प्रेम कोई भावना नहीं बल्कि आपका अस्तित्व है. प्रेम के बारे में आप कितनी भी बातें कर लें और किताबें पढ़ लें, लेकिन प्रेम ऐसे नहीं होता. रिश्ते में हम प्रेम को एक भावना के रूप में देखते हैं. हम कहते हैं, ‘ओह, मैं तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ!’ फिर हम माँगना शुरू कर देते हैं. ‘देखो, मैं तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ, तुमने मेरे लिए क्या किया है?’ ‘क्या तुम नहीं देखते कि मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ, तुम नहीं समझते?’ हमारा लहजा प्यार से माँग में बदल जाता है. माँग प्यार को नष्ट कर देती है.
रिश्तों में व्यक्ति मुख्य रूप से दो चीजों के बीच फँसा होता है – प्रेम और सम्मान. प्रेम दूरी बर्दाश्त नहीं कर सकता. कोई बात छिपा कर रखी जाए, प्रेम में ये बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. और ऐसे में व्यक्ति सीमाओं का उल्लंघन कर बैठता है. हालाँकि प्रेम में कोई सीमाएं नहीं होती, लेकिन व्यक्ति एक और पहलू भूल जाता है, सम्मान. अहंकार को सम्मान की अपेक्षा होती है. जब सम्मान खोने का डर होता है, तो व्यक्ति एक दूरी बनाने की कोशिश करता है, जिसे प्रेम स्वीकार नहीं करता. सम्मान के लिए दूरी की आवश्यकता होती है, पर जब व्यक्ति छोटी सोच से पूरी तरह बाहर निकल जाता है, तो यह परेशानी नहीं होती. जब आप प्रेम के झरने की तरह होते हैं, तो कोई दूरी नहीं होती. ऐसा होने तक एक अवरोध होता है, एक अहंकार होता है और वह अहंकार सम्मान की मांग करता है.
साथ ही सम्मान में बहुत अधिक निकटता भी स्वीकार नहीं की जाती. जब आपको प्रेम मिलता है तो आप सम्मान की तलाश करते हैं, और जब सम्मान मिलता है तो प्रेम की. जीवन में यही चलता रहता है पर इतनी सूक्ष्मता से कि हम इस पर ध्यान नहीं देते क्योंकि हम बाहरी घटनाओं में उलझे रहते हैं. हम हर चीज को किसी घटना से जोड़ देते हैं लेकिन क्या हम अपने अंदर देखते हैं कि वहां क्या हो रहा है? रिश्तों को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए, इन दो चीजों पर ध्यान देना चाहिए – प्रेम और सम्मान.
प्राचीन ऋषियों ने इसके लिए एक योजना बनाई. वे जानते थे कि हर कोई सम्मान की परवाह किए बिना पूर्ण आनंद की स्थिति में नहीं रह सकता. उन्होंने एक नियम बनाया, भले ही पति-पत्नी में कितना भी प्रेम हो, उन्हें साल में एक महीने के लिए अलग रहना चाहिए. भारत के कुछ हिस्सों में ऐसा ही होता है, जहाँ पत्नी बरसात के मौसम में एक महीने के लिए अपने मायके चली जाती है. दूरी से प्रेम बढ़ता है. जब कोई अपने साथी के साथ 24 घंटे रहता है, तो कोई अर्थ नहीं रह जाता. कोई अनकही बात नहीं होती, कोई तड़प नहीं होती. प्यार और तड़प को साथ-साथ चलना चाहिए.
तड़प प्रेम को संपन्न करती है और प्रेम तड़प को. दोनों का होना आवश्यक है. उस तड़प के लिए एक दूरी बनाने की आवश्यकता है. कुछ भी जानने के लिए उसके विपरीत मूल्य को अनुभव करना चाहिए. जीवन ऐसे विरोधाभासों का एक समूह है. रिश्ते भी दर्द देते हैं. जब कोई उस तीव्र दर्द से गुजरता है तो या तो वह नकारात्मक स्थिति में चला जाता है या वह इसे प्रार्थनापूर्ण स्थिति में बदल देता है. वह अपने भीतर प्रार्थना की शक्ति को बढ़ाता है. दर्द प्रार्थना को और शक्तिशाली बनाता है, क्योंकि जब दर्द होता है तो व्यक्ति अपने भीतर गहराई में चला जाता है.
जब कोई किसी सुख का अनुभव करता है तो वह अपने आप अपनी आँखें बंद कर लेता है, जैसे जब आप किसी फूल को सूँघते हैं या जब आप किसी बहुत अच्छी चीज़ का स्वाद लेते हैं. यह दर्शाता है कि आनंद कहीं गहरे भीतर से आ रहा है. बाहरी वस्तु उस आनंद को बाहर लाने के लिए बस एक दर्पण थी. यह भीतर की किसी भावना को प्रज्ज्वलित करने का एक उपकरण मात्र था. इसीलिए जीसस ने कहा कि ईश्वर का राज्य, स्वर्ग का राज्य व्यक्ति के भीतर ही है. बुद्ध ने कहा कि संसार दुःख से भरा है क्योंकि जब कोई उस दुःख को जान लेता है, तो वह अपने भीतर गहराई से खोजना शुरू कर देता है. श्री कृष्ण भगवद् गीता में कहते हैं कि बुद्धिमान लोग इंद्रियों को नहीं देखते हैं; वे इंद्रियों में आनंद से बहक नहीं जाते हैं. बुद्धिमानी का लक्षण यह है कि व्यक्ति उस स्रोत की खोज करता है जहाँ से आनंद आता है और एक बार जब आप उसके संपर्क में आ जाते हैं, तो किसी भी तरह का भय नहीं रहता. जीवन में कोई घृणा, ईर्ष्या, क्रोध नहीं रहता है. व्यक्ति संसार के सुखों का आनंद तो लेता है, लेकिन उसमें डूबता नहीं है.
सुख का ज्वर व्यक्ति को उसके केंद्र से दूर ले जाता है. और एक बार जब कोई केंद्र से दूर चला जाता है, तो उसका साथी उसके प्रति सम्मान खो देता है. ज्वर संबंधों को नष्ट कर देता है. यदि सम्बन्ध में ज्वर न हो, तो वह सम्बन्ध बना रहता है.
गुरुदेव श्री श्री रविशंकर
गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर एक मानवतावादी और आध्यात्मिक गुरु हैं। उन्होंने आर्ट ऑफ लिविंग संस्था की स्थापना की है, जो 180 देशों में सेवारत है। यह संस्था अपनी अनूठी श्वास तकनीकों और माइंड मैनेजमेंट के साधनों के माध्यम से लोगों को सशक्त बनाने के लिए जानी जाती है।


