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Bihar News: 32 साल पुराने दानापुर के चर्चित पति-पत्नी दोहरे हत्याकांड में आखिरकार न्यायालय का फैसला आ गया है. जिला एवं सत्र न्यायालय ने लंबे इंतजार के बाद दो दोषियों को उम्रकैद और जुर्माने की सजा सुनाई है, जबकि 11 आरोपितों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया. इस फैसले ने एक ओर पीड़ित परिवार को राहत दी है, तो दूसरी ओर न्यायिक प्रक्रिया की लंबी अवधि पर भी सवाल खड़े किए हैं.

दानापुर में 1994 के पति-पत्नी हत्याकांड में 2 दोषियों को उम्रकैद, न्या में देरी पर सवाल (एआई जेनरेटेड)
पटना. दानापुर के 32 साल पुराने चर्चित पति-पत्नी दोहरे हत्याकांड में अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए दो दोषियों को उम्रकैद और जुर्माने की सजा दी है, जबकि 11 आरोपितों को बरी कर दिया गया है. पटना के दानापुर स्थित व्यवहार न्यायालय में जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रथम कुमार गुंजन की अदालत ने वर्ष 1994 के बहुचर्चित दोहरे हत्याकांड में अहम फैसला सुनाते हुए नसीब लाल यादव उर्फ नरेन्द्र और बंगाली राय को दोषी मानते हुए आजीवन सश्रम कारावास की सजा दी, साथ ही दोनों पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया. बता दें कि यह मामला दुल्हिन बाजार थाना कांड संख्या 40/94 और सेशन ट्रायल संख्या 150/95 से जुड़ा है, जिसमें 2 फरवरी 1994 की रात पति-पत्नी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी .
1994 में पति-पत्नी की गोली मारकर हत्या
32 वर्षों बाद फैसला आने से पीड़ित परिवार को लंबा इंतजार खत्म होने के बाद न्याय मिला है. यह मामला दुल्हिन बाजार थाना कांड संख्या 40/94 और सेशन ट्रायल संख्या 150/95 से जुड़ा है. घटना 2 फरवरी 1994 की देर रात की है, जब धर्मचक निवासी रामजन्म यादव अपने घर की छत पर सो रहे थे और उनकी पत्नी मरछिया देवी कमरे में थीं. उसी दौरान पुरानी रंजिश के चलते आरोपितों ने घर में घुसकर दोनों की गोली मारकर हत्या कर दी थी.
32 साल बाद आया फैसला
मृतक के पुत्र राम परीक्षण यादव के बयान पर मामला दर्ज हुआ था. लंबे समय तक चले इस केस में आखिरकार 32 साल बाद अदालत ने साक्ष्यों और दलीलों के आधार पर दोनों आरोपितों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई. इस फैसले के बाद मृतक के परिजनों ने खुशी जताई और कहा कि भले ही देर से, लेकिन न्याय मिला.
2 दोषी, 11 बरी, कई आरोपितों की मौत
प्रभारी अपर लोक अभियोजन पदाधिकारी दानापुर सह अधिवक्ता रामकेश्वर प्रसाद ने बताया कि इस मामले में कुल 13 आरोपितों में से 2 को दोषी करार दिया गया, जबकि 11 अन्य आरोपितों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया. इस मामले में कुल 21 आरोपित थे, जिनमें से कई की मौत हो चुकी है.
पीड़ित परिवार के लिए संतोष का पल, पर सवाल भी
करीब तीन दशक तक चले इस मुकदमे में आए फैसले ने यह साबित किया कि न्याय भले ही देर से मिले, लेकिन मिलता जरूर है. हालांकि, इतने लंबे समय तक चले ट्रायल के दौरान कई आरोपितों की मौत हो जाना और कई का बरी हो जाना न्यायिक प्रक्रिया के लंबे होने की नकारात्मक पहलू को भी दिखाता है. पीड़ित परिवार के लिए यह फैसला एक तरह से संतोष का पल है, लेकिन यह मामला यह भी याद दिलाता है कि न्याय की गति को तेज करना समय की बड़ी जरूरत है.
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