भारत इस समय ब्रिक्स (BRICS) की अध्यक्षता कर रहा है. यह एक ऐसा दौर है जब अमेरिका के साथ उसकी जियोस्ट्रेटेजिक अनिश्चितता काफी तेजी से बढ़ रही है. यह स्थिति भारत के लिए काफी अहम है. ब्रिक्स के जरिए भारत को चीन और रूस दोनों के साथ जुड़ने का मौका मिलता है. वहीं अमेरिका भी भारत का एक प्रमुख इकोनॉमिक और स्ट्रेटेजिक पार्टनर है. भारत इस समय एक मुश्किल विरोधाभास का सामना कर रहा है. उसे अमेरिका की जरूरत तो है. वह पूरी तरह से अमेरिका पर निर्भर रहने का जोखिम नहीं उठा सकता है. अमेरिका के साथ रिश्तों में लगातार तनाव देखने को मिल रहा है. यह स्थिति भारत को एक नई डिप्लोमैटिक स्ट्रेटजी अपनाने पर मजबूर कर सकती है. भारत अब विरोधी महाशक्तियों के साथ सहयोग के आधार पर अपनी रणनीतिक पैंतरेबाजी को मजबूत कर रहा है. यह ग्लोबल पॉलिटिक्स में एक बड़ा कदम है.
- भारत और अमेरिका के बीच कूटनीतिक रिश्ते काफी लंबे समय तक स्थिर रहे हैं. इन रिश्तों ने अच्छे और बुरे दोनों दौर देखे हैं. मौजूदा स्थिति को जो बात अलग बनाती है वह यह है कि अब दूरियां सिर्फ राजनीतिक नहीं रह गई हैं. ट्रेड और टैरिफ जैसे मुद्दे विवाद का कारण बन रहे हैं. इसके अलावा रूसी तेल और भारतीय डायस्पोरा पर भी दोनों देशों के विचार अलग हैं.
- रणनीतिक व्यवस्थाओं को लेकर भी मतभेद लगातार उभर रहे हैं. दोनों देशों के रिश्तों में आई इस दूरी का एक बड़ा कारण उम्मीदों में अंतर है. अमेरिका को उम्मीद है कि भारत चीन के साथ उसके टकराव में एक मजबूत पार्टनर बनेगा.
- भारत का मानना है कि अमेरिका के साथ सहयोग उसकी रणनीतिक स्वायत्तता की कीमत पर नहीं होना चाहिए. दोनों देशों के रिश्तों को देखकर लगता है कि वे एक टॉक्सिक रिलेशनशिप में फंस गए हैं. यहां कोई भी पार्टनर साथ रहकर खुश नहीं है. फिर भी किसी कारण से दोनों देश एक साथ रहने को मजबूर हैं.
ट्रंप 2.0 की नीतियों से भारत को महसूस हो रहा है खतरा
ट्रेड और टैरिफ को लेकर ट्रंप के रवैये ने भारत में राजनीतिक संवेदनशीलता पैदा कर दी है. भारत सरकार के लिए समस्या सिर्फ बयानबाजी या नीतिगत उपाय नहीं हैं. अमेरिकी इरादों को लेकर छाई अनिश्चितता एक बड़ी परेशानी है. जब एक महत्वपूर्ण पार्टनर अधिक स्वार्थी हो जाता है. तब दूसरे पक्ष के पास अपने बाहरी विकल्पों का विस्तार करने का दबाव होता है. भारत भी अब इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है.
क्या डिफेंस और ट्रेड में रूस या चीन कभी अमेरिका की जगह ले सकते हैं?
- भारत यह अच्छी तरह समझता है कि चीन या रूस कोई भी आर्थिक पार्टनर के रूप में अमेरिका की जगह नहीं ले सकता है. अमेरिका भारत को दुनिया के सबसे बड़े कंज्यूमर मार्केट के रूप में देखता है. दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार काफी बढ़ा है. जुलाई 2026 तक भारत-अमेरिका व्यापार की मात्रा बढ़कर लगभग 150 बिलियन डॉलर हो गई है. इसमें भारत के पक्ष में 32 बिलियन डॉलर से अधिक का ट्रेड सरप्लस है. अमेरिका भारतीय वस्तुओं और सेवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण मार्केट बना हुआ है.
- अमेरिका और भारत के बीच ट्रेड सरप्लस एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है. ट्रंप प्रशासन अक्सर व्यापार घाटे को लेकर चिंता जताता रहा है. भारत के लिए यह 32 बिलियन डॉलर का सरप्लस आर्थिक मजबूती का प्रतीक है. अगर ट्रंप इस सरप्लस को कम करने के लिए कड़े कदम उठाते हैं. तो भारत के एक्सपोर्ट सेक्टर पर काफी बुरा असर पड़ सकता है. इसलिए भारत ने पहले ही खुद को इस संभावित झटके से बचाने की तैयारी शुरू कर दी है.
- उन्नत हथियारों और तकनीक तक पहुंच के मामले में भी अमेरिका रूस से कहीं अधिक विश्वसनीय है. यूक्रेन युद्ध में रूस अपने हथियारों का बड़ा स्टॉक पहले ही खत्म कर चुका है. रूस पारंपरिक रूप से भारत के प्रमुख डिफेंस सप्लायर्स में से एक रहा है. अब इस रिश्ते के आसपास की जियोस्ट्रेटेजिक परिस्थितियां काफी बदल गई हैं. यूक्रेन युद्ध ने रूस की क्षमता पर भारी दबाव डाला है. बीजिंग पर मॉस्को की बढ़ती निर्भरता ने भारत के लिए मुश्किलें पैदा कर दी हैं.
- चीन अपनी अर्थव्यवस्था को लेकर खुद कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है. वह भारत से इतने बड़े पैमाने पर सामान और सेवाएं नहीं खरीद सकता है. वहीं रूस से भी यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह चीन को संतुलित करने में भारत की मदद करेगा. मॉस्को ने यूक्रेन युद्ध के बाद से बीजिंग के साथ काफी घनिष्ठ संबंध बना लिए हैं. रूस भारतीय हितों को पूरा करने के लिए चीन के साथ अपने संबंधों को खतरे में नहीं डालेगा. इन सभी मुश्किलों के बावजूद भारत और अमेरिका के संबंध अभी भी काफी रणनीतिक महत्व रखते हैं.
इंडो-पैसिफिक रीजन में भारत की क्या है रणनीति?
इंडो-पैसिफिक रीजन में भी भारत की रणनीति काफी अहम हो गई है. इस क्षेत्र में शक्ति का अनुकूल संतुलन बनाए रखने में भारत की बड़ी दिलचस्पी है. अमेरिका ने भी भारत को अपनी क्षेत्रीय रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना है. भारत और अमेरिका के अलावा जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच सहयोग के लिए क्वाड एक महत्वपूर्ण मंच बनकर उभरा है. ट्रंप प्रशासन 2.0 ने क्वाड में बहुत कम दिलचस्पी दिखाई है. हाल ही में अमेरिका ने इंडो-पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर फिर से ‘पैसिफिक कमांड’ कर दिया है. यह हिंद महासागर से आंशिक रूप से हटने का संकेत है. इससे इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव का रास्ता साफ हो सकता है.
इंडो-पैसिफिक के प्रति अमेरिकी प्रतिबद्धता का कमजोर होना भारत को परेशान कर सकता है. यही कारण है कि भारत ने हिंद महासागर और प्रशांत क्षेत्र में स्थित देशों के साथ अपना कूटनीतिक जुड़ाव बढ़ा दिया है. भारत अब मॉरीशस और इंडोनेशिया के साथ रिश्ते मजबूत कर रहा है. सिंगापुर और न्यूजीलैंड के साथ भी संबंध बेहतर किए जा रहे हैं.
डिप्लोमैटिक हेजिंग स्ट्रेटजी क्या है और भारत इसे कैसे इस्तेमाल कर रहा है?
भारत सुरक्षा और आर्थिक फायदे लेने के मामले में अमेरिका से बेहतर विकल्प नहीं रखता है. एशिया में अपनी रणनीतिक नीतियों को लागू करने के लिए अमेरिका के वास्ते भी भारत समान रूप से महत्वपूर्ण है. ट्रंप प्रशासन को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय विदेश नीति राष्ट्रीय हित से प्रेरित है. अगर ट्रंप अपने घरेलू राजनीतिक लाभ के लिए भारत को परेशान करना बंद नहीं करते हैं. तो भविष्य में दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों में भारी गिरावट आ सकती है.
भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय संबंधों की विश्वसनीयता बदल रही है. भारत संभवतः एक कूटनीतिक हेजिंग स्ट्रेटजी अपनाने को तैयार है. इस रणनीति में कोई देश किसी एक सहयोगी को चुनने से बचता है. वह किसी एक का कठोर पक्ष लेने से परहेज करता है. वह हमेशा संतुलन बनाने की कोशिश करता है. इसका उद्देश्य कई प्रतिस्पर्धी महाशक्तियों के साथ संबंध बनाना होता है. भारत इस समय बिल्कुल यही रणनीति अपना रहा है.
ब्रिक्स प्रेसीडेंसी के जरिए ग्लोबल साउथ और वर्ल्ड पॉलिटिक्स में भारत का क्या है प्लान?
संयुक्त राष्ट्र के अध्यक्ष एंटोनियो गुटेरेस ने हाल ही में कहा था, ‘शांति डर और ताकत से सुरक्षित नहीं होती है. शांति हमेशा विश्वास से बनती है’. यह बात भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के उस प्रसिद्ध भाषण की याद दिलाती है जो उन्होंने संसद में दिया था. अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा, ‘आप अपने दोस्त बदल सकते हैं लेकिन अपने पड़ोसी नहीं’.
- कूटनीतिक पहुंच के व्यापक संदर्भ को देखते हुए भारत एक बड़ा कदम उठाने जा रहा है. भारत जल्द ही चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति पुतिन की मेजबानी करने की योजना बना रहा है. इसका उद्देश्य संभवतः अपने व्यापार को डायवर्सिफाई करना है.
- हाल ही में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने चीन का दौरा किया है. विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी रूस की यात्रा की है. ट्रंप की विदेश नीति से निराश होकर भारत प्रतिस्पर्धी महाशक्तियों के साथ अपना कूटनीतिक जुड़ाव बढ़ा रहा है. तेजी से बदलती अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में यह भारत की स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी का सबसे व्यावहारिक तरीका है.
- अगस्त 2026 में भोपाल के कुशाभाऊ ठाकरे इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर में ब्रिक्स कल्चरल समिट का सफल आयोजन हुआ. इस कार्यक्रम ने भारत की कूटनीतिक छवि को एक नया आयाम दिया है. इसमें दुनिया भर के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया और भारत की समृद्ध विरासत को करीब से देखा. भारत ने इस आयोजन के जरिए यह साबित कर दिया है कि वह दुनिया के देशों को एक साथ लाने की ताकत रखता है.
ब्रिक्स यह मंच अब भारत के लिए एक ऐसा टूल बन गया है जिसके जरिए भारत अपनी स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी को दुनिया के सामने पेश कर रहा है. भारत अब केवल दर्शक बनकर नहीं रहना चाहता है. वह दुनिया के तमाम बड़े फैसलों में अपनी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित कर रहा है. भारत की यह हेजिंग स्ट्रेटजी भविष्य में उसे एक नई ग्लोबल पावर के रूप में मजबूती से स्थापित कर सकती है.

