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कांग्रेस में क्या अब ओल्ड गार्ड का दौर बदल रहा है? CWC की बैठक में नीतीश कुमार के मुद्दे पर दिग्विजय सिंह की बात और सोनिया गांधी की कथित प्रतिक्रिया ने पार्टी के बदलते समीकरण पर चर्चा तेज कर दी है. दूसरी तरफ राहुल गांधी युवाओं और छात्रों के बीच अपनी सक्रियता बढ़ा रहे हैं. ‘छात्रों की गूंज’ कैंपेन से वह सीधे छात्रों से संवाद कर रहे हैं. पंजाब में सचिन पायलट को गुटबाजी सुलझाने की जिम्मेदारी मिली और इसके बाद संगठन में बड़ा बदलाव हुआ. वहीं जी-23 के कई पुराने चेहरे अब कांग्रेस में नहीं हैं. ऐसे में राहुल और युवा टीम की बढ़ती भूमिका कांग्रेस की नई राजनीति की ओर इशारा कर रही है.
जी-23 से लेकर सचिन पायलट और छात्रों की गूंज तक समझिए बदलती कांग्रेस की तस्वीर. (फाइल फोटो रॉयटर्स)
कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में एक बदलाव साफ नजर आ रहा है. पार्टी में लंबे समय से बड़े फैसलों के आसपास रहने वाले पुराने चेहरे अब पहले जैसी ताकत के साथ दिखाई नहीं दे रहे हैं. राजस्थान से लेकर पंजाब तक इसका असर दिख रहा है. एक तरफ अशोक गहलोत और भूपेश बघेल जैसे दिग्गज नेताओं की संगठन में सक्रिय भूमिका पहले के मुकाबले कम हुई है. दूसरी तरफ सचिन पायलट जैसे युवा नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियां मिल रही हैं. अब CWC की बैठक में नीतीश कुमार को लेकर दिग्विजय सिंह की बात और सोनिया गांधी की कथित प्रतिक्रिया ने इस बहस को और हवा दे दी है. सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस में अब पुराने गार्ड की सलाह अंतिम फैसला नहीं तय करती? क्या राहुल गांधी को संगठन और राजनीति में पहले से ज्यादा फ्री हैंड मिल गया है? हाल की घटनाएं तो कम से कम इसी तरफ इशारा कर रही हैं.
मामला सिर्फ एक बैठक में हुई बातचीत तक सीमित नहीं है. कांग्रेस के काम करने के तरीके में भी नई पीढ़ी की मौजूदगी बढ़ी है. कभी जी-23 बनाकर राहुल गांधी के नेतृत्व और संगठन में बदलाव पर सवाल उठाने वाले वरिष्ठ नेताओं का दौर अब वैसा नहीं रहा. कई चेहरे पार्टी छोड़ चुके हैं और कई की सक्रिय भूमिका सीमित हुई है. दूसरी तरफ राहुल गांधी छात्रों और युवाओं के बीच सीधे संवाद पर जोर दे रहे हैं. ‘छात्रों की गूंज’ जैसी कैंपेन इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं. पंजाब में सचिन पायलट को गुटबाजी सुलझाने की जिम्मेदारी मिलना भी इसी बदलाव से जोड़कर देखा जा रहा है. ऐसे में कांग्रेस की राजनीति में अनुभव बनाम नई पीढ़ी की पुरानी बहस का संतुलन बदलता हुआ दिखाई दे रहा है.
नीतीश के मुद्दे पर सोनिया की प्रतिक्रिया ने खींचा ध्यान
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और बीजेपी के खिलाफ रणनीति पर चर्चा हो रही थी. इसी दौरान वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने 2024 में नीतीश कुमार के INDIA गठबंधन छोड़ने का मुद्दा उठाया. NDTV की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से दावा किया गया कि दिग्विजय ने कहा कि नीतीश को गठबंधन से जाने नहीं देना चाहिए था. उनके मुताबिक अगर ऐसा होता तो राजनीतिक स्थिति अलग होती. सूत्रों के अनुसार इस पर सोनिया गांधी ने तुरंत प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा कि अच्छा हुआ नीतीश समय पर चले गए. वह हमेशा गठबंधन से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहे थे. इस बातचीत ने कांग्रेस के भीतर पुराने नेताओं की सलाह और मौजूदा नेतृत्व की सोच को लेकर चर्चा बढ़ा दी है.
जी-23 के दौर से अब काफी बदल चुकी है कांग्रेस
कुछ साल पहले कांग्रेस में जी-23 का नाम खूब चर्चा में था. गुलाम नबी आजाद. आनंद शर्मा और कपिल सिब्बल जैसे वरिष्ठ नेताओं समेत कई नेताओं ने संगठन में बदलाव की मांग उठाई थी. उस समय पार्टी नेतृत्व और राहुल गांधी की भूमिका को लेकर भी सवाल सामने आए थे. जी-23 ने कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और संगठन की कार्यशैली पर बहस खड़ी कर दी थी. लेकिन आज उस समूह की स्थिति वैसी नहीं है. गुलाम नबी आजाद और कपिल सिब्बल कांग्रेस से बाहर हैं. आनंद शर्मा भी पहले जैसी केंद्रीय भूमिका में नहीं दिखते. ऐसे में भविष्य में जी-23 या जी-25 जैसा कोई समूह बनता है तो उसका राजनीतिक असर पुराने दौर जैसा होगा या नहीं यह अलग सवाल है.
राहुल की ‘छात्रों की गूंज’ से युवाओं पर फोकस
राहुल गांधी की राजनीति में युवाओं और छात्रों के बीच पहुंच बढ़ाने पर खास जोर दिखाई देता है. ‘छात्रों की गूंज’ कैंपेन के जरिए वह अलग-अलग शहरों में छात्रों से संवाद कर रहे हैं. कोटा. पुणे, प्रयागराज और इंदौर जैसे शहरों में शिक्षा, रोजगार और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर बातचीत की जा रही है. यह तरीका कांग्रेस की पारंपरिक बड़ी रैलियों से अलग है. राहुल सीधे युवाओं से सवाल सुन रहे हैं और उनकी समस्याओं पर बात कर रहे हैं. इससे पार्टी के भीतर यह संदेश भी जाता है कि आने वाले समय में युवा मतदाताओं और नए चेहरों को संगठन की राजनीति में ज्यादा महत्व दिया जा सकता है.
पंजाब में पायलट ने संभाली मुश्किल जिम्मेदारी
पंजाब कांग्रेस का घटनाक्रम भी काफी अहम है. प्रदेश में अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और चरणजीत सिंह चन्नी के बीच लंबे समय से खींचतान की चर्चा रही. पार्टी को दोनों खेमों के बीच तालमेल बैठाने में मुश्किल आ रही थी. पहले भूपेश बघेल को जिम्मेदारी दी गई. बाद में सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी बनाया गया. पायलट ने अलग-अलग नेताओं से बातचीत की और संगठन से फीडबैक लिया. इसके बाद उनकी रिपोर्ट हाईकमान तक पहुंची. इसके बाद वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने का फैसला सामने आया. इस पूरे घटनाक्रम ने पायलट की भूमिका को अचानक काफी अहम बना दिया है.
गहलोत-बघेल जैसे पुराने चेहरों से आगे बढ़ रही नई टीम?
अशोक गहलोत कांग्रेस के उन नेताओं में रहे हैं जिनकी भूमिका कई बड़े राजनीतिक संकटों में अहम रही. राजस्थान में 2020 का राजनीतिक संकट हो या 2022 में मुख्यमंत्री पद को लेकर पैदा हुआ विवाद. गहलोत राष्ट्रीय स्तर पर लगातार चर्चा में रहे. भूपेश बघेल भी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रहने के बाद कांग्रेस के बड़े संगठनात्मक चेहरों में शामिल रहे. लेकिन पंजाब में बघेल की जगह पायलट को जिम्मेदारी मिलना एक अहम बदलाव रहा. इसे पुराने नेताओं की राजनीतिक समाप्ति कहना सही नहीं होगा. लेकिन इतना जरूर है कि संगठनात्मक जिम्मेदारियों में नई पीढ़ी के नेताओं को आगे लाने की कोशिश दिखाई दे रही है.
राहुल और युवा टीम के हाथ में कितनी कमान?
- कांग्रेस में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राहुल गांधी को संगठन और राजनीतिक फैसलों में पहले से ज्यादा स्वतंत्रता मिल रही है. हाल के उदाहरणों को देखें तो युवा नेताओं को अहम जिम्मेदारियां दी जा रही हैं. सचिन पायलट को पंजाब जैसी मुश्किल इकाई की जिम्मेदारी मिली. राहुल गांधी छात्रों और युवाओं के बीच अपनी अलग राजनीतिक शैली बना रहे हैं. वहीं जी-23 के दौर के कई वरिष्ठ चेहरे अब पार्टी के भीतर पहले जैसी ताकत में नहीं हैं. इन घटनाक्रमों को जोड़कर देखें तो कांग्रेस में पीढ़ीगत बदलाव की प्रक्रिया जरूर दिखाई देती है. हालांकि वरिष्ठ नेताओं का अनुभव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. असली बदलाव यह है कि पार्टी की दिशा तय करने में राहुल गांधी और नई पीढ़ी की भूमिका अब ज्यादा प्रमुख नजर आ रही है.
- ऐसे में कोई नया जी-23 बने या जी-25. कांग्रेस के भीतर असंतोष की नई आवाज उठे या पुराने नेता फिर सक्रिय हों. आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि पार्टी का नेतृत्व उस असंतोष को कैसे संभालता है. फिलहाल इतना जरूर है कि कांग्रेस की राजनीति में युवा चेहरों को बड़ी जिम्मेदारियां मिल रही हैं. राहुल गांधी की राजनीतिक शैली भी युवाओं और छात्रों के बीच सीधा संवाद करने पर ज्यादा केंद्रित है. पंजाब में सचिन पायलट का काम और गहलोत-बघेल की संगठनात्मक भूमिका का बदलना इसी बड़े बदलाव के अलग-अलग हिस्से के तौर पर देखा जा सकता है. इधर मध्यप्रदेश में भी दिग्विजय सिंह से ज्यादा जीतू पटवारी अपनी राजनीति चमका रहे हैं.
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सुमित कुमार हिंदी पत्रकारिता का एक उभरता और सक्रिय नाम हैं. वर्तमान में वे News18 हिंदी में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं और सेंट्रल डेस्क टीम का हिस्सा हैं. पिछले चार साल से वे Network18
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