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आंबेडकर ने क्यों कहा- हिंदू के रूप में नहीं मरूंगा, हिंदू-हिंदुत्व की पूरी कहानी जानिए

HawkNewsBy HawkNewsJuly 2, 2024No Comments8 Mins Read
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नई दिल्ली: लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने संसद में भगवान शंकर की तस्वीर दिखाते हुए कहा था कि मोदीजी ने अपने भाषण में एक दिन कहा कि हिंदुस्तान ने कभी किसी पर हमला नहीं किया। इसका कारण यह है कि हिंदुस्तान अहिंसा का देश है। यह डरता नहीं है। उन्होंने कहा, हमारे महापुरुषों ने यह संदेश दिया- डरो मत, डराओ मत। शिवजी कहते हैं- डरो मत, डराओ मत और त्रिशूल को जमीन में गाड़ देते हैं। वहीं, दूसरी तरफ जो लोग अपने आपको हिंदू कहते हैं वो 24 घंटे हिंसा-हिंसा-हिंसा..नफरत-नफरत-नफरत… आप हिंदू हो ही नहीं। हिंदू धर्म में साफ लिखा है सच का साथ देना चाहिए। राहुल के इस बयान पर देश की सियासत एक बार फिर गरमा गई है। आइए- जानते हैं कि हिंदू और हिंदुत्व का क्या मतलब है और बड़े-बड़े महापुरुषों ने इस बारे में क्या कहा है। यह शब्द कहां से चलन में आया, यह कहानी भी जानते हैं।

मोदी बोले, पूरे हिंदू समाज को हिंसक कहना गंभीर

राहुल गांधी के बयान पर सत्ता पक्ष के सदस्यों ने हंगामा शुरू कर दिया। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उठे और कहा कि ये विषय बहुत गंभीर है। पूरे हिंदू समाज को हिंसक कहना ये गंभीर विषय है। इस मामले पर सियासत गरमा गई है।

Rahul Gandhi in loksabha

हिंदुत्व का वजूद 5000 साल पुराना

इतिहासकार डॉ. दानपाल सिंह बताते हैं कि हिंदुत्व शब्द कब चलन में आया, यह ठीक-ठीक तो नहीं पता, मगर इतिहासिक साक्ष्यों में इसका वजूद 5000 साल पहले से है। आज पूरी दुनिया में हिंदुत्व है, इसमें से करीब 90 फीसदी हिंदू आबादी भारत में रहती है। ईसाई और इस्लाम के बाद हिंदू धर्म दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा धर्म है। यह माना जाता है कि इंडो आर्यन और इंडो यूरोपियन भाषाएं संस्कृत से ही विकसित हुई हैं। सिंधु घाटी सभ्यता यानी हड़प्पा सभ्यता में हिंदुत्व के साक्ष्य मिट्टी की शिव की मूर्तियों में भी देखने को मिलती है। बाद में वैदिक ग्रंथों में भी हिंदू और हिंदुत्व के मौजूद होने के साक्ष्य मिलते हैं।

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हिंदू शब्द कहां से चलन में आया, यह जानिए

दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर राजीव रंजन गिरि कहते हैं कि हिंदू शब्द उत्तर भारत में बहने वाली नदी के नाम पर पड़ा। यह नदी थी सिंधु नदी। हिंदू शब्द या हिंदुत्व भारतीय शब्द नहीं है। जब भारत में फारसी यानी ईरानी आए तो चूंकि उनकी भाषा में स शब्द नहीं है तो वो सिंधु नदी को हिंदू कहने लगे और भारत को हिंदुओं का देश बताने लगे। जब यह शब्द ईजाद हुआ, तब भारत करीब 3000 साल पहले के दौर से गुजर रहा था। britannica.com के अनुसार, हिंदू शब्द यूनानियों और फारसियों की देन है। बाद में 16वीं सदी में मुगलों और तुर्कों से खुद को अलग दिखाने के लिए भारतीयों ने खुद को हिंदू कहना शुरू किया। अंग्रेजी राज में औपनिवेशिक गुलामी से मुक्ति के लिए यह शब्द भारतीयों की पहचान बन गया।

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पहली बार चीन की किताब में हिंदुत्व का जिक्र

चीन की एक किताब है- रिकॉर्ड ऑफ द वेस्टर्न रीजंस। इसे चीन में दातांग शीयूजी या डा तांग शीयूजी कहा जाता है। दरअसल, यह किताब सातवीं सदी में सम्राट हर्षवर्धन के राज में आए चीनी यात्री और बौद्ध भिक्षु ह्वेनसांग की है, जो भारत में 19 साल तक रहे। उन्होंने हिंदुत्व को भारतीयों की धार्मिक आस्था के रूप में बताया है।

राजा राम मोहन राय ने हिंदुत्व का किया जिक्र

डॉ. दानपाल के अनुसार, भारत में सती प्रथा को खत्म कराने वाले युगांतकारी नायक राजा राम मोहन राय ने हिंदुत्व शब्द की शुरुआत की। यह माना जाता है कि उन्होंने पहली बार हिंदुत्व को लेकर 1816-17 में लिखा। 1830 में ब्रिटिश उपनिवेश और अंग्रेजों के खिलाफ हिंदुत्व का इस्तेमाल किया गया। तभी से सनातन हिंदुत्व और खुद को हिंदू बताने का चलन तेजी से शुरू हुआ।

गांधी ने जब कहा था…तो हिंदू धर्म छोड़ दूंगा

महात्मा गांधी ने भी हिंदू धर्म क्या है, इस बारे में बताया है। उन्होंने कहा था- अगर मुझसे हिंदू धर्म की व्याख्या करने के लिए कहा जाए तो मैं इतना ही कहूंगा-अहिंसात्मक साधनों द्वारा सत्य की खोज। कोई मनुष्य ईश्वर में विश्वास नहीं करते हुए भी अपने आपको हिंदू कह सकता है। सत्य की अथक खोज का ही दूसरा नाम हिंदू धर्म है। 20 अक्टूबर 1927 में ‘यंग इंडिया’ में महात्मा गांधी ने “मैं हिंदू क्यों हूं” नाम से एक लेख लिखा। उसमें उन्होंने बताया कि मेरा जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ, इसलिए मैं हिंदू हूं। अगर मुझे ये अपने नैतिक बोध या आध्यात्मिक विकास के खिलाफ लगेगा तो मैं इसे छोड़ दूंगा।

सुभाष चंद्र बोस ने कहा- भारत की एकता के पीछे हिंदू धर्म

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपनी किताब इंडियन स्ट्रगल में लिखा है- भारत का इतिहास दशकों या सदियों में नहीं, बल्कि हजारों वर्षों में गिना जाना चाहिए। भौगोलिक, जातीय और ऐतिहासिक रूप से भारत किसी भी पर्यवेक्षक के लिए एक अंतहीन विविधता का प्रतिनिधित्व करता है। इस विविधता के पीछे एक मौलिक एकता है। सबसे महत्वपूर्ण मजबूत करने वाला कारक हिंदू धर्म रहा है।

नेहरू ने जब कहा था कि जन्म से हिंदू हूं

जवाहरलाल नेहरू ने 1929 में लाहौर कांग्रेस में अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा था कि मैं जन्म से हिंदू हूं, मगर मुझे यह नहीं पता कि खुद को हिंदू कहना या हिंदुओं की ओर से बोलना कितना उचित है। नेहरू एक तर्कवादी थे जो अच्छी तरह जानते थे कि मानवीय मूल्य धार्मिक रूढ़िवादिता से श्रेष्ठ हैं।
धार्मिक दिखावे पर कई लोगों के साथ उनके संघर्ष से पता चलता है कि वे किसी भी तरह के कर्मकांड, धार्मिक अंधविश्वास और जीवन के प्रति अवैज्ञानिक आध्यात्मिक दृष्टिकोण के बिल्कुल खिलाफ थे। उनकी धर्मनिरपेक्ष साख जीवन के प्रति उनके तर्कसंगत मानवतावादी दृष्टिकोण पर आधारित थी और यह जीवन मृत्यु के बाद के जीवन से अधिक महत्वपूर्ण था।

जब आंबेडकर ने कहा-मैं हिंदू के रूप में नहीं मरूंगा

13 अक्टूबर, 1935 को बीआर आंबेडकर ने महाराष्ट्र के नासिक में एक छोटे से शहर येओला में एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने घोषणा की, मैं खुद को हिंदू कहने वाले व्यक्ति के रूप में नहीं मरूंगा! उन्होंने अपने समर्थकों के बीच कहा कि मैं हिंदू धर्म का त्याग करने जा रहा हूं। आंबेडकर का कहना था, मुझे वह धर्म पसंद है जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व सिखाता है, क्योंकि एक व्यक्ति के विकास के लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है जो करुणा, समानता और स्वतंत्रता है। धर्म मनुष्य के लिए है न कि मनुष्य धर्म के लिए। उनके मतानुसार जाति प्रथा के चलते हिंदू धर्म में इन तीनों का ही अभाव था। बाद में आंबेडकर ने 3.65 लाख समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया।

बंकिम चंद्र के आनंदमठ में हिंदुत्व शब्द

हिंदुत्व शब्द का जिक्र पहली बार 1870 के मध्य में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंदमठ में किया गया था। इसके बाद बंगाल में चंद्रनाथ बसु द्वारा 1892 इसका इस्तेमाल किया गया। बाद में इसे बाल गंगाधर तिलक और विनायक दामोदर सावरकर ने अपनाया था। तब इसका इस्तेमाल ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आंदोलन छेड़ने और लोगों को जागरूक करने के लिए किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने जब बताया हिंदुत्व का मतलब

सुप्रीम कोर्ट ने 1966 में शास्त्री यज्ञपुरुष दासजी बनाम अन्य (1966(3) एस.सी.आर. 242) के मामले में यह विचार किया कि क्या हिंदुत्व को सच्चे अर्थों में धर्म कहना सही है? सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश गजेंद्र गडकर ने अपने फैसले में कहा-जब हम हिंदू धर्म के संबंध में सोचते हैं तो हमें हिंदू धर्म को परिभाषित करने में कठिनाई अनुभव होती है।
दुनिया के दूसरे धर्मों के मुकाबले हिंदू धर्म किसी एक ईश्वर की पूजा नहीं करता, किसी एक मत का अनुयायी नहीं है, किसी एक दार्शनिक विचारधारा को नहीं मानता। यह किसी एक प्रकार की मजहबी पूजा पद्धति या रीति नीति को नहीं मानता। व्यापक रूप में इसे जीवन पद्धति माना जा सकता है और इसके सिवा कुछ भी नहीं।
इसी तरह रमेश यशवंत प्रभु बनाम प्रभाकर कुंते (ए.आई.आर. 1996 एस.सी. 1113) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था-हिंदू, हिंदुत्व को संक्षिप्त अर्थों में परिभाषित कर किन्हीं मजहबी संकीर्ण सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता है। इसे भारतीय संस्कृति और परंपरा से अलग नहीं किया जा सकता। यह दर्शाता है कि हिंदुत्व शब्द इस उपमहाद्वीप के लोगों की जीवन पद्धति से संबंधित है।

वर्ल्ड डिक्शनरी में क्या है हिंदुत्व

अंतरराष्ट्रीय शब्दकोष वेबस्टर के अनुसार, हिंदुत्व सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक विश्वास और नजरिये का जटिल मेल है। यह भारतीय उप महाद्वीप में विकसित हुआ। मानवता पर विश्वास करता है। यह एक विचार है जो हर प्रकार के विश्वासों पर विश्वास करता है और धर्म, कर्म, अहिंसा, संस्कार व मोक्ष को मानता है और उनका पालन करता है । यह ज्ञान का रास्ता है, प्रेम का रास्ता है, जो पुनर्जन्म पर विश्वास करता है। यह एक जीवन पद्धति है। अंग्रेजी लेखिका केरीब्राउन ने अपनी चर्चित किताब ‘द इसेन्शियल टीचिंग्स ऑफ हिंदुइज्म’ में कहा है कि आज हम जिस संस्कृति को हिंदू संस्कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय सनातन धर्म या शाश्वत नियम कहते हैं वह उस मजहब से बड़ा सिद्धान्त है जिस मजहब को पश्चिम के लोग समझते हैं। कोई किसी भगवान में विश्वास करे या किसी ईश्वर में विश्वास नहीं करे फिर भी वह हिंदू है। यह एक जीवन पद्धति और मन की एक दशा है।

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