नई दिल्ली. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की दूसरी बार वापसी के बाद वैश्विक भू-राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला. ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में ना केवल वर्ल्ड ऑर्डर में तेजी से बदलाव आ रहा है, बल्कि अमेरिका की कूटनीति में भी परिवर्तन नजर आ रहा है. ट्रंप ने सत्ता संभालते ही अन्य देशों पर टैरिफ बम फोड़ा, जिसने विश्व स्तर पर काफी हलचल पैदा कर दी. राष्ट्रपति ट्रंप दुनिया के तमाम देशों को अमेरिका के साथ व्यापार करने के लिए अपनी शर्तें मानने पर मजबूर कर रहे थे. हालांकि, भारत ने ट्रंप के दबाव के आगे झुकने से साफ इनकार कर दिया.
दरअसल, जनवरी 2025 में ट्रंप ने राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारी संभाली. इसके बाद 28 फरवरी से पहले तक अमेरिकी राष्ट्रपति दुनिया के कई देशों को भारी टैरिफ लगाने की चेतावनी दे रहे थे. वैश्विक व्यापार को लेकर उनके सख्त रुख की लगातार चर्चा हो रही थी और कई देशों के साथ अमेरिका के आर्थिक संबंधों में तनाव देखने को मिल रहा था, हालांकि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू होने के बाद ट्रंप के सार्वजनिक बयानों और प्राथमिकताओं में बदलाव दिखाई दिया.
ईरान के साथ हमलों में उलझने के बाद अमेरिकी सरकार का फोकस व्यापारिक विवादों से पूरी तरह से हट चुका था. बार-बार टैरिफ को लेकर धमकियां देने वाले ट्रंप 28 फरवरी के बाद पश्चिम एशिया की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और रणनीतिक साझेदारियों को लेकर उलझे नजर आए. दिलचस्प बात यह है कि इस दौरान ट्रंप ने न केवल टैरिफ को लेकर अपेक्षाकृत कम बयान दिए, बल्कि भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम को लेकर भी पहले जैसी सक्रिय टिप्पणियां नहीं कीं.
बीते लगभग 100 दिनों का घटनाक्रम देखें, तो कई देशों ने अमेरिका से एक निश्चित दूरी बनाने की कोशिश की है. यूरोप के कुछ देशों ने सैन्य कार्रवाई पर चिंता जताई, जबकि पश्चिम एशिया के कई देशों ने क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिया. ऐसे माहौल में अमेरिका के लिए भारत जैसे बड़े और विश्वसनीय साझेदार का महत्व और बढ़ गया.
यही कारण है कि हाल के समय में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की तरफ से भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सराहना होने लगी. हाल के महीनों में उन्होंने कई अवसरों पर मोदी को एक मजबूत और प्रभावशाली नेता बताया. फ्रांस में जी7 बैठक के इतर पीएम मोदी से द्विपक्षीय मुलाकात के बाद ट्रंप ने उन्हें एक बेहद मजबूत और महान नेता बताया. ट्रंप ने तारीफ करते हुए कहा कि पीएम मोदी ने भारत को युद्धों से दूर रखा है, जो कि बेहद समझदारी भरा कदम है.
भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के प्रमुख रणनीतिक साझेदार के रूप में देखा जाता है और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में भी नई दिल्ली की भूमिका अहम मानी जाती है. अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा है. वाशिंगटन अब यह भली-भांति समझ चुका है कि एशिया-प्रशांत और वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी धाक बचाए रखने के लिए उसे नई दिल्ली के सहयोग की सख्त जरूरत है.
हालांकि, ट्रंप का झुकाव केवल भारत ही नहीं, बल्कि चीन की तरफ भी देखने को मिला. इसका ताजा उदाहरण न केवल उनका चीन दौरा है, बल्कि हाल ही में ट्रंप चीनी समकक्ष जिनपिंग की सराहना करते भी दिखे. चीन को लेकर अमेरिका का रुख पहले की तुलना में कुछ नरम दिखाई दे रहा है.
व्यापारिक टकराव और कड़े बयानों के बावजूद दोनों देश बातचीत बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि ट्रंप का जितना झुकाव बीजिंग की तरफ है, चीन की तरफ से वहीं झुकाव देखने को नहीं मिल रहा है. ट्रंप के चीन दौरे पर यह तस्वीर साफ दिखी. इससे यह तो साफ है कि अमेरिका फिलहाल एक साथ कई मोर्चों पर टकराव से बचना चाहता है.
दुनिया की किसी भी दुर्गम परिस्थिति में भारत ने हमेशा राष्ट्र हित को सबसे पहले रखा है. यही कारण है कि ट्रंप के भारी दबाव के बीच न तो भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद किया, न ही अमेरिका की शर्तों पर व्यापार समझौता किया. चूंकि ईरान और अमेरिका के बीच समझौता हो गया है, ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या ट्रंप पुराने मिजाज में फिर से लौटते हैं? भारत को टैरिफ किंग कहने वाले ट्रंप का तेवर कैसा होगा, इस पर सबकी नजर रहेगी.

