F15ex fighter jets Vs Rafale: इंडियन एयरफोर्स के चीफ एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह ने इसी माह अमेरिका की अपनी सप्ताहभर की यात्रा के दौरान नेवाडा के नेलिस एयर फोर्स बेस में बोइंग F-15EX ईगल II फाइटर जेट में उड़ान भरी. यह दौरा औपचारिक रूप से इंडियन एयरफोर्स और अमेरिकी एयरफोर्स के बीच अंतर-संचालन, संयुक्त प्रशिक्षण और इंडो-पैसिफिक में साझा रणनीतिक प्राथमिकताओं पर चर्चा के लिए था. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी F-15EX फाइटर जेट में एयरफोर्स चीफ का बैठना कई संकेत देता है. खासकर तब जब फाइटर जेट्स की कमी झेल रहा भारत 114 राफेल जेट्स की खरीद कर रहा है.
रिपोर्ट के मुताबिक एयरफोर्स चीफ की यह यात्रा MQ-9B स्काईगार्डियन ड्रोन्स की निगरानी और डेटा शेयरिंग की मॉडलिटी तय करने से भी जुड़ी थी, जिसका सौदा पहले ही अमेरिका के साथ हो चुका है. एयरफोर्स चीफ की F-15EX उड़ान ने भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों को नई गति दी, लेकिन सवाल उठता है कि क्या भारत अमेरिकी फाइटर जेट्स की ओर रुख करेगा, जबकि फ्रांसीसी राफेल को लेकर डील अंतिम चरण में पहुंच गई है.
क्या भारत खरीदेगा F-15EX फाइटर जेट
भारत ने 2020 में F-15EX फाइटर जेट में दिलचस्पी दिखाई, लेकिन बोइंग को विदेशी बिक्री लाइसेंस 2021 में मिला. एयरफोर्स ने F-15EX को कभी फील्ड इवैल्यूएशन के लिए आमंत्रित नहीं किया, जिससे इसकी गंभीरता पर सवाल उठे. दूसरी ओर एयरफोर्स ने 36 राफेल के 2018 सौदे के बाद रखरखाव और लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश किया है. अक्टूबर 2025 में IAF चीफ ने कहा था कि राफेल उनके लिए सबसे उपयुक्त विकल्प है, बशर्ते फ्रांस टेक्नोलॉडी ट्रांसफर और मेक इन इंडिया पर तैयार हो.
राफेल बनाम F-15EX
राफेल-F4 कॉम्पैक्ट, एजाइल और ओम्नीरोल है. इसका सुपरक्रूज, बेहतर फ्यूल एफिशिएंसी, कम सिग्नेचर और विश्व स्तरीय स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वारसूट इसे जंग के मैदान में एक अजेय जेट बनाता है. यह मिटियोर मिसाइल के साथ कई अन्य बीवीआर मिसाइलों से लैस है. इसमें 14 हार्डपॉइंट्स हैं जहां विविध हथियार लगाए जा सकते हैं. इंडियन एयर फोर्स में यह पहले से मौजूदा है. इसको भारतीय हथियारों को सपोर्ट करने वाला बनाया गया है. इसका ऑपरेटिंग कॉस्ट काफी कम है. संक्षेप में, F-15EX पेलोड और स्पीड में आगे है, जबकि राफेल एजिलिटी, सेंसर फ्यूजन, ईवी और मल्टी-मिशन फ्लेक्सिबिलिटी में बेहतर. एयरफोर्स के लिए राफेल का मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर अतिरिक्त खरीद को आसान बनाता है.
भारत ने अब तक अमेरिका से कोई फाइटर जेट क्यों नहीं खरीदा?
शीत युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को F-16 जैसी एयरक्राफ्ट की सप्लाई की गई थी. इससे भारत ने रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए रूसी और फ्रांसीसी प्लेटफॉर्म्स पर भरोसा किया. 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिकी प्रतिबंधों ने भी विश्वास को प्रभावित किया. अमेरिकी हथियारों में स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस पर निर्भरता का खतरा हमेशा रहा है. पाकिस्तान के अनुभव से भारत सबक ले चुका है. हालांकि हाल के वर्षों में P-8I, C-17, अपाचे और MQ-9B ड्रोन जैसे प्लेटफॉर्म्स पर सहयोग बढ़ा है, लेकिन फाइटर जेट्स में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, मेक इन इंडिया और पूर्ण ऑपरेशनल कंट्रोल की मांग अमेरिकी नीतियों से टकराती रही.
F-35 क्यों नहीं खरीदना चाहता भारत?
दुनिया के सबसे एडवांस फिफ्थ जेन जेट एफ-35 को भारत मुख्य रूप से कीमत और मेंटेनेंस की वजह से नहीं खरीद रहा. F-35 की यूनिट कॉस्ट लगभग 80-120 मिलियन डालर है, लेकिन लाइफसाइकल कॉस्ट बहुत ऊंची है. प्रति फ्लाइट ऑवर लगभग 36,000 डॉलर खर्च आता है. यहां तक कि छोटे फ्लीट (36 विमान) के लिए भी कुल खर्च 30 अरब डॉलर से ज्यादा हो सकता है. भारत इतना पैसा खर्च नहीं करना चाहता. इससे देसी फाइटर जेट प्रोजेक्ट तेजस और एम्का पर असर पड़ सकता है. F-35 एक स्टेल्थ जेट है, लेकिन भारत के रूसी सिस्टम्स से इसे कनेक्ट करना मुश्किल है. इसलिए भारत F-15EX या F-21 जैसे 4.5-जनरेशन विकल्पों पर फोकस कर रहा है, जबकि अपना पांचवीं पीढ़ी का AMCA विकसित कर रहा है.

