नई दिल्ली. जब दुनिया की महाशक्तियां जर्मेनियम जैसी दुर्लभ धातु की जंग में एक-दूसरे की गर्दन मरोड़ रही हैं और चीन अपनी सप्लाई चेन को हथियार बनाकर वैश्विक बाजार को घुटनों पर लाने की कोशिश कर रहा है, तब भारत के एक स्टार्टअप ने रक्षा क्षेत्र में वो खेला कर दिया है जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी. हैदराबाद की EON Space Labs ने न केवल जर्मेनियम की सदियों पुरानी बादशाहत को खत्म किया है बल्कि बिना एक ग्राम इस धातु का इस्तेमाल किए ऐसा स्वदेशी थर्मल आई (Thermal Eye) तैयार किया है जो अंधेरे में भी दुश्मन की धड़कनें पहचान लेता है. 2 किमी दूर से इंसान और 8 किमी दूर से टैंकों को सूंघ लेने वाली यह तकनीक सिर्फ एक कैमरा नहीं बल्कि भारत की उस आत्मनिर्भरता का शंखनाद है जिसने विदेशी प्रतिबंधों और महंगी आयात नीति के ताबूत में आखिरी कील ठोक दी है.
जर्मेनियम का संकट और भारत की मजबूरी
थर्मल कैमरों के लेंस बनाने के लिए जर्मेनियम सबसे जरूरी धातु मानी जाती है. भारत अपनी जरूरत का 100 प्रतिशत जर्मेनियम आयात करता है. 2023 के बाद से भू-राजनीतिक तनाव और चीन द्वारा निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण इसकी कीमतें तीन गुना बढ़ गई हैं. इज़राइल भारत को 15% इलेक्ट्रो-ऑप्टिक्स सप्लाई करता है. उसने भी युद्ध के कारण निर्यात रोक दिया है. ऐसे में Lumira का आना भारत के लिए किसी वरदान से कम नहीं है.
बिना जर्मेनियम के कैसे देखता है यह कैमरा?
1. चाल्कोजेनाइड ग्लास (Chalcogenide Glass): साधारण कांच इन्फ्रारेड लाइट को ब्लॉक कर देता है. EON Space Labs ने जर्मेनियम की जगह सल्फर, सेलेनियम और टेल्यूरियम जैसे तत्वों से बने चाल्कोजेनाइड ग्लास का उपयोग किया है, जो गर्मी (Thermal Radiation) को आसानी से पकड़ लेता है.
2. ए-थर्मलाइज्ड डिजाइन (A-thermalised Design): हिमालय की -20 डिग्री ठंड हो या राजस्थान की 55 डिग्री गर्मी, लेंस का आकार बदलने से फोकस बिगड़ जाता है. कंपनी ने एक विशेष मैकेनिकल और कोटिंग सिस्टम बनाया है जो तापमान के साथ खुद को एडजस्ट करता है और इमेज को धुंधला नहीं होने देता.
3. AI और एज कंप्यूटिंग: यह कैमरा 2 किमी दूर से इंसान और 8 किमी दूर से वाहन को पहचान सकता है. इसका AI केवल गर्मी नहीं देखता बल्कि पैटर्न पहचानता है. उदाहरण के लिए, एक गर्म पत्थर स्थिर रहता है जबकि इंसान के चलने का एक खास जैविक तरीका होता है.
प्रमुख विशेषताएं
· हल्का और तेज: जर्मेनियम की तुलना में नई धातु का घनत्व कम है, जिससे पेलोड का वजन मात्र 800 ग्राम से 2.2 किलोग्राम के बीच है. इससे ड्रोन का फ्लाइट टाइम बढ़ जाता है.
· स्वदेशी AI मॉडल: डेटा प्रोसेसिंग के लिए क्लाउड या सर्वर की जरूरत नहीं है. सब कुछ ड्रोन के अंदर लगे चिप पर होता है जिससे दुश्मन इसे जैम (Jam) नहीं कर सकता.
· मिलिट्री ग्रेड: यह सिस्टम MIL-STD-810H मानकों पर खरा उतरता है यानी यह अत्यधिक झटकों और खराब मौसम को झेलने में सक्षम है.
· भविष्य की तैयारी: कंपनी 2026 तक रेवेन (Raven) नामक सिस्टम बना रही है, जो सुसाइड ड्रोन्स को ट्रैक करने में सक्षम होगा.
सवाल-जवाब
जर्मेनियम मुक्त कैमरा भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
क्योंकि भारत जर्मेनियम के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर है. चीन और अन्य देशों के प्रतिबंधों से थर्मल कैमरों की लागत बढ़ गई थी. यह स्वदेशी तकनीक भारत को रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में ‘आत्मनिर्भर’ बनाती है.
क्या यह कैमरा चट्टान और इंसान के बीच अंतर कर सकता है?
हां, इसमें मौजूद AI ‘स्पेशियल और टेम्पोरल पैटर्न रिकग्निशन’ का उपयोग करता है. यह केवल गर्मी के बजाय इंसान के चलने के तरीके और उसके शरीर की बनावट के डेटा का विश्लेषण कर सटीक पहचान करता है.
इस नए पेलोड से ड्रोन की क्षमता पर क्या असर पड़ेगा?
वजन कम होने के कारण ड्रोन की बैटरी कम खर्च होगी, जिससे वह ज्यादा देर तक हवा में रह सकेगा. साथ ही, हल्का होने के कारण इसे छोटे ड्रोन्स और eVTOLs पर भी लगाया जा सकता है.

