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Home » All News » क्या सरदार पटेल कश्मीर को भारत में मिलाने के पक्ष में नहीं थे, बाद में उन्होंने मन क्यों बदला
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क्या सरदार पटेल कश्मीर को भारत में मिलाने के पक्ष में नहीं थे, बाद में उन्होंने मन क्यों बदला

HawkNewsBy HawkNewsNovember 3, 2025No Comments10 Mins Read
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कश्मीर के भारत में विलय की प्रक्रिया में सरदार वल्लभभाई पटेल की भूमिका को लेकर इतिहासकारों के बीच हमेशा मतभेद रहे हैं. अक्सर भारत में चुनावों के दौरान ये मसला खूब उछलता है. क्या सच में पटेल शुरू में कश्मीर को भारत में मिलाने के पक्ष में नहीं थे या नेहरू पीओके पर कार्रवाई करके उसे वापस लेने के पक्ष में नहीं थे.

1947 में भारत विभाजन के समय ब्रिटिश भारत में मौजूद 565 रियासतों को ये विकल्प दिया गया था कि वे या तो भारत में मिलें, या पाकिस्तान में या फिर स्वतंत्र रहें. ज्यादातर राज्यों का विलय पटेल और वी.पी. मेनन के कोशिश से हुआ. जम्मू-कश्मीर, हैदराबाद और जूनागढ़ सबसे जटिल मामले थे.

जब विलय की ये प्रक्रिया चल रही थी. पटेल और मेनन लगातार देश की रियासतों के विलय के लिए लगातार व्यस्त थे दौरे कर रहे थे. रणनीतियां बना रहे थे, तब पटेल कश्मीर के भारत में विलय पर बहुत इच्छुक नहीं थे. उनकी शुरुआती सोच यही थी, “कश्मीर अगर पाकिस्तान चाहता है, तो ले जाए.”

कुछ दस्तावेज़ और संस्मरण बताते हैं कि शुरुआत में पटेल कश्मीर को लेकर बहुत उत्साहित नहीं थे, वहीं नेहरू इसे भारत के लिए अनिवार्य मानते थे. इसका उल्लेख गृह मंत्रालय में सरदार पटेल के सचिव वीपी मेनन ने अपनी किताब इंटीग्रेशन ऑफ इंडियन स्टेट्स (Integration of the Indian States, 1956) में किया था.

मेनन लिखते हैं, “कश्मीर के प्रश्न पर सरदार पटेल का शुरुआती दृष्टिकोण यही था कि अगर कश्मीर पाकिस्तान जाना चाहता है, तो हम उसे जाने दें. हमारी चिंता का विषय हैदराबाद है.” मेनन के अनुसार, पटेल को यह व्यावहारिक लग रहा था कि मुस्लिम बहुल कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा बने और हिंदू बहुल जूनागढ़ भारत का.

पंडित नेहरू के पत्राचार किताब में (Collected Works of Jawaharlal Nehru) में नेहरू क्या चाहते हैं, इसका पता चलता है. नेहरू ने 1947 में अपने कुछ पत्रों में लिखा कि “सरदार कश्मीर को लेकर उतने चिंतित नहीं हैं, वे इसे पाकिस्तान जाने देने की बात कहते हैं.” नेहरू और शेख अब्दुल्ला के व्यक्तिगत संबंध भी कश्मीर के सवाल पर नेहरू की सक्रियता का कारण थे और नेहरू चाहते थे कि पाकिस्तान को भारत में रहना चाहिए.

वैसे नवंबर 1947 में पटेल के अपने भाषण में कश्मीर को लेकर यही लगता है कि वो जूनागढ़ और हैदराबाद को लेकर ज्यादा गंभीर थे बजाए कि कश्मीर के.

3 नवंबर 1947 को पटेल ने कहा था, “अगर कश्मीर पाकिस्तान जाना चाहता है, तो हमें उसे जाने देना चाहिए; लेकिन अगर जूनागढ़ भारत से जुड़ना चाहता है, तो पाकिस्तान को भी उसे स्वीकार करना चाहिए.” उन्होंने ये बात दिल्ली के प्रेस क्लब में एक सार्वजनिक सभा में कही थी. इस बात का उल्लेख हिदुस्तान टाइम्स के संपादक रहे दुर्गादास ने सरदार पटेल करेसपोंडेंस, भाग 1 (Durga Das, Sardar Patel’s Correspondence, Vol. 1) में किया.

कब बदला पटेल का रुख

हालात अक्टूबर 1947 में अचानक बदल गए जब पाकिस्तानी कबायलियों ने कश्मीर पर हमला किया. ये 22 अक्टूबर 1947 का दिन था, जब महाराजा हरि सिंह ने मदद मांगी. भारत ने शर्त रखी कि पहले वह विलय के दस्तावेज (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर करें. 26 अक्टूबर को हस्ताक्षर हुए. फिर तुरंत भारतीय सेना कश्मीर में भेजी जाने लगी. इसके बाद पटेल ने पूरी ताकत से कश्मीर की रक्षा और एकीकरण का जिम्मा लिया.

वी.पी. मेनन लिखते हैं, “एक बार जब कश्मीर ने भारत में विलय का निर्णय लिया, तब सरदार ने न सिर्फ इसे स्वीकार किया बल्कि इसकी रक्षा और एकीकरण में पूरा नेतृत्व लिया.”

“जैसे ही महाराजा ने हस्ताक्षर किए, पटेल ने बिना देर किए सेना को भेजने का निर्णय लिया। अगर उस समय विलंब होता, तो श्रीनगर गिर चुका होता.”

जब पाकिस्तान ने कश्मीर में हमला किया, तब पटेल का दृष्टिकोण बिल्कुल बदल गया. उन्होंने कहा, “अब यह सिर्फ एक रियासत का मामला नहीं रहा, यह भारत की आत्मा की लड़ाई है.” इसका उल्लेख राजमोहन गांधी की किताब सरदार पटेल – ए लाइफ (Sardar Patel: A Life) में है.

पीओके को लेकर क्या चाहते थे सरदार पटेल

सरदार वल्लभभाई पटेल ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) को भारत में मिलाने के लिए कोई सीधी सैन्य या राजनीतिक कोशिश नहीं की लेकिन उन्होंने कई बार संकेत दिए कि कश्मीर का पूरा भाग भारत का होना चाहिए. उन्होंने सैन्य स्तर पर कुछ सख्त फैसले लेने की सिफारिश जरूर की. क्योंकि तब भारत ने बढ़त की स्थिति के बाद भी कई मोर्चों पर सेना की कार्रवाई रोक दी थी. जिन हिस्सों पर कबायलियों ने कब्जा कर लिया था, उसे उनके कब्जे में ही रहने दिया.

पटेल की सोच थी, “अगर लड़ाई करनी है तो पूरी करनी चाहिए.” राजमोहन गांधी ने अपनी किताब पटेल – ए लाइफ में लिखा, “पटेल का मानना था कि जब हमने सैनिक कार्रवाई शुरू की है तो उसे आधे में नहीं छोड़ना चाहिए. हमें पाकिस्तान को पूरी तरह पीछे हटाना चाहिए था.”

उन्होंने कई बैठकों में कहा, “अगर हम युद्ध के मैदान में हैं, तो हमें पूरी जीत तक जाना चाहिए. आधा छोड़ देना भविष्य की समस्या बनेगा.” यानी, वे PoK पर भी कब्ज़ा करने के पक्ष में थे लेकिन यह निर्णय प्रधानमंत्री नेहरू ने नहीं माना. जब भारतीय सेना आगे बढ़ रही थी और मीरपुर, पुंछ, गिलगित, स्कर्दू आदि इलाकों में युद्ध चल रहा था, तब नेहरू ने 1 जनवरी1948 में संयुक्त राष्ट्र (UN) में मध्यस्थता की अपील कर दी.

दुर्गादास द्वारा संपादित किताब सरदार पटेल्स करेसपोंडेंस, भाग 1 में एक पत्र का हवाला दिया गया है, जिसमें पटेल ने कहा, “हमने अपने हाथों से अपनी जीत को आधे में बांट दिया. अब ये घाव लंबे समय तक भरेगा नहीं.” इससे स्पष्ट है कि पटेल सीजफ़ायर के खिलाफ़ थे. चाहते थे कि सेना आगे बढ़कर पूरा कश्मीर मुक्त कराए.

पटेल की भूमिका सीमित क्यों थी

पटेल उस समय गृह मंत्री और उपप्रधानमंत्री थे लेकिन रक्षा और विदेश नीति प्रधानमंत्री नेहरू के सीधे अधीन थे. कश्मीर का मामला दोनों से जुड़ा हुआ था. इसलिए अंतिम निर्णय नेहरू और माउंटबेटन ने लिया. उस समय भारत के गर्वनर जनरल रहे माउंटबेटन युद्धविराम के पक्ष में थे ताकि यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद न बने.

मेनन ने अपनी इंटीग्रेशन ऑफ इंडिया में लिखा, “सरदार इस निर्णय से असंतुष्ट थे, लेकिन उन्होंने सरकार की एकजुटता बनाए रखने के लिए इसे सार्वजनिक रूप से चुनौती नहीं दी.”

पटेल ने 1948 में कहा था, “आज अगर हम इस विवाद को अधूरा छोड़ देंगे, तो आने वाली पीढ़ियां इसकी कीमत चुकाएंगी.” (स्रोत: Rajmohan Gandhi – Patel: A Life). उन्हें साफ़ अंदेशा था कि PoK भविष्य में भारत–पाक विवाद का स्थायी स्रोत बनेगा.

अब तत्कालीन किताबों और इतिहासकारों के जरिए ही जानते हैं कि नेहरू और माउंटबेटन ने ऐसा क्यों किया होगा. उन्होंने क्यों सेनाओं की आगे की कार्रवाई जारी नहीं रखी.

सरदार पटेल की 150वीं जयंती आज है.

दिसंबर 1947 से जनवरी 1949 तक क्या स्थिति थी

– 1947 के अक्टूबर में कश्मीर पर पाकिस्तान समर्थित कबायली हमला हुआ.
– 26 अक्टूबर 1947 के दिन महाराजा हरि सिंह के विलय दस्तावेज पर हस्ताक्षर के बाद भारत ने सेना भेजी.
– जनवरी 1948 तक भारतीय सेना ने कश्मीर घाटी का बड़ा हिस्सा, श्रीनगर, बारामूला, उड़ी, जम्मू आदि मुक्त करा लिए थे.
– पश्चिमी हिस्से यानि मीरपुर, पुंछ, गिलगित, स्कर्दू)में पाकिस्तान समर्थित बल अब भी जमे हुए थे.

सेना के पास बढ़त थी, पर रोक का आदेश आया

लेफ्टिनेंट जनरल एल. पी. सेन (1st Brigade, Jammu Front) और जनरल थिम्मैया के संस्मरण बताते हैं कि भारतीय सेना पूरी तरह बढ़त में थी. लेफ्टिनेंट जनरल एलपी सेन ने अपनी किताब स्लेंडर वाज द थ्रेड (1969) में लिखा, “हम आगे बढ़ सकते थे. पूरी कश्मीर घाटी, यहां तक कि मीरपुर और गिलगित तक पहुंच सकते थे.”

दिसंबर 1947 में आदेश मिला कि सेना आगे न बढ़े, क्योंकि भारत सरकार संयुक्त राष्ट्र में मामला ले जा रही है. 31 दिसंबर 1947 को भारत ने कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में ले जाने का फैसला किया. इसका प्रस्ताव गवर्नर-जनरल लॉर्ड माउंटबेटन और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संयुक्त रूप से लिखा.

वीपी मेनन ने लिखा, “माउंटबेटन ने नेहरू को सलाह दी कि भारत को नैतिक ऊंचाई बनाए रखनी चाहिए. यदि हम युद्ध जारी रखते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय राय हमारे खिलाफ़ जाएगी.”

ब्रिटिश अर्काइव्स में रखे लार्ड माउंटबेटन पर्सनल पेपर्स में लिखा है, “हमारे लिए सबसे बड़ी जीत युद्धक्षेत्र में नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र में नैतिक स्थिति मजबूत रखने में होगी.” यानी, माउंटबेटन का मानना था कि भारत को “शांतिप्रिय राष्ट्र” के रूप में प्रस्तुत होना चाहिए, अगर हम पाकिस्तान पर पूरी तरह हमला करते हैं, तो ब्रिटेन और अमेरिका हमें “आक्रामक” मानेंगे.

नेहरू के रुकने के दो मुख्य कारण 

1. अंतरराष्ट्रीय दबाव – 1947 के अंत में ब्रिटेन और अमेरिका दोनों चाहते थे कि दक्षिण एशिया में बड़ा युद्ध न भड़के. ब्रिटिश सेना और भारतीय सेना में तब भी कई ब्रिटिश अफसर थे, लिहाजा ब्रिटेन की सलाह को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करना कठिन था.

राजमोहन गांधी ने पटेल ए लाइफ में लिखा, “माउंटबेटन और ब्रिटिश हुकूमत ने नेहरू को विश्वास दिलाया कि युद्ध जारी रखने से भारत की छवि को नुकसान होगा और आर्थिक सहायता पर असर पड़ेगा.”

2. शेख अब्दुल्ला और लोकतांत्रिक छवि – नेहरू चाहते थे कि कश्मीर भारत में लोकतांत्रिक तरीके से रहे, इसलिए उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में जाकर यह दिखाना चाहा कि “भारत किसी को बल से नहीं रख रहा.” यही कारण था कि उन्होंने जनमत-संग्रह का वादा किया. नेहरू सेलेक्टेड वर्क्स, भाग 5 (Nehru’s Selected Works, Vol. 5, 1948) में कहा गया, “हमारा उद्देश्य सैन्य विजय नहीं, बल्कि जनता की इच्छा से एकीकरण है.”

व्हाइट पेपर ऑन जम्मू एंड कश्मीर में दर्ज है, “भारत और पाकिस्तान दोनों ने युद्धविराम और आगे के राजनीतिक समाधान के लिए सहमति दी थी. युद्धविराम के बाद दोनों देशों की सेनाएं अपनी-अपनी स्थिति पर रुक जाएंगी.”

इस समझ के तहत भारत ने आगे की सैन्य कार्रवाई रोक दी, पाकिस्तान ने भी लाइन ऑफ सीजफायर पर रुकना स्वीकार कर लिया. यही रेखा बाद में सीजफायर लाइन और फिर 1972 में लाइन ऑफ कंट्रोल कहलायी. 13 अगस्त 1948 के संयुक्त राष्ट प्रस्ताव में भी यही कहा गया कि दोनों देश पहले युद्धविराम करें, फिर पाकिस्तान सेना हटाए, फिर भारत “प्लेबिसाइट” करे.

पटेल नहीं थे सहमत

सरदार पटेल इस नीति से सहमत नहीं थे. उन्होंने कहा था, “हमारी सेना बढ़त में थी; यह हमारी गलती है कि हमने अपने हाथ बांध लिए.” (Durga Das – Sardar Patel’s Correspondence, Vol. 1, Letter dated Jan 3, 1948). दिसंबर 1948 की एक बैठक में उन्होंने कहा, “कश्मीर अब हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न बन गया है; इसे अधूरा छोड़ना भविष्य में भयंकर परिणाम देगा.”

आखिर ब्रिटेन की कूटनीति क्या थी

कुछ ब्रिटिश और अमेरिकी दस्तावेज़ बताते हैं कि तब लॉर्ड माउंटबेटन और पाकिस्तान आर्मी के ब्रिटिश कमांडर इन चीफ जनरल ग्रेसी और ब्रिटिश कॉमनवेल्थ ऑफिस के बीच लगातार संवाद था. इतिहासकार एलिएस्टर लैंब ने अपनी किताब कश्मीर ए डिस्पुटेड लीगेसी (1991) में लिखा, माउंटबेटन ने नेहरू को जो सलाह दी उसमें दरअसल ब्रिटिश चिंता ज्यादा थी. ब्रिटेन नहीं चाहता था कि भारत पूरा कश्मीर कब्ज़े में ले, क्योंकि इससे पाकिस्तान का अस्तित्व और पश्चिमी हित दोनों खतरे में पड़ते.

सोर्स
V.P. Menon – Integration of the Indian States (1956)
Durga Das (Ed.) – Sardar Patel’s Correspondence, 1945–1950
Rajmohan Gandhi – Patel: A Life
Jawaharlal Nehru – Selected Works / Correspondence
P.N. Chopra – Sardar Patel and the Indian States
K.M. Munshi – End of an Era: Hyderabad Memories
Lt. Gen. L.P. Sen – Slender was the Thread
White Paper on Jammu & Kashmir (Govt. of India, 1948)
UN Security Council Resolutions, 13 August 1948 & 5 January 1949
Alastair Lamb – Kashmir: A Disputed Legacy (1946–1990)
Mountbatten Papers, British Archives (CAB 129/28)

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