शरद पवार की अपील को अनसुना क्यों कर रहे हैं विपक्षी नेता
ममता बनर्जी ने यह भी दावा किया कि अजित पवार वापस अपनी पुरानी पार्टी में आने वाले थे. इस तरह के बिना सिर-पैर के बयान देकर वह क्या साबित करना चाहती हैं? क्या उन्हें पवार परिवार के दुख से ज्यादा अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने की चिंता है? एक वरिष्ठ नेता की मौत पर इस तरह की बयानबाजी करना बहुत ही शर्मनाक है.
हर हादसे के पीछे साजिश देखना विपक्ष की मानसिक बीमारी बन चुकी है
विपक्ष के नेताओं ने अब हर दुर्घटना को सरकार के खिलाफ इस्तेमाल करने की आदत बना ली है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने ममता बनर्जी के सुर में सुर मिलाया है. उन्होंने अहमदाबाद के पुराने विमान हादसे का जिक्र करते हुए जांच की मांग की है. खड़गे साहब को यह समझना चाहिए कि विमान उड़ने की अपनी एक तकनीकी प्रक्रिया होती है.
अजित पवार को श्रद्धांजलि देने उमड़ी हजारों की भीड़ (Photo : PTI)
सरकारी एजेंसियों पर अविश्वास जताकर देश को किस दिशा में ले जाना चाहता है विपक्ष?
ममता बनर्जी का यह कहना कि ‘उन्हें सिर्फ सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा है’ बेहद खतरनाक संकेत है. इसका मतलब है कि उन्हें पुलिस, जांच ब्यूरो और डीजीसीए जैसी संस्थाओं पर कोई यकीन नहीं है. समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भी इसे सही ठहरा दिया. उन्होंने पुराने वीआईपी हादसों का हवाला देकर निष्पक्ष जांच की बात कही है. यह विपक्षी एकता दिखाने का तरीका हो सकता है पर तरीका बहुत गलत है. जब घर का मुखिया खुद कह रहा है कि राजनीति मत करो, तो बाहर वाले क्यों चिल्ला रहे हैं? क्या इन नेताओं को लगता है कि आम जनता इनकी इस चालबाजी को नहीं समझ रही है? जनता देख रही है कि कैसे एक मौत का इस्तेमाल चुनावी माहौल बनाने के लिए किया जा रहा है.
विपक्ष की संवेदनहीनता और राजनीति का गिरता हुआ ग्राफ
विपक्ष के पास मुद्दों की कमी हो सकती है पर संवेदना की कमी होना चिंताजनक है. बीजेपी के नेताओं ने सही कहा है कि ममता बनर्जी ने इंसानियत खो दी है. जब किसी के घर में मातम हो तब ऐसी गंदी राजनीति करना किसी भी सभ्य समाज के लिए सही नहीं है. शिवसेना (यूबीटी) के अनिल देसाई भी अब चार्टर्ड विमानों की संख्या और तकनीकी खराबी पर सवाल उठा रहे हैं. सवाल उठाना गलत नहीं है पर सवाल उठाने का समय और मंशा देखी जाती है. इस समय प्राथमिकता शोक संवेदना व्यक्त करने की होनी चाहिए थी. मगर विपक्ष ने इसे सरकार को घेरने का मौका मान लिया है. यह दिखाता है कि हमारे देश के नेताओं के लिए अब मानवीय मूल्य कोई मायने नहीं रखते. उन्हें बस किसी भी तरह से हेडलाइंस में बने रहना है.
अजित पवार को पोस्टर्स के जरिए श्रद्धांजलि देते लोग. (Photo : PTI)
क्या लाशों पर सियासत करना ही अब विपक्ष का आखिरी रास्ता बचा है?
भारत की राजनीति में हमेशा से एक मर्यादा रही है. नेताओं के बीच मतभेद होते थे पर दुख की घड़ी में सब साथ दिखते थे. मगर पिछले कुछ सालों में यह मर्यादा तार-तार हो गई है. अजित पवार की मौत पर जिस तरह का सर्कस शुरू हुआ है वह डराने वाला है. विपक्षी नेता शायद यह भूल गए हैं कि उनकी यह जिद शरद पवार और उनके परिवार के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसी है. अगर सुप्रीम कोर्ट हर मामले की जांच करने लगा तो बाकी संस्थाओं को बंद कर देना चाहिए. विपक्ष को समझना होगा कि हर चीज को साजिश का नाम देकर वे अपनी विश्वसनीयता ही खो रहे हैं. लोग अब इनके बयानों को गंभीरता से लेना बंद कर चुके हैं.
राजनीति में विरोध जरूरी है पर उसका आधार ठोस होना चाहिए. किसी भी दुर्घटना को बिना किसी सबूत के ‘हत्या’ या ‘साजिश’ कहना अराजकता फैलाना है. इससे न केवल मृतक का अपमान होता है बल्कि जांच कर रही एजेंसियों का मनोबल भी गिरता है. विपक्ष को अब आत्ममंथन करने की जरूरत है. उन्हें सोचना चाहिए कि क्या वे वास्तव में न्याय चाहते हैं या सिर्फ शोर मचाना चाहते हैं. राजनीति अपनी जगह है और संवेदना अपनी जगह. दोनों को मिक्स करना समाज के लिए घातक है. अजित पवार के परिवार को इस समय शांति और साथ की जरूरत है न कि कोर्ट-कचहरी के बयानों की.

