अमेरिका-ईरान जंग के बाद पश्चिम एशिया में हालात ऐसे हो चुके हैं कि अब स्थायी शांति की उम्मीद करना मुश्किल दिखता है. आज सीजफायर हो जाए, तब भी मिसाइलों का खतरा खत्म नहीं होने वाला. ईरान और कई खाड़ी देशों के रिश्ते भरोसे वाले नहीं रह गए हैं. अमेरिका की मौजूदगी, इजरायल-ईरान टकराव, रेड सी संकट और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर खतरे ने पूरी दुनिया को एक बात समझा दी है कि जिस देश के पास अपनी एनर्जी सिक्योरिटी नहीं, उसकी विदेश नीति भी पूरी तरह आजाद नहीं रह सकती. इसीलिए मोदी सरकार ने बुधवार को कोल गैसीफिकेशन स्कीम पर मुहर लगा दी. यह भारत की एनर्जी सिक्योरिटी, स्ट्रेटजिक ऑटोनॉमी का बड़ा सबूत है.
सीधी भाषा में कहें तो भारत अब ऐसा सिस्टम बनाना चाहता है, जिसमें अगर कल खाड़ी में युद्ध छिड़ जाए, तेल के जहाज रुक जाएं या अमेरिका दबाव बनाए, तब भी देश की फैक्ट्रियां, गैस सप्लाई और खाद कारखाने बंद न हों.
भारत की मुश्किल क्या?
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में है, लेकिन ऊर्जा के मामले में उसकी सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वह भारी आयात पर निर्भर है. कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा विदेश से आता है. LNG का बड़ा हिस्सा हमें इंपोर्ट करना पड़ता है. खाद उद्योग गैस पर निर्भर है. शहरों में PNG नेटवर्क तेजी से बढ़ रहा है. उद्योगों में गैस की मांग लगातार बढ़ रही है.समस्या ये है कि इन सबकी सप्लाई उसी पश्चिम एशिया से होती है, जहां सबसे ज्यादा तनाव है.
अगर होर्मुज हमेशा के लिए बंद हुआ तो?
दुनिया का बड़ा तेल कारोबार स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरता है.अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज हमेशा के लिए बंद हो गया, समुद्री रास्तों पर हमला हो गया, तो भारत के लिए आफत और बढ़ सकती है. क्योंकि न सिर्फ तेल गैस इस रास्ता से लाना हमेशा के लिए बंद हो जाएगा, बल्कि तेल और गैस की कीमतें आसमान छू सकती हैं.
भारत जैसे देशों के लिए इसका मतलब होगा महंगा पेट्रोल-डीजल, गैस संकट, खाद महंगी, बिजली उत्पादन पर असर, फैक्ट्रियों की लागत बढ़ना, महंगाई बढ़ना. यानी युद्ध कहीं और होगा, लेकिन असर भारतीय रसोई और उद्योग पर पड़ेगा.
रूस-यूक्रेन युद्ध ने भारत को क्या सिखाया?
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पूरी दुनिया ने देखा कि ऊर्जा सिर्फ आर्थिक मामला नहीं, बल्कि राजनीतिक हथियार भी है. यूरोप रूस की गैस पर निर्भर था. युद्ध शुरू हुआ तो सप्लाई संकट आ गया. फैक्ट्रियां बंद होने लगीं. बिजली महंगी हो गई. भारत ने उस समय रूस से सस्ता तेल खरीदा, लेकिन अमेरिका और पश्चिमी देशों ने इस पर नाराजगी जताई. भारत ने अपने हित में फैसला लिया, लेकिन इससे एक बात साफ हुई- जिस देश को ऊर्जा चाहिए, उसे लगातार वैश्विक दबाव झेलना पड़ता है.
कोल गैसीफिकेशन से भारत क्या बदलना चाहता है?
यहीं से कोल गैसीफिकेशन की असली कहानी शुरू होती है. भारत के पास दुनिया के सबसे बड़े कोयला भंडारों में से एक है. अभी तक इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से बिजली बनाने में होता रहा. लेकिन सरकार अब कोयले को कच्चे माल की तरह इस्तेमाल करना चाहती है. योजना यह है कि कोयले से गैस बने, गैस से यूरिया बने, केमिकल बनें, सिंथेटिक फ्यूल बने और हाइड्रोजन बने. यानी जिस चीज के लिए भारत अभी विदेशों पर निर्भर है, उसे घरेलू संसाधन से तैयार किया जाए.
भारत कैसे होगा खुद का बॉस?
- कोल गैसीफिकेशन सफल हो गया तो इसका साफ मतलब है कि भारत को किसी की नहीं सुननी पड़ेगी. अगर भारत अपनी गैस खुद बनाने लगे, यूरिया के लिए आयात कम कर दे, LNG पर निर्भरता घटा दे, तो विदेश नीति ज्यादा आजाद होगी. अमेरिका की नाराजगी के कोई मायने नहीं रह जाएंगे.
- आज अगर भारत रूस से तेल खरीदता है, तो पश्चिमी देशों की नजर रहती है. अगर कल अमेरिका ईरान पर नए प्रतिबंध लगाए, रूस पर और सख्त पाबंदियां आएं, खाड़ी में संकट बढ़ जाए, तो ऊर्जा आयात करने वाले देशों पर दबाव बढ़ेगा. लेकिन अगर भारत के पास घरेलू विकल्प मजबूत होंगे, तो उसे हर बार ऊर्जा के लिए झुकना नहीं पड़ेगा.
- चीन यही मॉडल पहले से अपना चुका है. चीन काफी समय से कोल टू केमिकल और कोल टू गैस मॉडल पर काम कर रहा है. क्योंकि चीन समझता है कि अगर समुद्री रास्ते बंद हुए तो उसकी अर्थव्यवस्था खतरे में पड़ सकती है. इसलिए उसने घरेलू कोयले से गैस, केमिकल, सिंथेटिक ईंधन बनाना शुरू कर दिया है.
- इसका एक और फायदा होगा. अगर भारत को यूरिया बनाने के लिए गैस बाहर से कम खरीदनी पड़े, तो खाद सब्सिडी पर भी असर पड़ेगा. अगर घरेलू गैस बढ़ी, तो उद्योगों की लागत स्थिर रह सकती है. अगर वैश्विक संकट हुआ, तब भी सप्लाई बनी रह सकती है.

