नई दिल्ली. फ्रांस दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वार्ताओं के केंद्र में रक्षा क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी और स्वदेशीकरण का एजेंडा प्रमुखता से उभरकर सामने आया है. विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत अब रक्षा खरीद के पारंपरिक मॉडल से आगे बढ़कर सह-विकास (Co-development), सह-डिजाइन (Co-design), सह-उत्पादन (Co-production) और सह-निर्माण (Co-manufacturing) पर आधारित साझेदारी को प्राथमिकता दे रहा है. विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने स्पेशल ब्रीफिंग में कहा कि राफेल लड़ाकू विमान को लेकर भारत और फ्रांस के बीच जारी चर्चाएं केवल रक्षा उपकरणों की खरीद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका उद्देश्य भारत की स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता को मजबूत करना है. उन्होंने कहा कि भारतीय वायुसेना (आईएएफ पहले से राफेल का संचालन कर रही है, इसलिए दोनों देशों की सरकारों और वायु सेनाओं के बीच इस विषय पर लगातार संवाद हो रहा है.
मिस्री ने रेखांकित किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हर स्तर की वार्ता में यह स्पष्ट किया है कि भारत की रक्षा नीति का मूल उद्देश्य ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ को आगे बढ़ाना है। इसी रणनीति के तहत भारत चाहता है कि रक्षा क्षेत्र में विदेशी सहयोग केवल आयात तक सीमित न रहे, बल्कि तकनीक हस्तांतरण, स्थानीय उत्पादन और भारतीय उद्योगों की भागीदारी को भी बढ़ावा मिले. रणनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो भारत-फ्रांस रक्षा सहयोग अब एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है, जहां फोकस सिर्फ सैन्य क्षमता बढ़ाने पर नहीं, बल्कि भारत को वैश्विक रक्षा विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने पर भी है. राफेल जैसे उन्नत प्लेटफॉर्म के स्वदेशीकरण और उत्पादन में भारतीय भागीदारी बढ़ने से न केवल रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता मजबूत होगी, बल्कि उच्च तकनीक, रोजगार सृजन और रक्षा निर्यात की संभावनाओं को भी नई गति मिलेगी.
राफेल के साथ ही कई मुद्दों पर बात
विदेश सचिव ने बताया कि प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान बातचीत सिर्फ़ राफेल तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग के कई पहलुओं पर चर्चा हुई. मिस्री ने कहा, “आज की बातचीत में राफेल के अलावा कई और विषयों पर चर्चा हुई, लेकिन मुख्य बात यह थी कि किसी भी रक्षा उपकरण या प्लेटफॉर्म के लिए हमें स्थानीय स्तर पर निर्माण और स्थानीय सामग्री के इस्तेमाल को ज़्यादा से ज़्यादा बढ़ाने के मकसद से आगे बढ़ना चाहिए; हमारा सहयोग इसी बात को ध्यान में रखकर तय किया जाना चाहिए.” यह बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस यात्रा के पहले चरण के नीस में खत्म होने के बाद आया. इस दौरान उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ द्विपक्षीय और प्रतिनिधिमंडल स्तर की बातचीत की और ‘भारत इनोवेट्स 2026’ सम्मेलन का संयुक्त रूप से उद्घाटन किया.
94 राफेल विमानों का निर्माण भारत में
इस महीने की शुरुआत में, भारत ने भारतीय वायु सेना के लिए 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने के लिए फ्रांस को लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपये की बड़ी सरकारी-से-सरकारी (G2G) डील के लिए ‘लेटर ऑफ़ रिक्वेस्ट’ (LoR) भेजा था. रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ सूत्रों ने ANI को बताया कि रक्षा मंत्रालय के अधिग्रहण विंग ने पिछले महीने ही इस डील के लिए फ्रांसीसी सरकार के अधिकारियों को ‘लेटर ऑफ़ रिक्वेस्ट’ भेजा था.
इस डील के तहत, 94 राफेल विमानों का निर्माण भारत में फ्रांसीसी कंपनी डसॉल्ट एविएशन द्वारा एक भारतीय कंपनी के साथ मिलकर किया जाएगा.
भारत में राफेल की तादाद 200 से अधिक होगी
सूत्रों के मुताबिक, उम्मीद है कि फ्रांस अगले दो से तीन महीनों में भारत के ‘लेटर ऑफ़ रिक्वेस्ट’ या टेंडर का जवाब देगा और दोनों पक्ष अगले साल तक बातचीत और डील को अंतिम रूप दे सकते हैं. भारत के पास लड़ाकू विमान स्क्वाड्रनों की भारी कमी है और वह बड़ी संख्या में आधुनिक 4.5-जेनरेशन-प्लस राफेल विमानों को शामिल करके इस कमी को पूरा करने की कोशिश कर रहा है. भारतीय वायु सेना और भारतीय नौसेना पहले ही 62 राफेल विमानों का ऑर्डर दे चुकी हैं, और 114 राफेल के नए ऑर्डर के बाद यह संख्या 176 हो जाएगी. भारतीय नौसेना ने समुद्री खतरों से निपटने के लिए ऐसे 31 और विमानों को शामिल करने की इच्छा भी जताई है, जिससे देश में राफेल विमानों की कुल संख्या 200 से ज़्यादा हो सकती है.
पहला राफेल मरीन 2028 में
इस डील के तहत, यह पहली बार होगा जब राफेल विमानों का निर्माण फ्रांस के बाहर किया जाएगा, जिसमें लगभग 50 प्रतिशत स्थानीयकरण (लोकलाइज़ेशन) होगा. इस प्रोग्राम की खास बातें ये हैं: पहली बार ‘मेक इन इंडिया’ के तहत फ्रांस के बाहर राफेल का काम, सरकार-से-सरकार (G2G) के बीच समझौता, कोई बिचौलिया नहीं, पूरे प्रोजेक्ट में पूरी पारदर्शिता, G2G के तहत बड़े पैमाने पर लोकलाइज़ेशन (स्थानीय स्तर पर निर्माण), और भारतीय हथियारों व सिस्टम को जोड़ने का पूरा अधिकार. इससे हमें फाइटर एयरक्राफ्ट को काफी तेज़ी से शामिल करने में भी मदद मिलेगी, क्योंकि ’28 में पहला राफेल मरीन आना शुरू हो जाएगा, और उसके बाद, कुछ समय में – यानी अब से लगभग साढ़े तीन साल बाद – एयर फ़ोर्स के लिए राफेल भी आने शुरू हो जाएंगे.” इस साल फरवरी में DAC से प्रस्ताव को मंज़ूरी मिलने के बाद रक्षा सचिव ने ANI को यह जानकारी दी थी.

