Last Updated:
Ballia Farmer Success Story: बलिया के बांसडीह तहसील के मिरीगिरी गांव के रहने वाले जयप्रकाश पांडेय ने बताया कि जैविक खेती के लिए उन्हें गोबर और गोमूत्र की जरूरत थी, क्योंकि वे किसी भी बाजारू खाद का इस्तेमाल नहीं करते. घर में भी रोजाना 7 से 8 किलो दूध की जरूरत होती थी. ऐसे में बेटे की सलाह पर उन्होंने पहली गाय खरीदी जिसका नाम प्यार से लक्ष्मी रखा. यहीं से उनकी असली कमाई की शुरुआत हुई.
बलिया: बलिया जिले के एक प्रगतिशील किसान ने अपनी सूझबूझ और वैज्ञानिक तरीकों से खेती में बड़ी सफलता हासिल की है. उत्तर प्रदेश के इस किसान की कहानी नींबू की बागवानी और मधुमक्खी पालन से शुरू होती है. जब उन्होंने मधुमक्खी पालन शुरू किया तो उन्हें पता चला कि रासायनिक दवाओं के छिड़काव से मधुमक्खियां मर जाती हैं. इस अनुभव ने उनकी जिंदगी को एक नया मोड़ दिया. उन्होंने रासायनिक खेती छोड़कर पूरी तरह से जैविक खेती अपनाने का फैसला किया. इस फैसले के बाद तो जैसे उनके लिए पैसों की बारिश होने लगी.
बांसडीह तहसील के मिरीगिरी गांव के रहने वाले जयप्रकाश पांडेय ने बताया कि जैविक खेती के लिए उन्हें गोबर और गोमूत्र की जरूरत थी, क्योंकि वे किसी भी बाजारू खाद का इस्तेमाल नहीं करते. घर में भी रोजाना 7 से 8 किलो दूध की जरूरत होती थी. ऐसे में बेटे की सलाह पर उन्होंने पहली गाय खरीदी जिसका नाम प्यार से लक्ष्मी रखा. यहीं से उनकी असली कमाई की शुरुआत हुई. धीरे-धीरे उनका गौपालन बढ़ता गया. उन्हें राजभवन से 2 गिर नस्ल की गायें भी मिलीं. आज उनके पास गिर और साहीवाल नस्ल की लगभग 14 गायों का गौशाला है. उन्होंने अपने यहां बछड़े भी तैयार किए हैं, ताकि भविष्य में उन्हें कृत्रिम गर्भाधान पर निर्भर न रहना पड़े.
आधुनिक गौशाला और रोजगार के अवसर
इस किसान की गौशाला आधुनिक तकनीक का बेहतरीन उदाहरण है. यहां 20 गायों के एक साथ चारा खाने के लिए खास नाद बनाई गई है. नीचे काउ मैट बिछाई गई है, जो पशुओं को आराम देती है और गोमूत्र भी एक जगह इकट्ठा हो जाता है. पूरे शेड को मच्छरदानी से सुरक्षित किया गया है, ताकि पशु बीमार न पड़ें. गायों को नहलाने के बाद निकलने वाला पानी भी बर्बाद नहीं होता, बल्कि सीधे नींबू के बाग में पहुंचकर सिंचाई का काम करता है. जिससे पौधों की ग्रोथ अच्छी होती है. मधुमक्खियों से बेहतर परागण होने के कारण नींबू के बाग की पैदावार भी दोगुनी हो गई है.
यानी एक ही मॉडल से शहद, घी, मट्ठा, जैविक खाद, गोमूत्र और बागवानी, सब एक-दूसरे को मजबूत बना रहे है. इस किसान ने अपनी जमीन का शानदार उपयोग किया है. उन्हें खुद राज्यपाल ने सम्मानित किया है और राज्यपाल ने ही इस गौशाला का उद्घाटन भी किया है. उन्होंने 6 लोगों को रोजगार भी दिया है.
दूध से घी तक का सफर और लाखों का मुनाफा
एक लीटर दूध तैयार करने में करीब 72 से 73 रुपये की लागत आती है, जबकि बाजार में दूध 40 से 50 रुपये प्रति लीटर मिलता है. इस घाटे को समझते हुए उन्होंने दूध बेचने के बजाय मूल्य संवर्धन का रास्ता चुना. उन्होंने दूध और दही से पारंपरिक बिलौना विधि से मक्खन बनाना शुरू किया और फिर उससे शुद्ध देसी घी बनाने लगे. उनका घी लगभग 3,000 रुपये प्रति किलो के भाव से बिकता है.
हर महीने लगभग 30 किलो घी की बिक्री होती है. यानी लगभग 90 हजार रुपये का मासिक टर्नओवर है. नींबू और मधुमक्खी पालन से होने वाला मुनाफा अलग है. सालाना केवल घी से ही लगभग 10 से 11 लाख रुपये तक का टर्नओवर हो जाता है. इसके अलावा वे मट्ठा भी 25 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेच देते है. जिसका मुनाफा अलग है.
About the Author
काशी के बगल चंदौली से ताल्लुक रखते है. बिजेनस, सेहत, स्पोर्टस, राजनीति, लाइफस्टाइल और ट्रैवल से जुड़ी खबरें पढ़ना पसंद है. मीडिया में करियर की शुरुआत ईटीवी भारत हैदराबाद से हुई. अभी लोकल18 यूपी के कॉर्डिनेटर की…और पढ़ें

