2025 के प्रयागराज महाकुंभ की अखाड़ों में तैयारी चल रही थी। उनके अपने श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़े से सूचना मिली कि संतों को कुंभ के लिए कूच करना है, तो मन नहीं माना। सोचा जीवन का क्या ठिकाना, महाकुंभ बार-बार नहीं आएगा। सुना दिया फैसला कि कुंभ चलेंगे। गुरु का फैसला था तो शिष्यों ने तैयारी की और निजी वाहन से लेकर प्रयाग पहुंच गए।
अब अखाड़े के शिविर में ही एक बिस्तर पर सोए-सोए ही भजन करते हैं। ऑक्सीजन सिलेंडर उनके सिरहाने रखा रहता है, जिसकी मदद से वह सांस ले पाते हैं। दिनचर्या शिष्यों की मदद से पूरी होती है। लेकिन हौसले बुलंद हैं। पूछने पर कहते हैं, सुख-दुख तो जीवन का अंग है लेकिन भजन नहीं छूटना चाहिए। महाकुंभ में तीनों शाही स्नान पर डुबकी लगाने की मंशा है। इसलिए यहाँ आए हैं।
हरियाणा के हिसार जिले से आए श्री महंत इंदर गिरी ने एनबीटी को बताया कि 2021 से अब तक फेफड़ों के छह ऑपरेशन हो चुके हैं लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। डॉक्टरों ने उन्हें हमेशा ऑक्सीजन सपोर्ट पर रहने की सलाह दी है। चार साल से वह ऑक्सीजन पाइप और सिलेंडर के सहारे ही जीवित हैं।
1986 से कुंभ में हो रहे शामिल
श्री मंहत इंदर गिरी 1986 में पहली बार हरिद्वार के कुंभ में शामिल हुए थे। तब से हर कुंभ और अर्धकुंभ में भाग लेते आ रहे हैं। हालांकि, बीमारी के कारण अब वह चलने-फिरने में असमर्थ हैं। उनके शिष्य उन्हें उठाकर सभी स्थानों पर ले जाते हैं और उनकी हर तरह सेवा करते हैं। बीमारी के चलते इंदर गिरी का जीवन अत्यंत संयमित हो गया है। वह सादगी से भोजन करते हैं, जिसमें दाल, रोटी और बिना मसाले की सब्जियां शामिल हैं। नाश्ते में वह दलिया लेते हैं।
परिजनों की इच्छा पर सातवीं पीढ़ी में बने संत
श्री महंत इंदर गिरी बताते हैं कि जब उन्होंने संन्यास लिया तब उनकी उम्र महज 8 साल थी। पढ़ाई दूसरी ही कक्षा तक हो पाई थी। माता-पिता चाहते थे कि वह संत बनें। क्योंकि उनके परिवार में उनसे पहले 6 पीढ़ी संतों की रह चुकी थी। माता-पिता की इच्छा पर वह परिवार की सातवीं पीढ़ी में संत बने। 1980 में उनकी दीक्षा हुई। 2013 के प्रयागराज कुंभ में वह अखाड़े के श्री महंत बनाए गए। महंत इंदर गिरी कहते हैं सिद्ध गणेशजी पर विश्वास है। सुख-दुख तो जीवन के अंग हैं। लेकिन बचपन से जिस रास्ते पर चले हैं, उससे अलग नहीं हो सकते। न ही मनोबल को नीचे गिराया जा सकता है।

