बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सर्वेसर्वा लालू प्रसाद यादव को भारत रत्न दिए जाने की मांग एक बार फिर उठी है. उनकी ही पार्टी के एक नेता ने इसके लिए पहले राष्ट्रपति, केंद्र सरकार को चिट्ठी लिखी और बाद में पटना में पोस्टर भी लगा दिया. इसके साथ ही, इस मसले पर राजनीति गरम हो गई.
लालू को ‘भारत रत्न’ दिए जाने की मांग नई नहीं है. लालू की पत्नी और उनके जेल जाने के वक्त बिहार की मुख्यमंत्री बनाई गईं राबड़ी देवी ने 11 साल पहले ही लालू को ‘भारत रत्न का सच्चा हकदार’ बता दिया था. अब राजद के एक नेता की ओर से एक बार फिर यह मांग उठाई गई है. लेकिन, सवाल है कि लालू को ‘भारत रत्न’ क्यों दिया जाए? मांग करने वाले नेता का तर्क है कि लालू गरीबों के मसीहा हैं, उन्होंने वंचितों के लिए आवाज उठाई. विरोधियों का तर्क कुछ और है.
बिहार भाजपा के नेता नीरज कुमार का कहना है कि क्या भारत रत्न बिहार की कई पीढ़ियों को गर्दिश में धकेलने के लिए? क्या भारत रत्न बिहार की कई पीढ़ियों को बेघरबार करने के लिए? क्या भारत रत्न बिहार में अंधकार का साम्राज्य फैलाने के लिए? क्या भारत रत्न राज्य के उद्योगों पर ताला लगवाने के लिए? क्या भारत रत्न अपहरण को उद्योग का दर्जा दिलवाने के लिए? क्या भारत रत्न उद्योगपतियों को बिहार से बाहर खदेड़ने के लिए? क्या भारत रत्न दर्जनों नरसंहार करवाने के लिए? भारत रत्न की ऐसी कोई कैटिगरी अब तक नहीं बनी!
बता दें कि भारत रत्न सम्मान की शुरुआत 1954 में की गई थी. यह किसी भी क्षेत्र में असाधारण/उत्कृष्ट सेवा या काम के लिए दिया जाता है.
नेताओं के तर्क छोड़ दीजिए. तथ्य की बात कीजिए. लालू यादव सजायाफ्ता मुजरिम हैं. वह भी घोटाला कर जनता का पैसा हड़पने के दोषी हैं. रेल मंत्री रहते कई लोगों को पैसे या जमीन लेकर नौकरियां बांटने के आरोप में केस झेल रहे हैं. इसके अलावा भी उन पर कई केस दर्ज हैं.
समाज में वैमनस्य भी खूब बढ़ा था
जब वह बिहार के मुख्यमंत्री थे तो विकास के मानकों पर बिहार पिछड़ा ही रहा था. अपराध का ग्राफ ऊपर गया था. निवेशकों की राज्य में कोई रुचि नहीं थी. जाति के नाम पर समाज में भेदभाव की भावना उभार पर थी. समाज के निचले तबके को कुछ हद तक आवाज जरूर मिली थी. इसका कारण था कि लालू ने सत्ता के लिए मुस्लिम-यादव-दलित का गठजोड़ बनाया था. इसका राजनीतिक इस्तेमाल करते हुए उन्होंने निचले तबके का आत्मविश्वास जरूर बढ़वाया था, लेकिन इसके साथ ही समाज में वैमनस्य भी खूब बढ़ा था. इस वैमनस्य पर वह काबू नहीं पा सके थे. या कहें कि इस पर काबू करना उनकी राजनीति को सूट नहीं करता था.
लालू ने गरीबों के मसीहा और शोषित-पीड़ित-वंचित को आवाज देने वाले नेता की छवि तो बना ली थी, लेकिन अपनी पार्टी में ही वह इसके अनुरूप काम नहीं कर सके. जब जेल जाने की नौबत आई तो पत्नी को सीएम की कुर्सी पकड़ा दी. बाद में पार्टी चलाने की बात आई तो वहां भी बेटे को ही सत्ता सौंपी. पत्नी, बेटा, बेटी के साथ-साथ करीबी रिश्तेदारों को भी राजनीति में लॉन्च और सेट कर दिया. और तो और, 2024 के लोकसभा चुनाव में राजनीति से दूर रहने वाली एक बेटी को भी चुनाव मैदान में उतार कर सांसद बनवाने की पुरजोर कोशिश की.
इन सब बातों को दरकिनार भी कर दें तो क्या घोटाले के किसी मुजरिम को ‘भारत रत्न’ दिया जा सकता है? यह तो सम्मान का ही सबसे बड़ा अपमान हो जाएगा. ऐसा अपमान करने का जोखिम कोई सरकार ले सकती है भला! वह भी जब सरकार विरोधी पार्टी की हो!
यह सच है कि हाल के दशकों में ‘भारत रत्न’ को भी नेताओं ने राजनीति को साधने का एक हथियार बना लिया है. सत्ता में हैं तो सम्मान देकर और सत्ता से बाहर हैं तो देने की मांग कर. अब तक 50 से अधिक हस्तियों को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया जा चुका है. इनमें गैर राजनीतिक विभूतियों की संख्या 20 से भी कम है.
मोदी सरकार के शुरुआती दो कार्यकालों में दस हस्तियों को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया. 2024 के चुनावी साल से पहले मोदी सरकार ने पंडित मदन मोहन मालवीय, अटल बिहारी वाजेपयी, प्रणब मुखर्जी, असमिया संगीतकार भूपेन हजारिका और आरएसएस नेता नानाजी देशमुख को ‘भारत रत्न’ दिया था.
चुनावी साल (2024) में भी केंद्र सरकार ने जिन पांच विभूतियों को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया उनमें गैर राजनीतिक हस्ती केवल एक है. 2024 के लोकसभा चुनाव से कुछ ही महीने पहले पूर्व प्रधानमंत्रियों पी.वी. नरसिंह राव (1991-96) और चौधरी चरण सिंह (जुलाई 1979-जनवरी 1980) के अलावा हरित क्रांति के जनक डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन, पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और ओबीसी आरक्षण के प्रणेता व बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किए जाने का ऐलान किया गया था.
कांग्रेस के शासन में भी राजीव गांधी ने 1988 में तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव से पहले राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन को ‘भारत रत्न’ दिया था.
मोदी सरकार द्वारा नरसिंह राव को सम्मान देने का सत्ताधारी पार्टी द्वारा यह कह कर प्रचार किया गया कि जिस कांग्रेसी प्रधानमंत्री का कांग्रेस मरने पर भी सम्मान नहीं कर सकी, उसे भाजपा ने देश का सबसे बड़ा सम्मान दिया.
कर्पूरी ठाकुर और चरण सिंह को ‘भारत रत्न’ दिए जाने को नीतीश कुमार और जयंत चौधरी ने भाजपा खेमे से जुड़ने के कारणों में से एक प्रमुख और भावनात्मक कारण बताया.
नीतीश कुमार ने कहा कि हमारी लंबे समय से जो मांग थी (कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न) वह इस मोदी सरकार में ही पूरी हो सकी. जैसे नीतीश ने कर्पूरी के लिए भारत रत्न की मांग का राजनीतिक इस्तेमाल किया, वैसे ही किसी समर्थक ने उनके लिए भी इस सर्वोच्च सम्मान की मांग कर अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश की. और, अब लालू के लिए ‘भारत रत्न’ मांगने वाले नेता भी ऐसा करके अपनी राजनीति ही चमका रहे हैं. ‘भारत रत्न’ सम्मान की बात करें तो सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इसके बहाने की जाने वाली राजनीति पर कैसे रोक लगाई जाए. ऐसा होने पर ही देश के इस सर्वोच्च नागरिक सम्मान का सम्मान बचा रहेगा.
विजय कुमार झा
विजय कुमार झा जनसत्ता.कॉम के पूर्व संपादक हैं और पत्रकारिता में करीब ढाई दशक से सक्रिय हैं. ऑनलाइन मीडिया के अलावा, प्रिंट मीडिया में भी लंबा वक्त गुजारा है. देश के तमाम बड़े अखबारों में अलग-अलग जिम्मेदारी निभाते हुए तरह-तरह के प्रयोग किए हैं और अपने अनुभव को लगातार निखारते रहे हैं. जनसत्ता डिजिटल के पहले संपादक के तौर पर नौ साल की लंबी पारी खेली. उससे पहले दैनिकभास्कर.कॉम में पांच साल रहे. पाठक को केंद्र में रखकर कंटेंट प्लान और प्रेजेंट करना सबसे बड़ी ताकत है. दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, नवभारत टाइम्स जैसे अखबारों में तरह-तरह की जिम्मेदारियां निभा चुके विजय कुमार झा आंचलिक पत्रकारिता की चुनौतियों और बारीकियों को समझने वाले देश के चुनिंदा पत्रकारों में हैं. विजय ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) से पत्रकारिता की पढ़ाई की है. सोशल मीडिया पर फेक न्यूज की बाढ़ और इससे जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए उन्होंने IAMAI-Meta Fact-Checking News Fellowship भी पूरी की है और Certified Fact-Checker हैं. खाली वक्त में गाना सुनना और किताबें पढ़ना पसंद करते हैं.


