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Kargil Ka Kissa-4: कारगिल युद्ध के शुरूआती दौर में भारतीय सेना चाहती थी कि पाकिस्तान पर चौतरफा दबाव बनाया जाए. इसके लिए भारतीय सेना की तरफ से एयरफोर्स और नेवी को भी ऑपरेशन में शामिल करने की मांग की गई थी. इस मांग पर क्या था सीसीएस का जवाब और किस तरह पाकिस्तान की मिलीभगत का हुआ पर्दाफाश, जानने के लिए पढ़ें आगे…
भारतीय सेना ने कारगिल युद्ध के शुरूआती दौर में एयरफोर्स और नेवी की मदद मांगी थी, लेकिन… (एआई इमेज)
Kargil Ka Kissa-4: कारगिल युद्ध को बीते करीब 27 साल से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन इस जंग से जुड़ी ऐसी कहानियां ऐसी हैं, जिनसे हम अभी तक बेखबर है. इन्हीं कहानियों में एक कहानी युद्ध के शुरूआती दौर में भारतीय सेना के दोहरे संघर्ष की है. जिसका जिक्र पूर्व आर्मी चीफ जनरल वेद प्रकाश मलिक ने बड़ी बेकाकी से किया है. दरअसल, कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना एक लड़ाई कारगिल की चोटियों पर बैठे दुश्मन से लड़ रही थी, जबकि दूसरा संघर्ष दिल्ली में पर्दे के पीछे सैन्य मुख्यालय में चल रहा था. जनरल वेद प्रकाश मलिक ने पर्दे के पीछे चल रहे सघंर्ष को देश के सामने रखा है.
जनरल वेद प्रकाश मलिक के अनुसार, किसी भी घटना की पहली रिपोर्ट में बताया गया आकलन शायद ही कभी संतुलित हो. वह या तो बहुत बढ़ा चढ़ा कर बताया गया होता है, या फिर बहुत निराशाजनक होता है. यह सबक उन्होंने अपने प्रोफेशनल करियर के शुरूआती दौर में सीखा था. उनके अनुसार परिस्थिति का सही आकलन तभी हो सकता है, जब कमांडर खुद जमीन पर जाकर खुद हालात को देखे. कारगिल युद्ध में भी कुछ ऐसा ही हुआ. उन्होंने बताया कि आर्मी हेडक्वार्टर के ऑपरेशंस रूम में 21 मई को हुई चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी (सीओएससी) की मीटिंग में पहली बार कारगिल में हो रही घुसपैठ की पूरी तस्वीर साफ हुई थी.
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- सिर्फ बटालिक सेक्टर तक सीमित नहीं रहा लड़ाई: जनरल वीपी मलिक के अनुसार, बटालिक सेक्टर में घुसपैठियों के साथ शुरू हुई लड़ाई देखते ही देखते 121 (I) इन्फैंट्री ब्रिगेड के सभी बटालियन-डिफेंडेड इलाकों में फैल चुकी थी. सभी जगहों पर हमारी पेट्रोलिंग पार्टियों का सामना घुसपैठियों से होने लगा थाबाधित करने लगे थे.
- भारतीय सेना की आवाजाही: अब तक इस बात का अंदाजा भी लग चुका था कि घुसपैठियों की संख्या एक हजार से अधिक थी. हथियारों से लैस घुसपैठिए के पास मोर्टार और आर्टिलरी का भी सपोर्ट था. उसकी निगाह न केवल नेशनल हाईवे पर थी, बल्कि एलओसी पर मौजूद चौकियों तक जाने वाले सप्लाई रूट्स पर भी उसने आवाजाही बाधित करना शुरू कर दिया था.
- किसी को भी नहीं लगी घुसपैठ की भनक: सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि यह घुसपैठ इतनी गुपचुप तरीके से की गई थी कि एलओसी पर तैनात किसी भी पोस्ट और चौकियों में मौजूद जवानों ने घुसपैठियों को नहीं देखा था. न किसी पोस्ट पर हमला हुआ और न ही उनके आसपास कोई बड़ी मुठभेड़ हुई थी. यानी घुसपैठिए बिना सीधे टकराव के अंदर तक पहुंचने में कामयाब हो गए थे.
- भनक लगते ही भेजी गईं नईं बटालियनें: जैसे-जैसे खतरे की गंभीरता सामने आती गई, सेना ने तुरंत अतिरिक्त जवानों की तैनाती शुरू कर दी. 3 इन्फैंट्री डिवीजन की दो बटालिय 1/11 गोरखा राइफल्स और 12 JAK लाइट इन्फैंट्री को प्रभावित इलाकों में भेजा गया. इन दोनों बटालियनों को 70 इन्फैंट्री ब्रिगेड हेडक्वार्टर के अधीन रखा गया, जिसे बटालिक सेक्टर की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई थी.
- सिख और नागा बटालियनों की भी हुई तैनाती: कारगिल में बदलते हालात को देखते हुए कश्मीर घाटी से 1 नागा और 8 सिख की दो बटालियनों को द्रास सेक्टर भेजा गया. इनकी कमान 56 माउंटेन ब्रिगेड हेडक्वार्टर को दी गई, जिसने इस पूरे सेक्टर की जिम्मेदारी संभाली थी. सेना की स्थिति मजबूत करने के लिए राष्ट्रीय राइफल्स की कुछ यूनिट्स को भी द्रास और कारगिल भेजा गया था.
इस तस्वीर से सामने आई पाकिस्तानी सेना की मिलीभगत
- पाकिस्तान की भूमिका पर गहरा रहा था शक: उस समय तक सेना के भीतर काफी हद तक यह भरोसा हो चुका था कि घुसपैठ के पीछे पाकिस्तान सेना का हाथ है, लेकिन ऐसा कोई सबूत नहीं मिला था जिसे पूरी तरह अंतिम प्रमाण माना जा सके. घुसपैठियों ने अपनी पहचान छिपाने के लिए मुजाहिदीन जैसे साधारण कपड़े पहन रखे थे. हालांकि उनके काम करने का तरीका, रणनीति, हथियारों का इस्तेमाल और लड़ाई की शैली साफ बता रही थी कि वे अच्छी तरह ट्रेंड सैनिक हैं.
- हमलों के तरीके से भी बढ़ा पाकिस्तान की मिलीभगत का शक: शुरुआत में ऐसा माना जा रहा था कि सामने सिर्फ जिहादी घुसपैठिए हैं, लेकिन धीरे-धीरे तस्वीर बदलने लगी. उनके पास ऐसे हथियार थे जो आम तौर पर किसी इन्फैंट्री बटालियन को दिए जाते हैं. वे भारतीय सैनिकों की आवाजाही वाले रास्तों और सप्लाई रूट्स पर आर्टिलरी और मोर्टार से बेहद सटीक हमला कर रहे थे. इससे शक और गहरा हो गया कि यह सिर्फ आतंकी का हमला नहीं है.
- मेल नहीं खा रही थीं इंटेलिजेंस रिपोर्ट और जमीनी हालात: घुसपैठ के दौरान पाकिस्तान के तोपखाने से लगातार गोलाबारी की जा रही थी. दूसरी ओर पाकिस्तान के रेडियो नेटवर्क से मिले इंटरसेप्ट और भारतीय इंटेलिजेंस एजेंसियों की रिपोर्टें यह संकेत दे रही थीं कि घुसपैठिए पाकिस्तानी जिहादी आतंकी हैं. लेकिन, जमीन पर उनकी गतिविधियां और लड़ने का तरीका साफ बता रहा था कि वह आतंकी नहीं, बल्कि ट्रेंड सैनिक हैं.
- 17 मई की हवाई तस्वीर बनी सबसे अहम सुराग: 17 मई को नई दिल्ली के एविएशन रिसर्च सेंटर ली गई. 19 मई को यह तस्वीर सेना मुख्यालय को सौंपी गई थी. इस तस्वीर में पाकिस्तान सेना का एक हेलीकॉप्टर एलओसी पार करके भारतीय क्षेत्र की ओर उड़ता हुआ दिखाई दे रहा था. इस एक तस्वीर ने यह साफ कर दिया था कि चोरी में बैठे घुसपैठियों को पाकिस्तान सेना से सीधे मदद मिल रही है.
- सैटेलाइट तस्वीरों की कमी बनी बड़ी चुनौती: 17 मई को एविएशन रिसर्च सेंटर द्वारा ली गई इस हवाई तस्वीर के अलावा उस समय कोई दूसरी हवाई या सैटेलाइट तस्वीर उपलब्ध नहीं हो सकी थी. इसी वजह से घुसपैठिए कहां-कहां बैठे हैं, उनकी वास्तविक संख्या कितनी है और उनके कब्जे वाले इलाकों का सही आकलन करना बेहद कठिन हो गया थी. सीमित जानकारी के कारण सेना के सामने पूरे हालात की तस्वीर स्पष्ट नहीं थी, जिससे पूरे ऑपरेशन को समझने में बेहद मुश्किलें पैदा हुईं.
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जब सेना ने मांगी एयरफोर्स और नेवी की मदद…
पूर्व आर्मी चीफ वीपी मलिक के अनुसार, कारगिल में हालात लगातार गंभीर होते जा रहे थे. इसी बीच 18 मई को हुई कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की बैठक में पूरे मामले पर विस्तार से चर्चा हुई. सरकार ने सेना को साफ संदेश दिया कि घुसपैठियों को हर हाल में बाहर निकालना है, लेकिन ऐसा करते समय पूरा संयम भी रखना होगा. कोशिश यही थी कि कार्रवाई तो मजबूत हो, लेकिन हालात इतने न बिगड़ें कि दोनों देशों के बीच युद्ध और बड़ा रूप ले ले.
इसी दौरान सेना के उप प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल चंद्र शेखर ने सुझाव दिया कि भारतीय वायु सेना के हेलीकॉप्टरों, फाइटर जेट्स और नेवी का भी इस्तेमाल किया जाए. उनका मानना था कि इससे सेना को बड़ी मदद मिलेगी. लेकिन उस समय सीसीएस ने इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी. माना गया कि इस मुद्दे पर चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के सभी सदस्यों की राय एक जैसी नहीं थी. एक वजह यह भी बताई गई कि उस समय भारत और पाकिस्तान के बीच ट्रैक-2 बातचीत चल रही थी. सरकार नहीं चाहती थी कि कोई ऐसा कदम उठे जिससे तनाव और ज्यादा बढ़ जाए.
एयरफोर्स और नेवी की सही ताकत का इस्तेमाल होता तो…
पूर्व आर्मी चीफ वीपी मलिक के अनुसार, परिस्थितियों को देखकर साफ लगने लगा था कि सिर्फ थल सेना के भरोसे यह लड़ाई लड़ना आसान नहीं होगा. जरूरत इस बात की थी कि भारतीय वायु सेना और नौसेना भी अपनी ताकत का सही समय पर इस्तेमाल करें. अगर तीनों सेनाएं मिलकर काम करतीं, तो दुश्मन पर ज्यादा दबाव बनाया जा सकता था. यह रणनीति सिर्फ कारगिल या लद्दाख तक सीमित नहीं रहनी चाहिए थी, बल्कि पूरी पश्चिमी सीमा को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए थी. उनके अनुसार, उस समय तीनों सेनाओं के सामने अपनी-अपनी चुनौतियां भी थीं. युद्ध की तैयारियों में पूरी नहीं थीं, लेकिन यह भी माना गया कि अगर सेना, नौसेना और वायु सेना मिलकर एक संयुक्त रणनीति बनाकर सीसीएस के सामने एकजुट होकर अपनी बात रखतीं, तो इन कमियों को काफी हद तक दूर किया जा सकता था.
(इस खबर के सभी तथ्य कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना के तत्कालीन प्रमुख जनरल वेद प्रकाश मलिक की किताब ‘कारगिल: फ्रॉम सप्राइज टू विक्ट्री’ से लिए गए हैं.)
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Anoop Kumar Mishra is currently serving as <strong>Assistant Editor at News18 Hindi Digital</strong>, where he leads coverage of strategic domains including aviation, defence, paramilitary forces, international…और पढ़ें

