दुनिया में पावर शिफ्ट का दौर शुरू हो चुका है. नई दिल्ली 12 से 13 सितंबर 2026 तक 18वीं ब्रिक्स समिट की मेजबानी कर रही है. भारत मंडपम में दुनिया के कई बड़े नेता जुट रहे हैं. ऐसे में एक सवाल हर किसी के दिमाग में है. आखिर जी7 और ब्रिक्स में से असली ताकत किसके पास है. यह तुलना अब सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं है. यह एक ऐतिहासिक बदलाव का संकेत है. ब्रिक्स कभी उभरते मार्केट्स का एक अनौपचारिक समूह हुआ करता था. आज यह पश्चिमी देशों के आर्थिक दबदबे को चुनौती देने वाला एक बड़ा गठबंधन बन गया है. दूसरी ओर जी7 दुनिया के सबसे विकसित औद्योगिक लोकतंत्रों का समूह है. यह गुट आज भी ग्लोबल फाइनेंस और तकनीकी इनोवेशन पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए है. इस आर्टिकल में हम इन दोनों गुटों की बनावट और ताकत का डीप एनालिसिस करेंगे.
सबसे पहले G7 के बारे में जानिए
जी7 एक छोटा और विचारधार के स्तर पर समान गुट है. इसकी स्थापना 1973 के तेल संकट के बाद हुई थी. जी7 में दुनिया की सात विकसित इकॉनमी शामिल हैं. इनमें अमेरिका, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और कनाडा का नाम आता है. यूरोपीय यूनियन भी एक गैर-सूचीबद्ध आठवें सदस्य के रूप में इसमें भाग लेता है. यह समूह लगभग 80 करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करता है. यह दुनिया की कुल आबादी का 10 प्रतिशत से भी कम हिस्सा है.
जी7 की सबसे बड़ी खासियत इसकी राजनीतिक और आर्थिक समानता है. इसके सभी सदस्य हाई-इनकम वाले बाजार और संवैधानिक लोकतंत्र हैं. ये सभी देश एक दूसरे के करीबी सैन्य या रणनीतिक सहयोगी हैं. इनमें से ज्यादातर देश नाटो या वाशिंगटन के साथ सुरक्षा समझौतों से बंधे हैं.
जी7 मुख्य रूप से पश्चिमी नेतृत्व वाले नियमों पर आधारित व्यवस्था के लिए काम करता है. यह लोकतांत्रिक मानकों और खुले पूंजी बाजारों को प्राथमिकता देता है. इसका फोकस एक समान प्रतिबंध नीति और सहकारी सुरक्षा ढांचे पर रहता है. इन वजहों से जी7 की नीतियां बहुत तेजी से लागू होती हैं.
BRICS : उभरते देशों का नया गुट
ब्रिक्स की कहानी साल 2001 में एक इन्वेस्टमेंट टर्म के तौर पर शुरू हुई थी. तब गोल्डमैन सैक्स ने ब्राजील, रूस, इंडिया और चीन को मिलाकर ब्रिक नाम दिया था. साल 2010 में दक्षिण अफ्रीका की एंट्री के बाद यह ब्रिक्स बन गया. अब 2024 और 2025 के विस्तार के बाद यह गुट ब्रिक्स प्लस के रूप में जाना जाता है. आज इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, यूएई और इंडोनेशिया जैसे पूर्ण सदस्य शामिल हो चुके हैं.
इसके साथ ही पार्टनर देशों का एक बड़ा नेटवर्क भी तैयार हो रहा है. इनमें मलेशिया, थाईलैंड, वियतनाम, कजाकिस्तान, बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, युगांडा और उज्बेकिस्तान जैसे देश शामिल हैं. ब्रिक्स प्लस के पूर्ण सदस्यों की कुल आबादी साढ़े तीन अरब से ज्यादा है. यह ग्लोबल आबादी का लगभग 45 से 48 प्रतिशत हिस्सा है.
अगर पार्टनर देशों को भी मिला लें, तो यह गुट दुनिया की आधी से ज्यादा मानवता का प्रतिनिधित्व करता है. ब्रिक्स का दायरा यूरेशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और पश्चिम एशिया तक फैला है.
जी7 की वैचारिक समानता के मुकाबले ब्रिक्स प्लस का विविधता भरा ढांचा कैसे काम करता है?
जी7 के उलट ब्रिक्स प्लस समान विचारधारा वाले लोकतंत्रों का गठबंधन नहीं है. इसमें भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया जैसे मजबूत लोकतंत्र शामिल हैं. वहीं चीन और वियतनाम जैसे देश भी इसका अहम हिस्सा हैं. यूएई जैसी राजशाही और ईरान जैसे इस्लामिक रिपब्लिक भी इस गुट में मौजूद हैं. ब्रिक्स के देश किसी एक राजनीतिक विचारधारा से नहीं बंधे हैं. उनका मुख्य उद्देश्य ग्लोबल गवर्नेंस में सुधार लाना है.
ये सभी देश पश्चिमी देशों के आर्थिक दबाव से खुद को मुक्त करना चाहते हैं. इनका साझा लक्ष्य एक मल्टीपोलर वर्ल्ड ऑर्डर तैयार करना है. इसी सोच ने इतनी विविध राजनीतिक प्रणालियों वाले देशों को एक मंच पर ला खड़ा किया है. 18वीं ब्रिक्स समिट में नई दिल्ली इसी विविधता को एक ताकत में बदलने पर जोर दे रही है. भारत की अध्यक्षता में ग्लोबल साउथ की आवाज को और बुलंद किया जा रहा है. यह रणनीति जी7 के एकतरफा फैसलों के खिलाफ एक मजबूत ढाल बन रही है.
जी7 vs ब्रिक्स+ : जीडीपी और आर्थिक ताकत के मामले में असली बाजीगर कौन है?
- जी7 और ब्रिक्स की आर्थिक ताकत का सही अंदाजा लगाने के लिए दो पैमाने देखने होते हैं. पहला नॉमिनल जीडीपी और दूसरा परचेजिंग पावर पैरिटी यानी पीपीपी. अगर मौजूदा मार्केट एक्सचेंज रेट की बात करें, तो जी7 अभी भी काफी आगे है. अमेरिका की 28 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा की इकॉनमी जी7 को मजबूत बनाती है.
- दुनिया की कुल नॉमिनल जीडीपी में जी7 की हिस्सेदारी लगभग 43 से 45 प्रतिशत है. इसके मुकाबले विस्तारित ब्रिक्स प्लस गुट के पास नॉमिनल जीडीपी का 28 से 30 प्रतिशत हिस्सा है. जी7 का यह नॉमिनल फायदा उनके नागरिकों की भारी प्रति व्यक्ति संपत्ति में नजर आता है.
- जी7 देशों का प्रति व्यक्ति औसत जीडीपी 50 हजार डॉलर से ज्यादा है. वहीं ब्रिक्स प्लस का औसत अभी भी 10 हजार से 12 हजार डॉलर के आसपास है. यह अंतर दोनों गुटों के जीवन स्तर और पूंजी जमा करने की क्षमता में बड़ा फर्क दिखाता है. जी7 के पास दुनिया के सबसे परिष्कृत उपभोक्ता बाजार और गहरे वित्तीय केंद्र मौजूद हैं.
परचेजिंग पावर पैरिटी के पैमाने पर ब्रिक्स प्लस से काफी पीछे है जी7
जब हम पीपीपी यानी घरेलू क्रय शक्ति के आधार पर अर्थव्यवस्था को मापते हैं, तो तस्वीर पलट जाती है. पीपीपी के आधार पर ब्रिक्स प्लस दुनिया की 35 से 37 प्रतिशत जीडीपी को कंट्रोल करता है. इस मामले में उसने जी7 को आधिकारिक रूप से पीछे छोड़ दिया है. पीपीपी के लिहाज से जी7 की हिस्सेदारी सिमटकर 29 से 30 प्रतिशत रह गई है.
ब्रिक्स देशों में मैन्युफैक्चरिंग, निर्माण और लेबर कॉस्ट काफी कम है. इसका मतलब है कि ब्रिक्स देशों में खर्च किए गए एक डॉलर से ज्यादा काम होता है. पश्चिमी देशों की तुलना में यहां इंफ्रास्ट्रक्चर और इंडस्ट्रियल हार्डवेयर कहीं ज्यादा सस्ते में तैयार होते हैं. इसलिए जमीनी स्तर पर ब्रिक्स की इकॉनमी ज्यादा फिजिकल आउटपुट पैदा कर रही है. यह पहलू ब्रिक्स को लॉन्ग टर्म इंडस्ट्रियल ग्रोथ में एक बड़ा रणनीतिक फायदा देता है.
इकॉनमी की ग्रोथ स्पीड में ब्रिक्स प्लस के देश जी7 के देशों पर भारी क्यों पड़ रहे हैं?
लॉन्ग टर्म ग्रोथ के मामले में दोनों गुटों के बीच एक बड़ा अंतर साफ नजर आ रहा है. ब्रिक्स प्लस की इकॉनमी औसतन 3.7 से 3.8 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है.
भारत इस ग्रोथ चार्ट में सबसे आगे है. भारतीय अर्थव्यवस्था 6.2 से 6.6 प्रतिशत की मजबूत रफ्तार से आगे बढ़ रही है. चीन भी अपनी आर्थिक चुनौतियों के बावजूद 4.2 से 4.8 प्रतिशत की ग्रोथ रेट बनाए हुए है. इंडोनेशिया, वियतनाम और मलेशिया जैसे सदस्य इस गुट की कुल स्पीड को और बढ़ा रहे हैं.
इसके ठीक उलट जी7 देशों में स्ट्रक्चरल स्लोडाउन देखा जा रहा है. जी7 की औसत ग्रोथ रेट केवल 1.0 से 1.1 प्रतिशत के आसपास सिमट गई है. अमेरिका अभी भी कुछ हद तक मजबूती दिखा रहा है. लेकिन यूरोपीय देशों को भारी आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. जर्मनी जैसे देश 0.2 से 0.9 प्रतिशत की एनुअल ग्रोथ के साथ ठहराव की स्थिति में हैं. वहां हाई एनर्जी कॉस्ट और पुरानी हो रही आबादी बड़े संकट बन गए हैं.
व्यापार और क्रिटिकल एनर्जी मार्केट पर ब्रिक्स प्लस ने जमाया एकाधिकार
सिर्फ जीडीपी के आंकड़ों से ग्लोबल पावर का असली अंदाजा नहीं लगता है. असली ताकत ऊर्जा, कृषि, कच्चे खनिजों और औद्योगिक क्षमता को कंट्रोल करने में है.
- पश्चिम एशिया के बड़े तेल उत्पादक देशों के ब्रिक्स में शामिल होने से गेम बदल गया है. रूस तो पहले से ही इसका संस्थापक सदस्य है. अब यूएई, ईरान और मिस्र के जुड़ने से ऊर्जा बाजार पर ब्रिक्स की पकड़ बहुत मजबूत हो गई है.
- विस्तारित ब्रिक्स गुट दुनिया के 42 प्रतिशत से ज्यादा कच्चे तेल के उत्पादन को कंट्रोल करता है. इसके पास दुनिया के प्रमाणित नेचुरल गैस भंडार का लगभग आधा हिस्सा है. इससे ब्रिक्स देशों को एनर्जी सप्लाई चेन में अभूतपूर्व पावर मिल गई है.
- सिर्फ कच्चे तेल के उत्पादन में ही नहीं, बल्कि रिफाइनिंग में भी ब्रिक्स आगे है. भारत और चीन के पास दुनिया की ऑयल रिफाइनिंग क्षमता का एक बहुत बड़ा हिस्सा है. वे पेट्रोलियम उत्पादों को प्रोसेस करके पूरी दुनिया में एक्सपोर्ट करने की ताकत रखते हैं.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्रिटिकल मिनरल्स की रेस में ब्रिक्स कैसे जी7 को मात दे रहा है?
आने वाला समय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इलेक्ट्रिफिकेशन और रिन्यूएबल एनर्जी का है. इन सब के लिए क्रिटिकल कच्चे माल की जरूरत होती है, जिसमें ब्रिक्स बहुत आगे है. चीन दुनिया के 80 प्रतिशत से ज्यादा रेयर अर्थ एलिमेंट्स को प्रोसेस करता है. वह ग्लोबल सोलर पैनल, बैटरी और ईवी प्रोसेसिंग पाइपलाइन के एक बड़े हिस्से को कंट्रोल करता है.
वहीं ब्राजील, बोलीविया, अर्जेंटीना और युगांडा जैसे सदस्य लिथियम, तांबा और कोबाल्ट का विशाल भंडार लाते हैं. इस खनिज संपदा के बिना भविष्य की किसी भी तकनीक को विकसित करना नामुमकिन है. इसके साथ ही ब्राजील, रूस और भारत दुनिया भर में खाद्य सुरक्षा के लिए अहम हैं. ये देश दुनिया के अनाज, सोयाबीन, चीनी और फर्टिलाइजर का एक बड़ा प्रतिशत एक्सपोर्ट करते हैं. इस तरह से ब्रिक्स सिर्फ तकनीक में नहीं, बल्कि दुनिया का पेट भरने में भी सबसे अहम रोल निभा रहा है.
तकनीकी इनोवेशन और हाई-एंड सॉफ्टवेयर में जी7 का दबदबा आज भी कायम
ब्रिक्स के इस संसाधन नियंत्रण का मुकाबला करने के लिए जी7 ने अपनी रणनीति अलग रखी है. जी7 देश ग्लोबल वैल्यू चेन के सबसे ऊपरी हिस्से पर अपना एकछत्र राज बनाए हुए हैं.
- अमेरिका, जापान और यूरोपीय देश आज भी एडवांस सेमीकंडक्टर डिजाइन में सबसे आगे हैं. वे लिथोग्राफी उपकरण, बायोटेक्नोलॉजी, एयरोस्पेस और हाई-एंड सॉफ्टवेयर सेवाओं में मोनोपोली रखते हैं. इस तकनीकी बढ़त के कारण वे क्रिटिकल मैन्युफैक्चरिंग में हमेशा एक कदम आगे रहते हैं.
- इसके अलावा जी7 देश दुनिया के समुद्री बीमा बाजार को पूरी तरह कंट्रोल करते हैं. लंदन का लॉयड्स इसका एक बड़ा उदाहरण है. फाइनेंशियल ऑडिटिंग, क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों और क्रॉस-बॉर्डर इन्वेस्टमेंट पर भी इन्हीं का कब्जा है.
- यह कंट्रोल पश्चिमी देशों को अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों पर बहुत बड़ी सॉफ्ट और हार्ड पावर देता है. इसी पावर के दम पर जी7 देश किसी भी ग्लोबल ट्रेड को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं.
ग्लोबल फाइनेंस और डॉलर के प्रभुत्व को लेकर जी7 और ब्रिक्स के बीच लड़ाई क्या है?
जी7 और ब्रिक्स के बीच सबसे बड़ी जंग ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम को लेकर है. दुनिया की रिजर्व करेंसी के रूप में अमेरिकी डॉलर का कोई मुकाबला नहीं है. जी7 इसी डॉलर डोमिनेंस और पश्चिमी देशों के पेमेंट सिस्टम के जरिए अंतरराष्ट्रीय वित्त पर राज करता है. आज भी दुनिया के विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग 56 प्रतिशत हिस्सा अमेरिकी डॉलर में है. इसके बाद 20 प्रतिशत हिस्सेदारी यूरो के पास है.
कई दशकों की बहस के बाद भी डॉलर का कोई ठोस विकल्प सामने नहीं आ सका है. अमेरिकी ट्रेजरी जो तरलता, पारदर्शिता और कानूनी सुरक्षा देती है, वह बेजोड़ है. इसके अलावा बेल्जियम स्थित स्विफ्ट मैसेजिंग सिस्टम ग्लोबल बैंकिंग का नर्व सेंटर बना हुआ है.
यूक्रेन युद्ध के दौरान पश्चिमी देशों ने इसी सिस्टम को एक बड़े हथियार की तरह इस्तेमाल किया. उन्होंने प्रमुख रूसी बैंकों को स्विफ्ट से काट दिया और उनके रिजर्व फ्रीज कर दिए. जी7 के इस कदम ने उसकी वित्तीय ताकत का खौफनाक चेहरा पूरी दुनिया को दिखा दिया.
ब्रिक्स गुट पश्चिमी देशों की वित्तीय घेराबंदी को तोड़ने के लिए क्या मास्टरप्लान बना रहा है?
रूस पर लगे कड़े प्रतिबंधों ने ब्रिक्स देशों को अपनी वित्तीय सुरक्षा के लिए अलर्ट कर दिया. ब्रिक्स प्लस अब डॉलर को रातों-रात खत्म करने के बजाय एक समानांतर व्यवस्था बना रहा है. गुट के देश लोकल करेंसी ट्रेड और वैकल्पिक इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास पर फोकस कर रहे हैं. आपसी व्यापार को चीनी युआन, भारतीय रुपया और यूएई दिर्हम जैसी मुद्राओं में सेटल किया जा रहा है.
चीन और रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार अब डॉलर के फ्रेमवर्क से पूरी तरह बाहर हो रहा है. भारत भी पश्चिम एशियाई आपूर्तिकर्ताओं से ऊर्जा आयात के लिए नए रास्ते खोज रहा है.
शंघाई स्थित न्यू डेवलपमेंट बैंक ने 40 बिलियन डॉलर से ज्यादा के इंफ्रास्ट्रक्चर लोन मंजूर किए हैं. इस बैंक का लक्ष्य है कि इसका 30 प्रतिशत लोन सदस्य देशों की लोकल करेंसी में दिया जाए. इससे विकासशील देशों को विदेशी मुद्रा के उतार-चढ़ाव और अमेरिकी ब्याज दरों के असर से बचाया जा सकेगा. यह कदम डॉलर की निर्भरता को कम करने में एक बड़ा रोल निभा रहा है.
क्या ‘ब्रिक्स पे’ और डिजिटल करेंसी भविष्य में स्विफ्ट सिस्टम को रिप्लेस कर देंगे?
- वित्तीय स्वायत्तता हासिल करने के लिए ब्रिक्स कई नए पेमेंट प्लेटफॉर्म विकसित कर रहा है. चीन का क्रॉस-बॉर्डर इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम अपनी ग्लोबल पहुंच को लगातार बढ़ा रहा है. वहीं दूसरी तरफ ‘ब्रिक्स पे’ के ट्रायल्स ने पश्चिमी दुनिया में खलबली मचा दी है.
- यह एक विकेंद्रीकृत डिजिटल इंटर-बैंक पेमेंट सिस्टम है, जो पूरी तरह स्वतंत्र रूप से काम करेगा. इसे राष्ट्रीय डिजिटल मुद्राओं और लोकल पेमेंट नेटवर्क को जोड़ने के लिए डिजाइन किया गया है. इसका मकसद पश्चिमी क्लीयरिंग हाउस को छुए बिना सीमा पार व्यापार को संभव बनाना है.
- इसके साथ ही ब्रिक्स देशों के केंद्रीय बैंक अपनी निर्भरता डॉलर से कम कर रहे हैं. वे तेजी से अपने सोने के भंडार को बढ़ा रहे हैं, जो अब तक के रिकॉर्ड स्तर पर है. यह किसी भी संभावित भू-राजनीतिक संकट और एसेट फ्रीज होने की स्थिति से बचने की तैयारी है. डिजिटल करेंसी और सोने का यह कॉम्बो ब्रिक्स को भविष्य के आर्थिक युद्धों के लिए मजबूत कर रहा है.
ब्रिक्स देशों के लिए डी-डॉलराइजेशन का सपना रातों-रात सच करना क्यों इतना मुश्किल काम है?
इन सभी तैयारियों के बावजूद शॉर्ट टर्म में ब्रिक्स के लिए पश्चिमी सिस्टम को हटाना बहुत मुश्किल है. इसके रास्ते में कई बड़ी ढांचागत बाधाएं मौजूद हैं. उदाहरण के लिए चीनी युआन पर कड़े स्टेट कैपिटल कंट्रोल्स लागू हैं. इस वजह से यह पूरी तरह से ग्लोबल रिजर्व करेंसी की भूमिका नहीं निभा सकता है. भारतीय रुपये के सामने भी इसी तरह की विनिमय संबंधी सीमाएं मौजूद हैं.
भारत, ब्राजील, यूएई और दक्षिण अफ्रीका जैसे प्रमुख ब्रिक्स सदस्यों का नजरिया थोड़ा अलग है. उन्होंने एक सिंगल ब्रिक्स करेंसी बनाने या खुलकर पश्चिमी देशों का विरोध करने से परहेज किया है. ये देश स्थानीय मुद्रा व्यापार को लागत कम करने और जोखिम घटाने के उपकरण के रूप में देखते हैं. वे इसे अमेरिकी डॉलर के खिलाफ किसी युद्ध के रूप में प्रमोट नहीं करना चाहते. यही व्यावहारिक अप्रोच ब्रिक्स को एक आक्रामक गुट बनने से रोकती है.
जी7 और ब्रिक्स के विजन में बुनियादी अंतर क्या है?
जी7 खुद को मानवाधिकारों, लोकतांत्रिक शासन और ओपन मार्केट कैपिटलिज्म के रक्षक के रूप में देखता है. वह दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के नियमों का सख्ती से पालन करवाना चाहता है. जी7 क्लाइमेट चेंज, एआई के लिए एथिकल रूल्स और खुले समुद्री रास्तों पर जोर देता है. लेकिन ग्लोबल साउथ का मानना है कि जी7 इन नियमों को अपने हिसाब से तोड़ता-मरोड़ता है. वह दुश्मनों पर नियम थोपता है, जबकि अपने सहयोगियों को आसानी से छूट दे देता है.
इसके उलट ब्रिक्स प्लस खुद को एक एंटी-हेजेमोनिक गुट के रूप में पेश करता है. यह गुट आर्थिक विकास, संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय फैसलों में समानता की वकालत करता है. ब्रिक्स का तर्क है कि आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक जैसी संस्थाएं पुरानी हो चुकी हैं. वे पश्चिमी शक्तियों को उनके वास्तविक वजन से कहीं ज्यादा वीटो पावर और अधिकार देती हैं. ब्रिक्स अपने सदस्य देशों पर कोई राजनीतिक एजेंडा या मानवाधिकार शर्तें नहीं थोपता है.
क्या भारत और चीन का आपसी टकराव ब्रिक्स प्लस को अंदर से खोखला कर रहा है?
कोई भी गुट पूरी तरह से एकमत नहीं है और ब्रिक्स प्लस भी इसका अपवाद नहीं है. तेजी से हुए विस्तार ने ब्रिक्स के भीतर अलग-अलग रणनीतिक कैंप बना दिए हैं.
- मॉस्को, बीजिंग और तेहरान ब्रिक्स को पश्चिमी गठबंधनों के खिलाफ एक हथियार के रूप में देखते हैं. वे इसे पश्चिमी प्रतिबंधों का मुकाबला करने के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं. वहीं दूसरी ओर नई दिल्ली, ब्रासीलिया, प्रिटोरिया और अबू धाबी एंटी-वेस्टर्न रुख को सिरे से खारिज करते हैं.
- भारत और ब्राजील के अमेरिका और यूरोप के साथ गहरे रणनीतिक और रक्षा संबंध हैं. वे ब्रिक्स को रणनीतिक स्वायत्तता के टूल के रूप में देखते हैं, न कि किसी विरोधी गठबंधन के रूप में. ब्रिक्स के भीतर सबसे बड़ी दरार भारत और चीन के बीच जारी प्रतिस्पर्धा है.
- हिमालयी सीमा पर विवाद, आर्थिक घर्षण और दक्षिण एशिया में प्रभाव की लड़ाई इसके मुख्य कारण हैं. भारत क्वाड जैसे पश्चिमी समर्थित सुरक्षा समूहों का भी हिस्सा है. इन वजहों से ब्रिक्स की एकता पर हमेशा एक बड़ा सवालिया निशान लगा रहता है.
आर्थिक विविधता और कर्ज का बोझ कैसे ब्रिक्स देशों के लिए एक सिरदर्द बन गया है?
राजनीतिक मतभेदों के अलावा ब्रिक्स प्लस को भारी आर्थिक विविधता का भी सामना करना पड़ रहा है. एक तरफ यूएई जैसे हाई-इनकम वाले ऊर्जा निर्यातक देश हैं. दूसरी तरफ चीन जैसा विशाल मैन्युफैक्चरिंग हब और भारत जैसी डायनेमिक सर्विस इकॉनमी है. इनके साथ ही ईरान और इथियोपिया जैसे कर्ज में डूबे और कड़े प्रतिबंधों का सामना कर रहे देश भी शामिल हैं.
इतने अलग-अलग प्रोफाइल वाले देशों के लिए एक समान व्यापार नीति बनाना लगभग असंभव है. किसी भी तरह के औपचारिक आर्थिक एकीकरण के लिए इन सभी को एक पेज पर लाना बहुत बड़ी चुनौती है.
हर देश की अपनी अलग घरेलू प्राथमिकताएं और भू-राजनीतिक मजबूरियां हैं. यह भारी भरकम विविधता ब्रिक्स को एक ठोस और निर्णायक इकॉनमिक ब्लॉक बनने से रोकती है. जब भी कोई बड़ा फैसला लेना होता है, तो गुट के भीतर सहमति बनाने में लंबा वक्त लग जाता है.
जी7 देश अपने घर के भीतर किन गंभीर चुनौतियों और राजनीतिक संकटों का सामना कर रहे हैं?
- जी7 में भले ही राजनीतिक समानता ज्यादा हो, लेकिन वे भी भारी दबाव में हैं. उत्तरी अमेरिका, जापान और यूरोप में आबादी तेजी से बूढ़ी हो रही है. वहां प्रोडक्टिविटी की ग्रोथ धीमी हो गई है और नेशनल डेट-टू-जीडीपी रेशियो खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है. इससे जी7 सरकारों की आर्थिक क्षमता काफी सीमित हो गई है. वे एक साथ इंटरनेशनल डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स और मिलिट्री पर भारी खर्च नहीं कर सकते.
- इसके अलावा जी7 लोकतंत्रों में होने वाले चुनाव अक्सर विदेश नीति में बड़े बदलाव लाते हैं. अमेरिका या पश्चिमी यूरोप में घरेलू राजनीतिक ध्रुवीकरण किसी भी दीर्घकालिक योजना को पटरी से उतार सकता है.
- क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल ट्रेड एग्रीमेंट्स पर उनके वादे अक्सर घरेलू राजनीति की भेंट चढ़ जाते हैं. वहीं पश्चिमी यूरोप ने जब से सस्ते रूसी जीवाश्म ईंधन से दूरी बनाई है, वहां ऊर्जा की लागत आसमान छू रही है. इससे हेवी इंडस्ट्री को भारी नुकसान हुआ है और उनका मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर एशियाई प्रतिद्वंद्वियों से पिछड़ रहा है.
जी7 बनाम ब्रिक्स की इस वर्चस्व की लड़ाई में विजेता कौन होगा?
जी7 और ब्रिक्स प्लस का एनालिसिस अंतरराष्ट्रीय संगठन के दो बिल्कुल अलग मॉडलों को सामने लाता है. 2026 के अंत तक और आने वाले दशक में किसी भी एक गुट का पूर्ण दबदबा कायम होना मुश्किल है. इस प्रतिद्वंद्विता का सबसे बड़ा परिणाम ग्लोबल साउथ में मल्टी-अलाइनमेंट के रूप में सामने आया है. दुनिया भर के नॉन-अलाइन्ड देश इस ग्लोबल जंग में किसी एक पक्ष को स्थायी रूप से चुनने से इनकार कर रहे हैं.
वियतनाम, सऊदी अरब, तुर्की, मैक्सिको और केन्या जैसे देश दोनों गुटों के साथ सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं. वे अपने हितों को सुरक्षित रखने के लिए कूटनीति के हर विकल्प का इस्तेमाल कर रहे हैं. यह नजरिया अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नया और ज्यादा व्यावहारिक ट्रेंड सेट कर रहा है.
क्या मल्टी-अलाइनमेंट की रणनीति दुनिया को एक नए शीत युद्ध में जाने से रोक सकती है?
आज के समय में विकासशील देश अपनी जरूरत के हिसाब से दोनों गुटों का फायदा उठा रहे हैं. वे सुरक्षा और हाई-टेक ट्रांसफर के लिए जी7 देशों के निवेश और रक्षा साझेदारियों का लाभ लेते हैं. वहीं दूसरी ओर व्यापार और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए ब्रिक्स देशों पर भरोसा करते हैं. वे न्यू डेवलपमेंट बैंक से आसान शर्तों पर कर्ज ले रहे हैं.
इन देशों ने एक नया बाजार तैयार कर लिया है, जहां कोल्ड वॉर की तरह किसी एक ब्लॉक में बंधना जरूरी नहीं है. वे अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के आधार पर अपने सहयोगियों को चुन सकते हैं.
पश्चिमी पूंजी और रक्षा गारंटी का उपयोग सुरक्षा के लिए किया जाता है. जबकि व्यापार के लिए चीनी इंडस्ट्रियल कैपेसिटी और ब्रिक्स पेमेंट सिस्टम का इस्तेमाल हो रहा है. अंतरराष्ट्रीय संबंधों का भविष्य इस बात से तय नहीं होगा कि कौन सा गुट दूसरे को हराता है. बल्कि यह इस बात पर निर्भर करेगा कि ये दोनों महाशक्तियां अपना सह-अस्तित्व कैसे बनाए रखती हैं.

