Prashant Kishore News: प्रशांत किशोर बांकीपुर उपचुनाव जीत गए हैं. महीने भर से ज्यादा समय से इस उपचुनाव पर ना केवल बिहार बल्कि पूरे देश की नजर थी. अब जब जनसुराज के प्रत्याशी प्रशांत किशोर ने जीत दर्ज कर ली है तो लोग इसकी तुलना 1994 में वैशाली लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव से कर रहे हैं. इस तुलना पर मन में पहला सवाल यही आता है कि 32 साल पुराने राजनीतिक घटनाक्रम की चर्चा आज क्यों हो रही है.
क्यों चर्चा में रहा बांकीपुर उपचुनाव?
दरअसल, पिछले अनुभवों को देखकर सबको यही लगता रहा कि भला एक सीट के उपचुनाव पर इतनी हाय तौबा क्यों मची है. इसकी पहली बड़ी वजह यह रही कि यहां के विधायक रहे नितिन नवीन के बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य बनने से यह सीट खाली हुई थी. यानी पार्टी हायरकी के हिसाब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के भी बॉस की सीट. दूसरी बड़ी वजह यह रही कि इस पर 31 साल से पहले नवीन कशोर प्रसाद और फिर उनके बेटे नितिन नवीन का कब्जा था. पूरे बिहार में इसे बीजेपी की सबसे सेफ सीट मानी जाती रही. तीसरी बड़ी वजह यह रही कि इस सीट से राजनीतिक रणनीतिकार से राजनेता बने जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर खुद पहली बार चुनाव लड़ रहे थे.
अब बीजेपी की ओर से अपने बॉस की इज्जत बचाने के लिए किए गए तमाम प्रयास फेल साबित हुए हैं. जनसुराज संस्थापक प्रशांत किशोर ने 19 हजार से ज्यादा वोटों से जीत कर सबको चौंका दिया है. प्रशांत किशोर की इस जीत की तुलना 1994 में वैशाली लोकसभा सीट पर हुए बड़े उलटफेर से की जा रही है.
ऐसे तैयार हुई 1994 वाले घटना की जमीन
1990 में मुख्यमंत्री बनने के बाद से लालू प्रसाद यादव अपने स्टाइल में बिहार की राजनीति कर रहे थे. पूरे बिहार (आज का झारखंड मिलाकर) में ऐसा माहौल था कि लालू यादव चाहे जो दांव चलें वह उनके फेवर में ही जा रहा था. ओबीसी और दलितों का वोट पाने के लिए भदेस भाषा में सवर्णों को लेकर कुछ भी कह रहे थे, लेकिन राजनीतिक रूप से उनका बाल भी बांका नहीं हो पा रहा था.
इसी दौरान तत्कालीन लालू कैबिनेट में सड़क मंत्रालय संभाल रहे इलियास हुसैन के प्रयास से डेहरी ऑन सोन में एक नया ब्लॉक बनाया गया था. उसके उद्घाटन के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव खुद पहुंचे थे. यहां मंच से भाषण देने के दौरान उन्होंने जेनऊधारियों को लेकर आपत्तिजनक बातें कहीं. खुले तौर से कहा कि वह गरीब गुरबा और पिछड़े को समाज में सम्मान दिलाने के लिए जेनऊधारियों को हर तरह से सबक सिखाएंगे. वह जेनऊ वगैरह को कुछ नहीं मानते हैं.
उस दौर में लालू प्रसाद यादव वैसे ही कभी भूरा बाल साफ करो तो कभी ब्राह्मण खाय हलुआ, हरिजन खाए अलुआ ई बर्दाश्त करे ललुआ जैसे नारे लगातार दे रहे थे. ऊपर से मंडल कमीशन लागू होने के चलते पूरे बिहार में अगड़ा पिछड़ा के नाम पर समाज जातीय संघर्ष में झुलस रहा था. इन तमाम घटनाओं के चलते पूरे बिहार में सवर्ण खासकर ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत बेहद नाराज था. उसी दौर में ओबीसी के बाहुबली माने जाने वाले राजेश रंजन ऊर्फ पप्पू यादव को राजपूत बिरादरी से आने वाल आनंद मोहन जिस तरह से चुनौती दे रहे थे, उससे सवर्णों के बीच उनकी लोकप्रियता काफी तेजी से बढ़ रही थी. यह बात लालू प्रसाद यादव को अखर रही थी.
क्या था 1994 वैशाली लोकसभा उपचुनाव वाला किस्सा
लालू प्रसाद यादव की पार्टी जनता दल के सांसद शिवशरण सिंह की आकस्मिक मौत हो गई, जिसके चलते वैशाली लोकसभा सीट पर 1994 में उपचुनाव कराने की नौबत आई. ओबीसी समाज से आने वाले बाहुबलियों के सामने आनंद मोहन मजबूती से सवर्णों की ताकत बने थे. तभी समर्थकों की सलाह पर उन्होंने बिहार पीपुल्स पार्टी (BPP) बनाई. उस दौर में इस पार्टी से समूचे बिहार के सवर्ण जुड़ रहे थे.
वैशाली लोकसभा सीट पर उपचुनाव की घोषणा हुई तो लालू प्रसाद यादव की राजनीति को चुनौती देने के लिए आनंद मोहन ने बिहार पीपुल्स पार्टी की बैनर तले अपनी पत्नी लवली आनंद को चुनाव में उतारा. वहीं दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा की पत्नी किशोरी सिन्हा कांग्रेस के टिकट पर भाग्य आजमा रही थीं. किशोरी सिन्हा को लालू प्रसाद यादव का आशीर्वाद मिला था.
1994 का वैशाली उपचुनाव स्थानीय मुद्दों के बजाय लालू प्रसाद यादव के वर्चस्व को खत्म करने के मुद्दे पर लड़ा गया. पूरे चुनाव प्रचार में आनंद मोहन और उनकी पत्नी व प्रत्याशी लवली आनंद सवर्णों को एक होने का आह्वान करते रहे. वहीं लालू यादव चाहते रहे कि आनंद मोहन के बढ़ते कद को थामने के लिए किसी तरह कांग्रेस प्रत्याशी का जीत मिले.
चुनाव के बाद वोटों की गिनती मुजफ्फरपुर के एलएस कॉलेज में हो रही थी. बैलेट पेपर पर चुनाव होने के चलते उन दिनों गिनती में समय लगता था. इस वजह से आनंद मोहन और लवली आनंद पास एलएस कॉलेज के पास स्थित एक मकान में बैठकर वोटों की गिनती का हिसाब किताब लगा रहे थे. शाम करीब साढ़े पांच लवली आनंद के जीत की घोषणा हुई.
इसके बाद आनंद मोहन रौबीली मूंछों पर ताव फेरते हुए काला चश्मा लगाए काउंटिंग सेंटर पर पहुंचे. उनके साथ बीपीपी प्रत्याशी और पत्नी लवली आनंद भी थीं. दोनों आंखों पर काला गॉगल्स लगाए हुए थे. दोनों को देखते ही वहां मौजूद समर्थक गुलाल उड़ाते हुए ‘आनंद मोहन जिंदाबाद’ और ‘लवली आनंद जिंदाबाद’ के इतनी तेजी से नारे लगा रहे थे कि पूरा इलाका गूंजायमान हो गया था.
हालांकि इस चुनाव रिजल्ट के कुछ ही महीने बाद भूमिहारों के बड़े बाहुबली छोटन शुक्ला का मर्डर हो गया. इसके बाद उनकी शव यात्रा में गोपालगंज के डीएम जी कृष्णैया की भीड़ के हाथों हत्या हो गई. उसी मुकदमों वगैरह में नाम आने के बाद आनंद मोहन की राजनीतिक यात्रा गड़बड़ाती ही चली गई. आलम यह हुआ कि जब वह सजायाफ्ता हुए तो पत्नी लवली आनंद अलग-अलग पार्टियों में पाला बदलकर सांसद और विधायक बनती रहीं.
बांकीपुर उपचुनाव की तुलना वैशाली चुनाव से क्यों हो रही?
यानी कुल मिलाकर देखें तो प्रशांत किशोर भी आनंद मोहन की तरह सवर्ण (ब्राह्मण) जाति से आते हैं. उन्होंने बांकीपुर में तमाम जातीय बंधन को तोड़ते हुए वोट हासिल किए हैं, तभी बीजेपी के गढ़ में इतनी बड़ी जीत दर्ज की है. मौजूदा वक्त में भी बिहार का सवर्ण यूजीसी कानून, भरत तिवारी एनकाउंटर, आरक्षण खत्म करने के लिए सोशल मीडिया पर चल रहे आंदोलन, GEN-Z आंदोलन में सरकार के रवैये आदि की वजह से नाराज है. आरोप हैं कि बीजेपी सवर्णों के वोटबैंक को मजबूर मानकर इन मुद्दों पर नाराजगी दूर कर भरोसा कायम करने में दिलचस्पी नहीं दिखा रही है.

