एक बयान से हुई. इसमें उन्होंने साफ कहा कि अगर राष्ट्रध्वज के बीचोबीच चरखा नहीं होगा, तो वह उस ध्वज को प्रणाम नहीं करेंगे.
- दरअसल, एक दिन पहले यानी 6 अगस्त को महात्मा गांधी लाहौर के दौरे पर थे. इसी दौरान उन्हें जानकारी दी गई कि भारत का नया राष्ट्रध्वज तैयार कर लिया गया है. उन्हें बताया गया कि नए तिरंगे से चरखे को हटा दिया गया है. उसकी जगह अशोक चिह्न से चक्र को लिया गया है.
- यह सुनकर गांधी बुरी तरह नाराज हो गए. बैठक खत्म होने के बाद उन्होंने महादेव भाई से प्रेस वक्तव्य जारी करने को कहा. इसमें उन्होंने कहा कि राष्ट्रध्वज की कल्पना सबसे पहले उन्होंने ही की थी. अगर उसके बीच में चरखा नहीं होगा तो वह ऐसे ध्वज की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं.
- महात्मा गांधी की आपत्ति सिर्फ चरखे को हटाए जाने तक सीमित नहीं थी. उनका मानना था कि सम्राट अशोक एक हिंसक राजा थे. बौद्ध धर्म अपनाने से पहले उन्होंने बड़े पैमाने पर हिंसा की थी. ऐसे में महात्मा गांधी का सवाल यही था कि एक हिंसक राजा के प्रतीक को भारत के नए राष्ट्रध्वज में कैसे शामिल किया जा सकता है.
- 7 अगस्त को महात्मा गांधी के इस विचार को अलग-अलग भाषाओं में प्रकाशित होने वाले लगभग सभी अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित किया गया. इसके बाद राष्ट्रध्वज को लेकर देश में नई बहस शुरू हो गई. कुछ लोगों ने गांधी के विचारों को सही माना, जबकि कुछ ने इसे उनके व्यवहार के बिल्कुल उलट बताया. आखिर में तिरंगे के लिए अशोक चक्र को ही चुना गया.
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भारत से पहले मॉस्को में फहराया गया नया तिरंगा
- 7 अगस्त 1947 को एक और ऐतिहासिक घटनाक्रम हुआ. पंडित जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित को सोवियत संघ में भारत की पहली राजदूत नियुक्त किया गया था. वह आजाद भारत की पहली राजदूत थीं. नियुक्ति के बाद अपना कार्यभार को संभालने के लेने के लिए वह मॉस्को रवाना हो गईं थीं.
- 7 अगस्त 1947 की सुबह करीब छह बजे विजयलक्ष्मी पंडित का विमान मॉस्को एयरपोर्ट पर उतरा. उनके स्वागत के लिए अशोक चक्र से सुसज्जित भारत का नया राष्ट्रध्वज तिरंगा फहराया गया. शायद यह पहली ऐसी घटना थी, जब भारत के होने वाले नए राष्ट्रध्वज को आधिकारिक तौर पर फहराया गया.
- इससे पहले न तो भारत के भीतर और न ही देश के बाहर अशोक चक्र वाला तिरंगा आधिकारिक रूप से फहराया गया था. इस घटना ने देश में नई हलचल भी पैदा कर दी. यह बात भले ही हर भारतीय के लिए गर्व की बात जरूर हो, पर महात्मा गांधी की नाराजगी के बाद राष्ट्रध्वज को लेकर अभी तक घमासान मचा हुआ था.
- अशोक चक्र वाले तिरंगे को लेकर लेकर महात्मा गांधी ने साफ कहा था कि यदि राष्ट्रध्वज में चरखा नहीं होगा तो वे उसे नमन नहीं करेंगे. अब उसी ध्वज को विदेश में भारत की नई पहचान बनाया जा रहा था. इस विरोधाभास ने देश के राजनीतिक माहौल को हिला दिया था.
- इसी के साथ, जुलाई 1947 के अंतिम सप्ताह में महात्मा गांधी की तरह से दिए गए उस बयान की भी चर्चा होने लगी, जिसमें उन्होंने भारतीय राष्ट्रध्वज में यूनियन जैक को शामिल करने पर सहमति सताई थी. दरअसल, ‘द कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी’ नामक किताब में इसकी पुष्टि भी की गई है.
भारतीय राष्ट्रध्वज में यूनियन जैक को शामिल करने के बारे में महात्मा गांधी ने क्या कहा
हमारे झंडे के एक कोने में यूनियन जैक रखने में क्या बुराई है? अगर अंग्रेजों ने हमें नुकसान पहुंचाया है, तो यह उनके झंडे ने नहीं किया है. हमें अंग्रेजों के गुणों को भी ध्यान में रखना चाहिए. वे स्वेच्छा से भारत से जा रहे हैं और सत्ता हमारे हाथों में छोड़ रहे हैं… अगर हम उन्हें अपना नौकर नियुक्त करते हुए झंडे के एक कोने में यूनियन जैक भी रखें, तो इसमें भारत के साथ कोई विश्वासघात नहीं होगा. यह मेरी राय है. लेकिन मुझे पता चला है कि यह रिपोर्ट सच नहीं है. मुझे दुख है कि कांग्रेस के नेता इतनी उदारता नहीं दिखा सके.
महात्मा गांधी
(सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय, खंड- 88)
दंगों के बीच पाकिस्तानी हिंदू महासभा का बड़ा फैसला
उधर रावलपिंडी में पाकिस्तानी हिंदू महासभा के नेताओं की बैठक चल रही थी. सभी जानते थे कि भारत और पाकिस्तान का विभाजन अब तय हो चुका है. पिंडी और पंजाब के साथ पूरा सिंध भी पाकिस्तान में जाने वाला था. इस खबर के सामने आते ही दंगों ने पूरे देश को अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया था. लगातार हिंदू परिवारों और उनकी संपत्तियों को निशाना बनाया जा रहा था. हालात को देखते हुए पाकिस्तानी हिंदू महासभा के सदस्यों ने मुस्लिम लीग के झंडे के नीचे आने का मन बना लिया. 7 अगस्त 1947 को महासभा ने अखबारों में एक इश्तिहार दिया. इसमें पाकिस्तान में रह रहे हिंदुओं को मुस्लिम लीग के झंडे को अपनाने की सलाह दी गई थी.
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Anoop Kumar Mishra is currently serving as Assistant Editor at News18 Hindi Digital, where he leads coverage of strategic domains including aviation, defence, paramilitary forces, international…
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