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BrahMos Missile Deal: चीन जिस तरह से दक्षिण चीन सागर के छोटे-छोटे हिस्से पर कब्जा करता जा रहा है, वैसे में उसके सभी पड़ोसी देश जिनसे उसका विवाद चल रहा है, अपने हथियार भंडार को बढ़ा रहा है.
भारत ने परोक्ष रूप से चीन को निशाने पर ले लिया है. (फाइल फोटो)
नई दिल्ली. भारत की ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल, जिसे देश के डिफेंस प्रोडक्ट्स का “क्राउन ज्वेल” माना जाता है, दक्षिण पूर्व एशियाई बाजार में अपनी उपस्थिति बढ़ाने के कगार पर है. कई नई डील्स के अंतिम चरण में होने की खबरें आ रही हैं. ब्रह्मोस मिसाइल भारत के डीआरडी और रूस के एनपीओ माशिनोस्त्रोयेनिया के बीच एक ज्वॉइंट वेंटर प्रोडक्ट है. इस मिसाइल का नाम ब्रह्मपुत्र और मस्कवा नदियों से लिया गया है. हाल के दिनों में, इंडोनेशिया के भारत से शक्तिशाली ब्रह्मोस सुपरसोनिक एंटी-शिप क्रूज मिसाइल खरीदने के समझौते के करीब होने की खबरें मीडिया में सुर्खियां बटोर रही हैं.
इन घटनाक्रमों के बीच, फिलीपींस, जो पहले से ही इस मिसाइल का उपयोग कर रहा है, इसकी ताकतों पर अपना विश्वास फिर से जताते हुए, इस बार अपनी सेना के लिए एक और बड़े ऑर्डर की दिशा में आगे बढ़ रहा है. रिपोर्ट्स के अनुसार, मनीला नई दिल्ली के साथ अतिरिक्त ब्रह्मोस मिसाइल बैटरियों को सुरक्षित करने के लिए बातचीत में है. फिलीपींस ही वो पहला देश है, जो भारत निर्मित ब्रह्मोस मिसाइल का पहला ग्राहक होने का खिताब रखता है.
2022 में, फिलीपींस ने अपनी नौसेना के लिए ब्रह्मोस मिसाइल के तट-आधारित, एंटी-शिप वेरिएंट की तीन बैटरियों के लिए भारत के साथ 375 मिलियन अमेरिकी डॉलर का सौदा किया था. पहली खेप पिछले साल नई दिल्ली द्वारा वितरित की गई थी. 23 जनवरी से 11 फरवरी, 2023 तक, फिलीपींस नौसेना के 21 कर्मियों ने नागपुर में ब्रह्मोस सिस्टम के संचालन और रखरखाव पर प्रशिक्षण हासिल किया. प्रशिक्षण पूरा करने पर, उन्हें तत्कालीन भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल आर. हरि कुमार द्वारा अंतरिम मिसाइल बैज प्रदान किए गए थे.
नई रिपोर्ट के अनुसार, फिलीपींस नौ अतिरिक्त ब्रह्मोस तटीय मिसाइल बैटरियों को प्राप्त करने की संभावना तलाश रहा है. फिलीपींस ने पहले अपने मिसाइल भंडार को बढ़ाने में दिलचस्पी जाहिर की है. 2023 में, तत्कालीन फिलीपींस सेना प्रमुख ने एडवांस मिसाइल सिस्टम, जिसमें भारत की ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइलें और अमेरिकी HIMARS MLRS शामिल हैं, को प्राप्त करने की योजना की घोषणा की थी.
उस समय, यह अनुमान लगाया गया था कि फिलीपींस सेना केवल दो ब्रह्मोस बैटरियों का अधिग्रहण करेगी. फिलीपींस सशस्त्र बलों की दो सेवाओं में तटीय रक्षा संचालन के लिए कुल पांच ब्रह्मोस बैटरियों को तैनात करने की उम्मीद थी.
चीन के खिलाफ ब्रह्मोस का जलवा
ब्रह्मोस मिसाइल को जमीन, समुद्र और हवा से लॉन्च किया जा सकता है और यह सतह और समुद्र आधारित खतरों को निशाना बना सकती है. यह कई वर्षों से भारतीय सशस्त्र बलों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है. यह मिसाइल मैक 2.8 की गति तक पहुंच सकती है, जो ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना तेज है, और इसकी रेंज 300 से 500 किलोमीटर के बीच होती है, जो इसके वेरिएंट और लॉन्च प्लेटफॉर्म पर निर्भर करती है.
दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में इस मिसाइल के प्रति काफी रुचि देखी जा रही है. उदाहरण के लिए, इंडोनेशिया 450 मिलियन अमेरिकी डॉलर के सौदे पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार है, जो मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत का सबसे बड़ा रक्षा निर्यात समझौता होगा. राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो, जो गणतंत्र दिवस समारोह के लिए भारत के मुख्य अतिथि होंगे, अपने दौरे के दौरान इस सौदे को अंतिम रूप दे सकते हैं.
यूरेशियन टाइम्स में प्रकाशित खबर के मुताबिक, वियतनाम भी भारत के साथ लगभग 700 मिलियन अमेरिकी डॉलर के मूल्य की मिसाइल खरीदने के लिए बातचीत कर रहा है, जो इंडोनेशिया के सौदे से बड़ा होगा. हालांकि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि कौन सा देश पहले सौदा करेगा, जो भी करेगा, वह ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल प्राप्त करने वाला दूसरा देश बनने का गौरव प्राप्त करेगा.
मलेशिया ने भी ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने में गहरी रुचि दिखाई है, लेकिन फिलीपींस, इंडोनेशिया और वियतनाम के विपरीत, जो एंटी-शिप वेरिएंट पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, मलेशिया कथित तौर पर ब्रह्मोस एनजी – मौजूदा सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का एक अधिक कॉम्पैक्ट वेरिएंट – को टारगेट कर रहा है. ब्रह्मोस मिसाइल की मांग में वृद्धि दक्षिण चीन सागर और पश्चिमी प्रशांत में चीन के सैन्य विस्तार के जवाब में दक्षिण पूर्व एशियाई देशों द्वारा अपने रक्षा भंडार को मजबूत करने की रणनीतिक पुनर्संरचना को भी दर्शाती है.
इस प्रकार, ब्रह्मोस मिसाइल दक्षिण चीन सागर के तटीय राज्यों की सैन्य ताकतों के लिए एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण संपत्ति बन गई है, जिससे भारत के रक्षा निर्यात क्षेत्रीय भू-राजनीतिक सुरक्षा ढांचे को आकार देने में एक निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित हो रहे हैं. दूसरी ओर, वर्षों से समुद्री सीमा विवादों की ओर इशारा करते हुए बीजिंग ने इन देशों को ब्रह्मोस मिसाइलों के निर्यात पर चुपचाप आपत्ति जताई है. कुछ रिपोर्टों के अनुसार, चीन ने इन बिक्री को रोकने के लिए मॉस्को से भी संपर्क किया, लेकिन ऐसी आपत्तियां अब फीकी पड़ गई हैं और लेन-देन पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ा है.
New Delhi,Delhi
January 17, 2025, 21:06 IST

