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Machan Vidhi Se Karela Ki Kheti: अगर आप भी बेलों वाली खेती करना चाहते हैं खास तौर से करेले की तो मचान विधि सबसे बेस्ट है. करेले जैसी बेलदार फसलों के लिए यह विधि किसी रामबाण उपाय से कम नहीं है. इसमें कम जगह में अधिक और गुणवत्ता से भरपूर उत्पादन पाया जा सकता है. मचान विधि से करेले की खेती करने पर बेलें जमीन पर फैलने की बजाय ऊपर मचान पर बढ़ती हैं. इससे फलों की गुणवत्ता, पैदावार लगभग 20-25% अधिक और पौधों का विकास बेहतरीन होता है. साथ ही इसमें करेले सड़ते नहीं हैं. करेले की बुवाई गर्मी की फसल जून-जुलाई में करें। एक बीज से दूसरे बीज या पौधे से पौधे के बीच की दूरी लगभग 2 फीट होनी चाहिए। बीज को उपचारित करके 2-3 सेंटीमीटर की गहराई में बोएं
खेती में मचान एक ऐसी विधि है, जिसमें फसल की बेलों को जमीन पर फैलाने के बजाय, ऊपर तैयार किए गए ढांचे पर चढ़ाया जाता है. ऐसा करने के लिए खेत में मजबूत बांस, लकड़ी या लोहे के खंभे लगाए जाते हैं और इनके ऊपर तार या रस्सियों का जाल बनाया जाता है. बेलें इस जाल पर फैलकर बेहतर ग्रोथ करती हैं.
जब बेलें मचान विधि से ऊपर चढ़ती हैं, तो पौधों को पर्याप्त धूप और हवा मिलती है. इससे पौधों का विकास तेजी से होता है और पत्तियों में नमी कम रहने के कारण कई प्रकार के रोगों का खतरा भी घट जाता है. स्वस्थ पौधे अधिक फूल और फल देते हैं, जिससे किसानों को खूब फायदा होता है.
मचान विधि से करेले की अच्छी खेती के लिए जल निकासी वाली दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है. खेत की गहरी जुताई करने के बाद प्रति एकड़ 8 से 10 टन सड़ी हुई गोबर की खाद मिलानी चाहिए. इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है और पौधों को शुरुआती पोषण आसानी से मिल जाता है.
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किसानों को बीज बोने से पहले, उसको करीब 24 घंटे पानी में भिगो देना जरूरी होता हैं. इससे अंकुरण की क्षमता बढ़ जाती है. खेत में 2 से 2.5 मीटर की दूरी पर कतारें बनाकर बुवाई की जाती है. उचित दूरी बनाए रखने से बेलों को फैलने के लिए आवश्यकतानुसार जगह मिल जाती हैं.
बलिया के फेमस कृषि एक्सपर्ट प्रो. अशोक कुमार सिंह के अनुसार, फसल की शुरुआती अवस्था में रोजाना सिंचाई करना बहुत जरूरी होता हैं. गर्म मौसम में 5 से 7 दिन के अंतराल पर पानी देना चाहिए, जबकि बारिश के मौसम में आवश्यकता के अनुसार सिंचाई करनी चाहिए. संतुलित मात्रा में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का प्रयोग बेहतर होता है.
मचान से की गई करेले की खेती में बेलों के फल जमीन के संपर्क में नहीं आते हैं, जिससे फलों में सड़न की संभावना कम हो जाती है और कीटों का प्रकोप भी घट जाता है. साफ-सुथरे वातावरण में विकसित फल अधिक आकर्षक और गुणवत्ता से भरपूर होते हैं.
मचान विधि से तैयार होने वाले फल सीधे, चमकदार और आकार में भी बहुत शानदार होते हैं. ऐसे फलों की बाजार में मांग भी अधिक रहती है, जिससे किसानों को अच्छी कीमत मिलती है. यहीं नहीं, इसकी तुड़ाई भी आसान हो जाती है, जिसके कारण मेहनत में भी कमी आती है.
मचान विधि से खेती का जरिया अपनाने से पारंपरिक खेती की तुलना में 20 से 30% तक अधिक उत्पादन होता हैं. हालांकि, देश के कई राज्यों के किसान इस तकनीक को तेजी से अपना रहे हैं. वैज्ञानिक तरीके से खेती कर किसान कम लागत में अधिक मुनाफा कमा सकते हैं और अपनी आर्थिक स्थिति को भी मजबूत बना सकते हैं. निश्चित रूप में यह सबसे टॉप विधि है.

