देश में साइबर अपराध की बाढ़ सी आ गई है. मोबाइल फोन पर आने वाला एक अनजान कॉल, बैंक खाते से जुड़ा एक फर्जी संदेश या सोशल मीडिया पर भेजा गया कोई संदिग्ध लिंक किसी व्यक्ति की जिंदगी भर की कमाई पर भारी पड़ सकता है. डिजिटल लेन-देन और इंटरनेट के बढ़ते इस्तेमाल ने जहां आम लोगों की जिंदगी आसान बनाई है, वहीं अपराधियों के लिए ठगी के नए रास्ते भी खोल दिए हैं. यही वजह है कि सरकार से लेकर पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों तक के लिए साइबर अपराध पर लगाम लगाना एक बड़ी चुनौती बन गया है.
साइबर अपराध से निपटने के लिए केवल कानून बनाना या अपराधियों को गिरफ्तार करना पर्याप्त नहीं है. इसके लिए ऐसे विशेषज्ञों की जरूरत है, जो तकनीक को समझते हों, डिजिटल सबूतों की पहचान कर सकें और अदालत में उन्हें कानूनी तरीके से पेश करने की जानकारी रखते हों. इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए बिहार की राजधानी पटना में एक नई पहल की जा रही है.
चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (CNLU), पटना अपने साइबर सिक्योरिटी एंड डिजिटल फोरेंसिक्स सेंटर (SCDFC) के माध्यम से सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (C-DAC), पटना के साथ मिलकर साइबर सिक्योरिटी और डिजिटल फोरेंसिक्स में 60 घंटे का एडवांस्ड सर्टिफिकेट प्रोग्राम शुरू करेगी. इसमें बिहार पुलिस की साइबर क्राइम एंड सिक्योरिटी यूनिट (सीसीएसयू) लॉ एनफोर्समेंट पार्टनर के रूप में जुड़ेगी.
यह कार्यक्रम 21 नवंबर से 20 दिसंबर 2026 तक चलेगा. इसमें ऑफलाइन कक्षाओं के साथ लाइव ऑनलाइन पढ़ाई की सुविधा भी होगी. इस तरह कामकाजी पेशेवरों और संबंधित क्षेत्रों में रुचि रखने वाले लोगों के लिए भी प्रशिक्षण हासिल करना आसान हो सकता है.
साइबर ठगी के बदलते तरीके
आज साइबर अपराध का मतलब केवल किसी कंप्यूटर को हैक करना नहीं रह गया है. अपराधियों ने आम लोगों को ठगने के ऐसे तरीके अपना लिए हैं, जिनमें तकनीकी जानकारी से ज्यादा लोगों की मनोवैज्ञानिक कमजोरियों का फायदा उठाया जाता है.
किसी को बैंक अधिकारी बनकर फोन किया जाता है, तो किसी को पुलिस या दूसरी जांच एजेंसी का नाम लेकर डराया जाता है. कई मामलों में लोगों को यह कहकर धमकाया जाता है कि वे किसी गंभीर अपराध में फंस गए हैं. फिर मामले से बचाने के नाम पर उनसे पैसे मांगे जाते हैं. इसे आम तौर पर डिजिटल अरेस्ट जैसे नामों से जाना जाता है.
इसी तरह फर्जी निवेश योजनाओं, नौकरी दिलाने के झूठे वादों, ऑनलाइन खरीदारी, क्यूआर कोड और यूपीआई से जुड़ी धोखाधड़ी के मामले भी सामने आते हैं.
अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने इस चुनौती को और गंभीर बना दिया है. किसी परिचित की आवाज की नकल करके पैसे मांगना या किसी व्यक्ति का नकली वीडियो तैयार करना पहले के मुकाबले आसान हो सकता है. ऐसे में केवल सामान्य सावधानी से काम नहीं चलेगा. लोगों को जागरूक करने के साथ-साथ जांच एजेंसियों को भी नई तकनीकों की जानकारी देनी होगी.
आंकड़े बता रहे हैं चुनौती कितनी बड़ी है
यहां यह समझना जरूरी है कि साइबर सुरक्षा घटनाओं और पुलिस में दर्ज साइबर अपराध के मामलों की गिनती अलग-अलग होती है. फिर भी ये आंकड़े बताते हैं कि डिजिटल दुनिया में सुरक्षा की चुनौती कितनी तेजी से बढ़ रही है.
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2023 में देश में साइबर अपराध के 86,420 मामले दर्ज किए गए थे. वर्ष 2024 में यह संख्या बढ़कर 1,01,928 हो गई. यानी एक साल में लगभग 18 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. इन मामलों में धोखाधड़ी एक प्रमुख वजह रही.
इन आंकड़ों के बीच यह भी याद रखना चाहिए कि हर साइबर अपराध की रिपोर्ट पुलिस तक नहीं पहुंचती. कई लोग शर्म, डर या जानकारी की कमी के कारण शिकायत नहीं करते.
डिजिटल फोरेंसिक्स की अहम भूमिका
साइबर अपराध की जांच में डिजिटल फोरेंसिक्स की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. सामान्य भाषा में कहें तो इसका मतलब है मोबाइल फोन, कंप्यूटर, ईमेल, सर्वर, सोशल मीडिया और दूसरे डिजिटल माध्यमों से मिले सबूतों की वैज्ञानिक तरीके से जांच करना.
मान लीजिए, किसी व्यक्ति के बैंक खाते से पैसे निकाल लिए गए. जांच अधिकारी को यह पता लगाना होगा कि ठगी किस तरह हुई, पैसे किस खाते में गए, किन मोबाइल नंबरों या उपकरणों का इस्तेमाल किया गया और अपराधियों तक पहुंचने के लिए कौन से डिजिटल सुराग मौजूद हैं.
साइबर अपराध से लड़ाई केवल सरकार या पुलिस के भरोसे नहीं जीती जा सकती. आम नागरिकों को भी अपनी डिजिटल सुरक्षा के प्रति सजग रहना होगा. किसी अनजान व्यक्ति को ओटीपी, यूपीआई पिन या बैंक खाते से जुड़ी गोपनीय जानकारी नहीं देनी चाहिए. किसी संदिग्ध लिंक पर क्लिक करने से बचना चाहिए और मोबाइल पर आए संदेश की सच्चाई जांचे बिना पैसे नहीं भेजने चाहिए.
अगर ठगी हो जाए तो घबराने या चुप बैठने के बजाय तुरंत 1930 पर संपर्क करना चाहिए, पोर्टल पर शिकायत दर्ज करनी चाहिए और अपने बैंक को भी सूचना देनी चाहिए. कॉल, संदेश, लेन-देन का विवरण और अन्य डिजिटल सबूत संभालकर रखना उपयोगी होता है.
साइबर अपराध का स्वरूप लगातार बदल रहा है. इसलिए उससे निपटने के लिए तकनीक, कानून, पुलिस प्रशिक्षण और जन-जागरूकता को साथ लेकर चलना होगा. पटना में शुरू होने जा रहा 60 घंटे का एडवांस्ड सर्टिफिकेट प्रोग्राम इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है. इसकी वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि इससे प्रशिक्षित लोग साइबर अपराध की जांच, डिजिटल सबूतों के विश्लेषण और अपराधियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई में कितना योगदान दे पाते हैं.

