Sardar Vallabhbhai Patel Birth Anniversary: आपको लुटियंस दिल्ली की एपीजे अब्दुल कलाम रोड (पहले औरंगजेब रोड) के दोनों ओर लगे घने और पुराने नीम, इमली और जामुन के पेड़ों के पीछे बड़े-बड़े बंगले नजर आते हैं. इन्हीं में से एक बंगले के छोटे से हिस्से में सरदार वल्लभभाई पटेल रहते थे. यह 1, औरंगजेब रोड पर स्थित एक निजी बंगला था. यहीं सरदार पटेल ने अपने सहयोगियों के साथ 562 रियासतों को भारतीय संघ में शामिल कराने के लिए काम किया और आजादी के आसपास के मुश्किल दौर में देश की एकता मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई. उस दौर में उनके दो करीबी सहयोगी वीपी. मेनन और जम्मू-कश्मीर मामलों में उनके सलाहकार रहे लेखक रामाधर अक्सर उनसे मिलने आते थे. हैदराबाद रियासत में पुलिस कार्रवाई की रणनीति भी सरदार पटेल ने इसी घर में बनाई थी. ‘ऑपरेशन पोलो’ नाम से शुरू हुई यह कार्रवाई 13 सितंबर, 1948 को सुबह 4 बजे शुरू हुई और अंततः हैदराबाद का भारत में विलय हो गया. उनकी बेटी मणिबेन पटेल भी दिल्ली में उनके साथ रहती थीं.
सरदार पटेल के घर पर लगे एक शिलापट्ट
सरदार पटेल 1946 में दिल्ली आए थे. जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में बनी अंतरिम सरकार में उन्हें गृह और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली. इसके बावजूद उन्होंने अपने लिए सरकारी बंगला नहीं चुना. वह अपने मित्र बनवारी लाल पुरोहित के 1, औरंगजेब रोड स्थित निजी बंगले के एक हिस्से में रहने लगे. बनवारी लाल ने ही उन्हें अपने घर में रहने का प्रस्ताव दिया था. यह अफसोस की बात है कि आजाद भारत के इतिहास की इतनी बड़ी शख्सियत के घर के बाहर स्मृति-शिलापट्ट लगाने की गंभीर कोशिश तक नहीं हुई. ऐसा शिलापट्ट नई पीढ़ी को बताता कि आधुनिक भारत के निर्माण से जुड़ी कई अहम घटनाओं का गवाह सरदार पटेल का दिल्ली वाला घर भी रहा है. सरदार पटेल का जीवन बेहद सादा था. उनका रहन-सहन किसी तपस्वी जैसा था.
सरदार वल्लभभाई पटेल के करीबी सहयोगी रहे रामाधार के पुत्र अमिताभ आधार ने लौह पुरुष के बारे में दिलचस्प जानकारी दी है.
चप्पे-चप्पे पर सरदार पटेल के फैसलों की छाप
‘सरदार वल्लभभाई पटेल ने राजधानी के ऐतिहासिक नॉर्थ ब्लॉक की पहली मंजिल के उस विशाल कक्ष से आजाद भारत की आंतरिक सुरक्षा की निगहबानी करनी शुरू की थी. बेशक, नॉर्थ ब्लॉक का वह कक्ष अपने आप में हमेशा खास रहेगा जिधर से ‘लौह पुरुष’ सरदार पटेल ने स्वतंत्रता के बाद रियासतों का कूटनीति और दृढ़ता से भारत में विलय सुनिश्चित किया था.’ ये जानकारी सरदार पटेल के सहयोगी रामाधार के पुत्र और कला मर्मज्ञ अमिताभ आधार देते हैं. नॉर्थ ब्लॉक के चप्पे-चप्पे पर सरदार पटेल के फैसलों की छाप है. वे सुबह ही यहां नॉर्थ ब्लॉक में आने के बाद रात को 11 बजे के बाद ही अपने आवास में जाया करते थे. लाल बलुआ के पत्थर से बने नॉर्थ ब्लॉक का निर्माण 1930 तक पूरा हो गया था. यहां 1947 तक ब्रिटिश सरकार के भारत में काम करने वाले अहम अफसरों के दफ्तर थे.
मेटकॉफ हाउस में लौह पुरुष
दिल्ली के सिविल लाइंस इलाके में स्थित मेटकॉफ हाउस पटेल के एपीजे अब्दुल कलाम रोड वाले आवास से करीब 15 किलोमीटर दूर है. 21 अप्रैल, 1947 को यहीं उन्होंने आजादी की दहलीज पर खड़े भारत के सिविल सेवकों को संबोधित किया था. उन्होंने अपने भाषण में स्वराज और सुशासन के महत्व पर जोर दिया. पटेल ने सिविल सेवाओं को भारत का ‘स्टील फ्रेम’ कहा था. उनका आशय था कि सरकारी व्यवस्था के अलग-अलग स्तरों पर काम करने वाले अधिकारी देश के प्रशासनिक ढांचे को मजबूती देने वाले स्तंभ हैं.
हत्या से पहले पटेल की गांधीजी से बात
30 जनवरी, 1948 की उस मनहूस शाम महात्मा गांधी की हत्या से पहले उनसे मिलने वाले आखिरी व्यक्ति सरदार पटेल थे. शाम पौने पांच बजे से कुछ पहले पटेल अपने घर से सीधे 5, अल्बुकर्क रोड (अब 5, तीस जनवरी मार्ग) स्थित बिड़ला हाउस पहुंचे. गांधीजी की सर्वधर्म प्रार्थना सभा शुरू होने वाली थी. प्रार्थना स्थल पर लोग जुटने लगे थे. सभा आमतौर पर शाम 5 बजे शुरू होती थी. आकाशवाणी के लिए गांधीजी की प्रार्थना सभाओं की रिकॉर्डिंग करने वाले केडी. मदान भी वहां पहुंच चुके थे. मदान ने बाद में याद करते हुए बताया, ‘जब गांधीजी प्रार्थना सभा में शामिल होने के लिए बिड़ला हाउस से बाहर निकले, तब मेरी घड़ी में शाम के 5 बजकर 16 मिनट हो रहे थे.’ आम तौर पर माना जाता है कि गांधीजी को शाम 5 बजकर 17 मिनट पर गोली मारी गई थी. उस दिन पटेल किसी जरूरी मुद्दे पर गांधीजी से बात करने पहुंचे थे. दोनों के बीच किस विषय पर बातचीत हुई, यह आज भी रहस्य बना हुआ है.
गांधीजी, पटेल और उनके दुख की साझेदार
2 अक्टूबर, 1947 को गांधीजी ने अपना आखिरी जन्मदिन दिल्ली के बिड़ला हाउस में बिताया. उन्होंने दिन का ज्यादातर समय उपवास, प्रार्थना और चरखा चलाने में लगाया. उस दिन सरदार पटेल उनसे मिलने अपने 1, औरंगजेब रोड स्थित आवास से आए थे. गांधीजी ने उनसे खुलकर बात की और पूछा, ‘मैंने ऐसा कौन-सा अपराध किया है कि मुझे यह दुखद दिन देखने के लिए जिंदा रहना पड़ रहा है?’ पटेल की बेटी मणिबेन पटेल ने इस मुलाकात पर विस्तार से लिखा है.
सरदार पटेल का स्मारक क्यों नहीं बना?
सरदार पटेल के 15 दिसंबर, 1950 को मुंबई में निधन के बाद सरकार उस बंगले को अपने अधिकार में लेकर वहां उनका स्मारक बनाना चाहती थी. पर ये हो ना सका. यह सचमुच हैरानी की बात है कि सरदार पटेल जैसी बड़ी शख्सियत का राजधानी में कोई उचित स्मारक नहीं है, जबकि उन्होंने यहां रहते हुए कई ऐतिहासिक फैसले लिए थे. दिल्ली के स्वाधीनता सेनानी बीडी. संतोषी का सरदार पटेल के निवास पर आना-जाना रहता था. वे बताते थे कि उनके घर के दरवाजे सदैव जनता के लिए खुले रहते थे. जिस व्यक्ति ने भारत को एकजुट करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, जिसने अपने मित्र के बंगले के एक छोटे से हिस्से में रहते हुए देश के भविष्य से जुड़े बड़े फैसलों में योगदान दिया और अपने पीछे निजी संपत्ति के नाम पर लगभग कुछ नहीं छोड़ा, उसके दिल्ली वाले पुराने आवास पर उचित स्मारक का न होना सचमुच चौंकाता है.

