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कर्नाटक इस समय गंभीर सूखे के दौर से गुजर रहा है. राज्य के 100 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया जा चुका है. अब पीने के पानी और बिजली की भारी किल्लत का खतरा मंडरा रहा है. राज्य में बिजली की मांग 19,000 मेगावाट पार कर गई है. सरकार महंगे रेट पर बिजली खरीद रही है. हालात पर काबू पाने के लिए विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया गया है.
कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार. (File Photo : PTI)
रामनगर/बेंगलुरु: कर्नाटक में इस मानसून के दौरान कम बारिश ने विकराल रूप ले लिया है. राज्य के कई हिस्सों में सूखे के हालात बेहद नाजुक हो चुके हैं. उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कनकपुरा में कहा कि राज्य गंभीर सूखे का सामना कर रहा है. आने वाले दिनों में लोगों को पेयजल और बिजली की भारी कमी से जूझना पड़ सकता है. हालात इतने खराब हैं कि 100 तालुकों को पहले ही सूखाग्रस्त घोषित किया जा चुका है. बाकी इलाकों का सर्वे भी तेजी से चल रहा है. भूजल स्तर लगातार नीचे गिर रहा है. खेतों में बुवाई तक नहीं हो पाई और खड़ी फसलें सूख गई हैं. ऊर्जा सेक्टर पर इसका सबसे बड़ा असर पड़ा है. बिजली की मांग 19,000 मेगावाट के पार पहुंच गई है. सरकार को पीक आवर्स में 13 रुपये प्रति यूनिट के महंगे रेट पर बिजली खरीदनी पड़ रही है. इस पूरे संकट पर चर्चा के लिए सरकार ने विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया है.
कर्नाटक में सूखे का दायरा कितना बड़ा है?
कर्नाटक के ग्रामीण इलाकों में इस समय स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण हो चुकी है. राज्य के 100 तालुकों को सरकार पहले ही आधिकारिक तौर पर सूखाग्रस्त घोषित कर चुकी है. बाकी क्षेत्रों में भी फसलों और नमी के वैज्ञानिक मानकों की जांच चल रही है. डीके शिवकुमार ने कहा, ‘इस साल भूजल स्तर रसातल में चला गया है और बड़े पैमाने पर फसलें तबाह हो चुकी हैं.’ कई जिलों में किसानों को बुवाई तक करने का मौका नहीं मिला. जिन किसानों ने कर्ज लेकर फसल लगाई थी उनकी लागत पूरी तरह डूब चुकी है. बारिश की बेरुखी से प्रमुख बांधों और जलाशयों में पानी का कोटा न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है. इसका सीधा असर आने वाले समय में आम लोगों के पीने के पानी पर पड़ना तय माना जा रहा है.
19 हजार मेगावाट की मांग के बीच 13 रुपये यूनिट बिजली क्यों खरीद रही सरकार?
कम बारिश का सीधा प्रहार राज्य के पावर ग्रिड पर पड़ा है. कर्नाटक अपनी बिजली जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स पर निर्भर रहता है. जब बारिश नहीं होती तो इन प्लांट्स में बिजली का उत्पादन बहुत घट जाता है. दूसरी तरफ खेतों में सूखी फसलों को बचाने के लिए किसान दिन-रात बोरवेल और सिंचाई पंप चला रहे हैं. इसी वजह से राज्य में बिजली की कुल मांग अचानक बढ़कर 19,000 मेगावाट के पार निकल गई. शाम के पीक आवर्स के दौरान यह लोड संभालना ऊर्जा विभाग के लिए बहुत मुश्किल हो रहा है. शिवकुमार ने बताया कि ग्रिड को ब्लैकआउट से बचाने के लिए सरकार को 11 से 13 रुपये प्रति यूनिट तक की भारी कीमत पर बिजली खरीदनी पड़ रही है.
नेशनल ग्रिड और थर्मल पावर से कर्नाटक के बिजली संकट का हल कैसे निकलेगा?
इस गंभीर संकट से बाहर निकलने के लिए ऊर्जा मंत्री केजे जॉर्ज को पड़ोसी राज्यों से तुरंत बातचीत करने के निर्देश दिए गए हैं. सरकार अब थर्मल पावर प्लांट्स से बिजली उत्पादन की क्षमता बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है. इसके लिए कोयला उत्पादक राज्यों से अतिरिक्त बिजली लेने की संभावनाओं को तलाशा जा रहा है. भारत के ‘एक राष्ट्र, एक ग्रिड’ सिस्टम के जरिए देश के अन्य हिस्सों से बिजली कर्नाटक तक लाई जा सकती है. हालांकि इसके लिए राज्य को ट्रांसमिशन शुल्क देना होगा. शिवकुमार ने स्पष्ट किया कि कर्नाटक में आ रहे नए निवेशक लगातार बिजली, पानी और जमीन की मांग कर रहे हैं. अगर राज्य में आर्थिक विकास की रफ्तार को बनाए रखना है तो किसी भी कीमत पर पावर सप्लाई को मजबूत रखना जरूरी है.
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दीपक वर्मा की गिनती डिजिटल मीडिया के सबसे तेज और उभरते हुए चेहरों में होती है. वह न्यूज18 हिंदी के साथ डिप्टी न्यूज एडिटर के तौर पर जुड़े हैं. दीपक ने अपने करियर में कई बड़े मुकाम हासिल किए हैं…
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