India
oi-Pallavi Kumari
Mohan
Bhagwat
Birthday:
राष्ट्रीय
स्वयंसेवक
संघ
(RSS)
के
प्रमुख
मोहन
भागवत
आज
11
सितंबर
2025
को
75
साल
के
हो
गए।11
सितंबर
1950
को
जन्मे
मोहन
भागवत
न
सिर्फ
संघ
के
सबसे
प्रभावशाली
नेताओं
में
गिने
जाते
हैं,
बल्कि
देश
की
सामाजिक-राजनीतिक
धारा
को
दिशा
देने
वाली
आवाज
भी
बन
चुके
हैं।
2009
में
संघ
की
कमान
संभालने
के
बाद
से
वे
लगातार
संगठन
को
नई
ऊंचाइयों
पर
ले
जाने
का
काम
कर
रहे
हैं।
कभी
“बुजुर्गों
का
संगठन”
कहे
जाने
वाले
RSS
ने
2009
में
एक
बड़े
बदलाव
का
रास्ता
चुना।
2004
लोकसभा
चुनाव
में
बीजेपी
की
हार,
लालकृष्ण
आडवाणी
से
जुड़ी
विवादित
घटनाएं,
प्रमोद
महाजन
की
हत्या,
अटल
बिहारी
वाजपेयी
का
सक्रिय
राजनीति
से
संन्यास
और
तब
के
सरसंघचालक
के.सी.
सुदर्शन
व
विश्व
हिंदू
परिषद
के
अशोक
सिंघल
की
सेहत
बिगड़ने
से
संघ
परिवार
कठिन
दौर
से
गुजर
रहा
था।
ऐसे
समय
में
संघ
की
बागडोर
सौंपी
गई
मोहन
भागवत
को
-जो
तब
तक
अपेक्षाकृत
कम
चर्चित
और
वरिष्ठ
नेताओं
की
तुलना
में
“जूनियर”
माने
जाते
थे।

आज
वही
भागवत
संघ
परिवार
की
36
संस्थाओं
की
दिशा
और
दशा
तय
कर
रहे
हैं,
और
यह
सुनिश्चित
कर
चुके
हैं
कि
पूरा
संगठन
एक
ही
दिशा
में
आगे
बढ़े।
ऐसे
में
आइए
मोहन
भागवत
की
जिंदगी
और
सफर
से
कुछ
रोचक
तथ्य,
जिन्हें
शायद
बहुत
कम
लोग
जानते
होंगे।
▶️
1.
मोहन
भागवत
का
परिवार
और
उनकी
जाति
1950
में
महाराष्ट्र
के
सांगली
जिले
में
जन्मे
मोहन
भागवत
का
परिवार
संघ
के
प्रति
समर्पित
था।
मोहन
भागवत
एक
करहाड़े
ब्राह्मण
परिवार
से
हैं।
मोहन
भागवत
के
दादा
नानासाहेब
संघ
संस्थापक
के.बी.
हेडगेवार
के
सहयोगी
थे।
उनके
पिता
मधुकरराव
गुजरात
में
प्रचारक
रहे।
मां
मालती
संघ
की
महिला
शाखा
से
जुड़ी
हुईं
थीं।
कहा
जाता
है
कि
भागवत
परिवार
का
घर
हमेशा
सभी
के
लिए
खुला
रहता
था।
टकराव
से
दूर
रहकर
समझाने
और
जोड़ने
की
कला,
भागवत
को
विरासत
में
मिली।
मोहन
भागवत,
चार
भाई-बहनों
में
सबसे
बड़े
थे।
पशु
चिकित्सक
के
रूप
में
छह
महीने
चंद्रपुर
में
नौकरी
की,
लेकिन
जल्दी
ही
सब
छोड़कर
अकोला
जिले
के
प्रचारक
बन
गए।
फिर
विदर्भ
और
बिहार
में
काम
किया
और
2000
में
वे
संघ
के
सरकार्यवाह
(जनरल
सेक्रेटरी)
बने।
▶️
2.
मोहन
भागवत
की
शिक्षा
मोहन
भागवत
ने
वेटरिनरी
साइंस
(पशु
चिकित्सा
विज्ञान)
में
स्नातक
की
पढ़ाई
की
और
फिर
कृषि
विज्ञान
में
स्नातकोत्तर
डिग्री
हासिल
की।
डॉक्टर
बनने
का
उनका
सपना
था,
लेकिन
उन्होंने
अपना
जीवन
संघ
को
समर्पित
कर
दिया।
▶️
3.
आपातकाल
के
समय
बने
प्रचारक
1975
में
देश
में
आपातकाल
लगा।
इसी
दौरान
मोहन
भागवत
ने
खुद
को
आरएसएस
के
पूर्णकालिक
प्रचारक
के
रूप
में
समर्पित
कर
दिया।
यहीं
से
उनकी
सक्रिय
यात्रा
की
असली
शुरुआत
हुई।
साल
2009
में
महज
59
साल
की
उम्र
में
मोहन
भागवत
ने
आरएसएस
की
कमान
संभाली।
इस
तरह
वे
संघ
के
सबसे
युवा
सरसंघचालकों
में
शामिल
हो
गए।

▶️
4.
सबसे
लंबे
कार्यकाल
वाले
प्रमुखों
में
शामिल
मोहन
भागवत
संघ
के
तीसरे
सबसे
लंबे
कार्यकाल
वाले
सरसंघचालक
हैं।
उनसे
पहले
माधव
सदाशिव
गोलवलकर
और
बाला
साहेब
देवरस
ने
सबसे
लंबे
समय
तक
यह
पद
संभाला
था।
2018
में
तत्कालीन
राष्ट्रपति
प्रणब
मुखर्जी
ने
उन्हें
औपचारिक
रूप
से
राष्ट्रपति
भवन
में
आमंत्रित
किया।
यह
पहली
बार
था
जब
किसी
आरएसएस
प्रमुख
को
राष्ट्रपति
भवन
बुलाया
गया।
▶️
5.
मानद
उपाधि
से
सम्मानित
नागपुर
स्थित
एनिमल
एंड
फिशरी
साइंसेज
यूनिवर्सिटी
ने
उन्हें
मानद
डॉक्टर
ऑफ
साइंस
(DSc)
की
उपाधि
प्रदान
की।
यह
उनके
शैक्षणिक
और
सामाजिक
योगदान
का
सम्मान
था।
इतनी
बड़ी
संस्था
के
प्रमुख
होने
के
बावजूद
मोहन
भागवत
अपनी
सादगी
के
लिए
मशहूर
हैं।
वे
अक्सर
कम
सुरक्षा
घेरे
में
सफर
करते
हैं
और
जहां
जाते
हैं,
वहां
साधारण
आवास
पसंद
करते
हैं।
संघ
के
भीतर
उन्हें
बेहतरीन
संगठन
कौशल
के
लिए
जाना
जाता
है।
उनके
नेतृत्व
में
संघ
ने
युवाओं
को
जोड़ने
पर
खास
जोर
दिया
और
आधुनिक
आउटरीच
रणनीतियां
अपनाईं।
मोहन
भागवत
ने
संघ
का
संदेश
दुनिया
तक
पहुंचाने
के
लिए
कई
अंतरराष्ट्रीय
मंचों
पर
RSS
का
प्रतिनिधित्व
किया।
इससे
संगठन
की
वैश्विक
छवि
मजबूत
हुई।

▶️
6.
मोहन
भागवत
निजी
जीवन
अन्य
वरिष्ठ
संघ
नेताओं
की
तरह
मोहन
भागवत
ने
भी
अविवाहित
रहकर
अपना
पूरा
जीवन
संगठन
को
समर्पित
किया।
निजी
जीवन
में
उन्होंने
व्यक्तिगत
सुखों
से
दूरी
बनाई
और
संगठन
को
ही
परिवार
माना।
▶️
7.
मोहन
भागवत
ने
RSS
में
क्या-क्या
बदलाव
किए?
आयु
सीमा
तय
की:
संघ
परिवार
की
सभी
संस्थाओं
में
पदाधिकारियों
के
लिए
75
वर्ष
की
आयु
सीमा
लागू
की।
आडवाणी
को
साफ
संदेश
दिया
गया
कि
2009
चुनाव
उनकी
आखिरी
पारी
होगी।
🔹
नई
पीढ़ी
को
मौका:
नितिन
गडकरी
जैसे
अपेक्षाकृत
युवा
नेता
को
बीजेपी
अध्यक्ष
बनाया
गया।
संसद
में
भी
युवा
नेताओं
को
ज़िम्मेदारी
दी
गई।
🔹
संगठन
का
लचीलापन:
खाकी
निकर
की
जगह
पैंट,
शाखा
समय
को
लचीला
बनाया
ताकि
छात्र
और
नौकरीपेशा
लोग
आसानी
से
जुड़
सकें।
🔹
तकनीक
का
इस्तेमाल:
संघ
परिवार
को
इंटरनेट
और
सोशल
मीडिया
के
युग
से
जोड़ा।
🔹
विस्तार
की
नीति:
संगठन
के
दरवाजे
अन्य
दलों
के
नेताओं
के
लिए
खोले
और
आम
जनता
को
अधिक
आकर्षित
किया।
इन
बदलावों
का
असर
दिखा।
2014
का
चुनाव
सिर्फ
बीजेपी
ने
नहीं,
बल्कि
पूरा
संघ
परिवार
मिलकर
लड़ा।
नतीजा-
अभूतपूर्व
जीत।
संघ
के
अंदरूनी
सूत्र
कहते
हैं-
“बहुतों
को
लगता
है
मोदी
भागवत
के
आदमी
हैं,
लेकिन
सच्चाई
इसके
उलट
है।”
-

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