कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने से कुछ घंटे पहले डीके शिवकुमार के पास एक ऐसा फोन आया, जिसने सिर्फ बधाई नहीं दी बल्कि आने वाले दिनों की राजनीति का एजेंडा भी तय कर दिया. कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी ने डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनने की शुभकामनाएं दीं, लेकिन इसके साथ ही सबको साथ लेकर चलने की सलाह दी.
सोनिया गांधी की यह सलाह इसलिए खास है, क्योंकि राहुल गांधी जिद के आगे सिद्धारमैया को सरेंडर करना पड़ा और डीके शिव कुमार के लिए कुर्सी खाली करनी पड़ी. सोनिया गांधी जानती हैं कि सिद्धारमैया को किनारे लगाने की कोशिश हुई तो कांग्रेस किनारे लग जाएगी. इसीलिए सीएम की कुर्सी पर बैठते ही उन्होंने डीके शिवकुमार को ‘धर्म’ याद दिलाया.
सिर्फ बधाई नहीं, एक राजनीतिक संदेश
डीके शिवकुमार लंबे समय से मुख्यमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदारों में रहे हैं. 2023 में कांग्रेस की जीत के बाद भी मुख्यमंत्री पद को लेकर उनका और सिद्धारमैया का संघर्ष खुलकर सामने आया था. तब पार्टी नेतृत्व को हस्तक्षेप कर सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री और शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री बनाकर समझौता कराना पड़ा था.
अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं. शिवकुमार मुख्यमंत्री बन गए हैं, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व अच्छी तरह जानता है कि कर्नाटक कांग्रेस में कई शक्ति केंद्र मौजूद हैं. ऐसे में सोनिया गांधी का सबको साथ लेकर चलो वाला संदेश दरअसल सत्ता के भीतर सामंजस्य बनाए रखने की सलाह माना जा रहा है.
कांग्रेस को क्यों है सतर्क रहने की जरूरत?
कर्नाटक कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविध सामाजिक और राजनीतिक संरचना है. लेकिन यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी है. पार्टी में सिद्धारमैया समर्थक खेमे का प्रभाव है, वहीं शिवकुमार का अपना मजबूत संगठनात्मक नेटवर्क है. इसके अलावा क्षेत्रीय नेताओं, जातीय समीकरणों और मंत्रिमंडल की महत्वाकांक्षाओं का भी दबाव रहेगा.
दिल्ली नेतृत्व नहीं चाहता कि सरकार बनने के कुछ महीनों बाद ही गुटबाजी की खबरें सुर्खियां बनने लगें. इसलिए शपथ ग्रहण से पहले ही एक तरह से संदेश दे दिया गया कि मुख्यमंत्री बनने का मतलब अकेले निर्णय लेना नहीं, बल्कि पूरी पार्टी को साथ लेकर आगे बढ़ना है.
सिद्धारमैया को CWC में जगह, क्या यह भी संतुलन का हिस्सा?
दिलचस्प बात यह है कि जिस दिन शिवकुमार मुख्यमंत्री पद संभाल रहे थे, उसी दिन पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को कांग्रेस कार्य समिति (CWC) में शामिल किए जाने की घोषणा भी हुई. राजनीतिक विश्लेषक इसे महज संयोग नहीं मान रहे. एक तरफ शिवकुमार को राज्य की कमान मिली, दूसरी तरफ सिद्धारमैया को राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका देकर सम्मानजनक स्थान दिया गया. इससे कांग्रेस ने दोनों नेताओं के बीच संतुलन साधने की कोशिश की है.
रणदीप सिंह सुरजेवाला ने सिद्धारमैया को पार्टी की बड़ी ताकत बताते हुए जिस तरह उनकी प्रशंसा की, उससे भी संकेत मिला कि कांग्रेस नेतृत्व किसी एक नेता को आगे बढ़ाने और दूसरे को हाशिये पर डालने का जोखिम नहीं लेना चाहता.
शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती
डीके शिवकुमार को संगठन चलाने वाला नेता माना जाता है. संकट के समय पार्टी को बचाने से लेकर विधायकों को एकजुट रखने तक, उन्होंने कई बार अपनी राजनीतिक क्षमता साबित की है. लेकिन मुख्यमंत्री के तौर पर उनकी असली परीक्षा अब शुरू होगी.
उन्हें सिर्फ प्रशासन नहीं चलाना है, बल्कि पार्टी के भीतर विभिन्न गुटों को भी संतुष्ट रखना होगा. मंत्रिमंडल गठन, बोर्ड-निगमों में नियुक्तियां, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और चुनावी वादों को लागू करने जैसे कई मोर्चे उनके सामने होंगे. अगर इनमें कहीं असंतुलन पैदा हुआ तो विपक्ष से ज्यादा चुनौती पार्टी के भीतर से आ सकती है.

