पटना. इतिहास के पन्नों में कुतुबुद्दीन ऐबक के सेनापति इख्तियारुद्दीन मोहम्मद बिन बख्तियार खिलजी को एक ऐसे क्रूर तुर्क आक्रांता के रूप में याद किया जाता है जिसने बिहार की ज्ञान-विरासत नालंदा विश्वविद्यालय को जलाकर खाक कर दिया था. 1193 ईस्वी के आसपास बिहार पर आक्रमण किया थी. अपने इसी अभियान के दौरान उसने विश्वविख्यात नालंदा महाविहार को भारी क्षति पहुंचाई. अनेक ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, उसने बड़ी संख्या में बौद्ध भिक्षुओं की हत्या करवाई और विश्वविद्यालय के विशाल पुस्तकालय को आग के हवाले कर दिया. कहा जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में इतनी अधिक पांडुलिपियां थीं कि आग कई महीनों तक सुलगती रही. इस हमले को भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपरा पर सबसे बड़े आघातों में से एक माना जाता है.
नालंदा की ज्ञान-परंपरा की धरोहर को राख कर गया क्रूर खिलजी
ऐसा इसलिए कि नालंदा केवल एक विश्वविद्यालय भर नहीं था, बल्कि उस समय दुनिया के सबसे बड़े ज्ञान केंद्रों में से एक था. यहां भारत ही नहीं, बल्कि चीन, कोरिया, तिब्बत, श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया से भी विद्यार्थी और विद्वान अध्ययन के लिए आते थे. इसके पुस्तकालय में धर्म, दर्शन, गणित, चिकित्सा, खगोल विज्ञान, व्याकरण, साहित्य और अनेक विषयों पर लाखों पांडुलिपियां सुरक्षित थीं. लेकिन, बख्तियार खिलजी के हमारी ज्ञान-परंपरा पर इस हमले के साथ ही सदियों से संचित बहुमूल्य ग्रंथ, शोध और बौद्धिक विरासत का बड़ा हिस्सा हमेशा के लिए नष्ट हो गया. अब आगे की कहानी बख्तियार खिलजी की उस खौफनाक और शर्मनाक हार और उसके अंत की है जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं.
असम के राजा ने कैसे तोड़ा था बख्तियार खिलजी का घमंड?
कहा जाता है कि नालंदा को नष्ट करने और बंगाल के राजा लक्ष्मण सेन को हराने के बाद खिलजी का घमंड सातवें आसमान पर पहुंच चुका था. उसे लगता था कि पूरे भारतवर्ष में उसे हराने वाला कोई योद्धा पैदा नहीं हुआ है. इसी अहंकार में चूर होकर साल 1206 में वह तिब्बत और चीन को जीतने के इरादे से आगे बढ़ा. लेकिन उसे यह अंदाजा नहीं था कि असम (कामरूप) की पावन धरती पर उसका सामना एक ऐसे प्रतापी राजा से होने वाला है जो उसके अजेय होने के भ्रम को हमेशा के लिए मिट्टी में मिला देगा.
जब कामरूप के राजा ने बख्तियार खिलजी को दी करारी शिकस्त, यहीं से शुरू हुआ उसके पतन का दौर
खिलजी की महत्वाकांक्षा और तिब्बत अभियान की शुरुआत
दरअसल, बख्तियार खिलजी की नजरें सिल्क रूट और तिब्बत के पठारों पर टिकी थीं. तिब्बत पर नियंत्रण करने का मतलब था चीन के व्यापारिक मार्गों पर कब्जा जमा लेना. इसके लिए खिलजी ने एक विशाल और आधुनिक हथियारों से लैस सेना तैयार की. इस दुर्गम और पहाड़ी रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए उसने ‘अली मेच’ नाम के एक स्थानीय आदिवासी कबीले के मुखिया को इस्लाम में परिवर्तित कर अपना गाइड बनाया. अली मेच की मदद से खिलजी की सेना असम के कामरूप क्षेत्र के पहाड़ी और घने जंगलों वाले रास्तों से होते हुए तिब्बत की सीमा की तरफ बढ़ने लगी. खिलजी को लगा था कि वह हमेशा की तरह इस क्षेत्र को भी आसानी से रौंदते हुए आगे निकल जाएगा. लेकिन इसके बाद खिलजी के साथ वो हुआ जिसके बारे में उसने सोचा भी नहीं था.
असम के राजा प्रज्वला उर्फ पृथु के चक्रव्यूह में फंस गया
कामरूप (असम) पर उस समय जलपेश्वर के प्रतापी राजा प्रज्वला का शासन था जिन्हें इतिहास में राजा पृथु के नाम से भी जाना जाता है. राजा पृथु एक कुशल रणनीतिकार और अपनी मातृभूमि के रक्षक थे. जब उन्हें गुप्तचरों से खिलजी की विशाल सेना के आने की सूचना मिली, तो उन्होंने आमने-सामने की जंग लड़ने के बजाय एक बेहद खतरनाक गोरिल्ला युद्ध, जिसे चक्रव्यूह भी कह सकते हैं, की रणनीति तैयार की. राजा पृथु ने अपनी प्रजा और सेना को आदेश दिया कि वे खिलजी के रास्ते में आने वाले सभी गांवों के अनाज के भंडारों को छुपा दें और खड़ी फसलों को पूरी तरह नष्ट कर दें. इसका मकसद खिलजी की सेना को रसद और भोजन की आपूर्ति से पूरी तरह वंचित करना था ताकि वे भूख से बेहाल हो जाएं. लेकिन, इसके बाद तो जो होने वाला था वह खिलजी ने सोचा भी न था.
बागमती नदी के किनारे भीषण जंग हुई जिसमें बख्तियार खिलजी को करारी हार मिली.
बागमती नदी का पुल और कामरूप की घातक लड़ाई
राजा पृथु की यह ‘स्कॉर्च्ड अर्थ’ नीति (Scorched Earth Policy) पूरी तरह सफल रही. तिब्बत की कड़ाके की ठंड और भोजन की भारी कमी के कारण खिलजी के सैनिक और घोड़े बीमार होने लगे. खिलजी को मजबूरन कामरूप से वापस लौटने का फैसला करना पड़ा. लेकिन असली जाल तो वापसी के रास्ते पर बिछा था. जब खिलजी की सेना वापस लौटते हुए बागमती ( उस समय इसे ‘बरनदी’ भी कहा जाता था) नदी पर बने एकमात्र विशाल पत्थर के पुल के पास पहुंची, तो उन्होंने देखा कि राजा पृथु की सेना ने उस पुल को चारों तरफ से घेर कर तोड़ दिया है. खिलजी की बीमार और भूखी सेना नदी और राजा पृथु की सेना के बीच बुरी तरह फंस चुकी थी.
खिलजी का घमंड टूटा, 10 हजार से ज्यादा सैनिक ढेर
इसके बाद राजा पृथु की कामरूप सेना और स्थानीय बोडो, कचारी व मेच कबीलों के योद्धाओं ने चारों तरफ से खिलजी की सेना पर तीरों और तलवारों से भीषण हमला बोल दिया. इस ऐतिहासिक ‘बैटल ऑफ कामरूप’ में खिलजी की सेना के पैर उखड़ गए. असम के वीरों ने खिलजी की 10,000 से भी अधिक तुर्क सेना को गाजर-मूली की तरह काट डाला. जो सैनिक तीरों से बचे, वे उफनती नदी में डूबकर मर गए. खिलजी का अजेय होने का घमंड पूरी तरह चूर-चूर हो गया. इस महासंग्राम में खिलजी किसी तरह अपने मात्र 100-200 सैनिकों के साथ जान बचाकर युद्धक्षेत्र से भागने में सफल रहा. भारत के इतिहास में किसी भी तुर्क आक्रमणकारी की यह सबसे करारी और शर्मनाक पराजय थी.
कामरूप की धरती पर टूटा बख्तियार खिलजी का घमंड, फिर कभी नहीं संभल पाया और अंत में उसकी बुरी मौत हुई.
सदमा, बीमारी और खिलजी का खौफनाक अंत
ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक, कामरूप की इस भयानक हार ने बख्तियार खिलजी को मानसिक और शारीरिक रूप से पूरी तरह तोड़ दिया. वह अपने बचे-खुचे सैनिकों के साथ बंगाल के देवकोट (वर्तमान में बांग्लादेश का हिस्सा) पहुंचा. हजारों सैनिकों की मौत हो गई और खिलजी अपनी नाक कटने के गम में वह गहरे अवसाद यानी डिप्रेशन में चला गया और गंभीर रूप से बीमार हो गया.
खौफनाक ही नहीं, अपमानजनक भी था खिलजी का अंत
कहा जाता है कि वह बिस्तर से उठने के लायक भी नहीं बचा था. इसी लाचारी की स्थिति में साल 1206 के अंत में उसके ही एक खास और महत्वाकांक्षी सेनापति अली मर्दान खिलजी ने देवकोट के बंद कमरे में चादर से गला घोंटकर या खंजर घोंपकर बख्तियार खिलजी की जीवन लीला समाप्त कर दी. हालांकि, कुछ विवरणों में उसका बीमार होना भी मौत की वजह बताई गई है. बहरहाल, इस तरह नालंदा की अनमोल धरोहर को जलाने वाले पापी का अंत बेहद दर्दनाक और अपमानजनक तरीके से हुआ.

