सहरसा. सिमरी बख्तियारपुर विधानसभा क्षेत्र खगड़िया लोकसभा सीट का हिस्सा है और इस बार बिहार की राजनीति में इस बार बेहद अहम हो गया है. ऐसा इसलिए कि सहरसा जिले का यह इलाका कभी कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था, लेकिन अब राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं. बता दें कि 2020 में जब चिराग पासवान ने एनडीए से अलग होकर मैदान में उतरने का फैसला किया था तो यह सीट आरजेडी के खाते में गई थी. उस वक्त उनके उम्मीदवार ने सीधे तौर पर महागठबंधन के वोट बैंक को नहीं, बल्कि एनडीए के वोटों को नुकसान पहुंचाया था. लेकिन, बदले सियासी हालात में अब चिराग पासवान एनडीए में हैं और इस बार यहां तस्वीर उलट सकती है. दरअसल, एलजेपी (रामविलास) से संजय कुमार सिंह को उम्मीदवार बनाया गया है और चिराग पासवान का मानना है कि संजय का स्थानीय कनेक्शन और साफ छवि एनडीए को बढ़त दिला सकती है.
पॉलिटिकल बैकग्राउंड और स्थानीय समीकरण
बता दें कि अब तक इस सीट पर 16 बार विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. आठ बार कांग्रेस, चार बार जेडीयू, दो बार आरजेडी और एक-एक बार जनता दल और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने जीत दर्ज की है. 2020 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी के युसुफ सलाउद्दीन ने वीआईपी के मुकेश सहनी को सिर्फ 1,769 वोटों से हराया था. दिलचस्प बात यह रही कि लोजपा (जो तब एनडीए से अलग थी) को 6,962 वोट मिले थे. यानी अगर लोजपा एनडीए के साथ रहती तो नतीजा पलट सकता था.
सहरसा सिमरी बख्तियारपुर में नीतीश कुमार, चिराग पासवान और संजय कुमार सिंह की रणनीति से एनडीए को बढ़त की उम्मीद.
चिराग की वापसी से एनडीए को बढ़त की उम्मीद
दूसरी ओर इस बार परिस्थिति अलग है. चिराग पासवान फिर से एनडीए में हैं और वही वोट बैंक जो 2020 में बिखर गया था, वह अब एकजुट दिख रहा है. दूसरी ओर आरजेडी इस सीट पर अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश में जुटी है. मुस्लिम और दलित मतदाता यहां निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं. जानकार कहते हैं कि लगभग 72 हजार मुस्लिम वोटर (करीब 20%) और 70 हजार एससी वोटर (19%) हैं. इनके साथ-साथ यादव और पिछड़ी जातियों के मत भी इस बार सियासी समीकरण तय करेंगे. वहीं, चिराग पासवान के लिए भी यह सीट ‘प्रतिष्ठा की परीक्षा’ है, क्योंकि यहां जीत का मतलब होगा-एनडीए में उनकी राजनीतिक साख का फिर से प्रमाण.

