WHO report on Cancer: अभी ज्यादा साल नहीं गुजरे हैं, कोरोना की भयंकर त्रासदी तो आपको याद होगी. कोविड की दूसरी लहर में हर दिन होती मौतों ने दिल दहला दिया था. हर तरफ डर और दहशत का माहौल था, लेकिन अगर आपको बताया जाए कि इससे भी ज्यादा भयानक आपदा आपकी इंतजार कर रही है तो आपको घबराहट होने लगेगी. हाल ही में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट ने फिर तहलका मचा दिया है, जिसमें संभावना जताई जा रही है कि साल 2050 तक कोरोना से भी ज्यादा बड़ी तबाही आपका इंतजार कर रही है.
डब्ल्यूएचओ की हालिया रिपोर्ट काफी डरावनी है. जिसमें कहा गया है कि अभी भी लोगों के लिए बड़ी मुसीबत बना कैंसर आने वाले सालों की सबसे बड़ी बीमारी साबित हो सकती है और यह दुनिया के 92 फीसदी लोगों को किसी न किसी तरह प्रभावित करेगी.
8 जुलाई को डब्ल्यूएचओ की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में हर पांच में से एक व्यक्ति अपने जीवन में कभी न कभी कैंसर का शिकार हो सकता है. लेकिन उससे भी बड़ी बात ये है कि कैंसर सिर्फ मरीज तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि किसी न किसी तरह दुनिया की 92 फीसदी आबादी को प्रभावित करेगा. इनमें से कुछ मरीज होंगे तो कुछ वे लोग होंगे जो कैंसर के मरीजों से जुड़े होंगे.
रिपोर्ट में कैंसर को वैश्विक स्वास्थ्य, सामाजिक और आर्थिक संकट बताया गया है. 2024 में दुनिया भर में 20.6 मिलियन से ज्यादा नए कैंसर के मामले सामने आए. इनमें पुरुषों में सबसे ज्यादा फेफड़ों का कैंसर (16 लाख मामले) और प्रोस्टेट कैंसर (15 लाख) देखा गया. जबकि महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर सबसे आम रहा, वहीं सर्वाइकल कैंसर भी बढ़ा है. इस दौरान सिर्फ स्तन कैंसर के ही 24 लाख नए मामले दर्ज किए गए. इसके बाद फेफड़े का कैंसर (10 लाख) और कोलोरेक्टल कैंसर तीसरे नंबर पर रहा.
समय से पहले मौत दे रहा कैंसर
रिपोर्ट कहती है कि हर साल करीब 4 लाख बच्चे और किशोर (0-19 साल) कैंसर की चपेट में आते हैं. इनमें से ज्यादातर गरीब और मध्यम आय वाले देशों में होते हैं. 2024 में कैंसर से 97 लाख लोगों की मौत हुई, जिनमें 48 लाख से ज्यादा 30-69 साल के बीच के लोग थे. यानी कैंसर अब समय से पहले मौत का बड़ा कारण बनता जा रहा है.
लाखों बच्चे हो रहे अनाथ
कैंसर की मार सिर्फ मरीज तक नहीं रुकती. साल 2020 में कैंसर से हुई मौतों के कारण दुनिया भर में करीब 24.5 लाख बच्चे अनाथ हो गए. इनमें 10.4 लाख बच्चों ने अपनी मां को खोया, जबकि 14.1 लाख ने पिता को खो चुके थे. स्तन कैंसर और सर्वाइकल कैंसर इन मामलों के सबसे बड़े कारण रहे. भारत, चीन, नाइजीरिया, इंडोनेशिया, इथियोपिया और पाकिस्तान जैसे देश इन मातृ-अनाथ बच्चों के 40 प्रतिशत मामलों के लिए जिम्मेदार हैं.
मेंटल हेल्थ पर भी हो रहा असर
रिपोर्ट में शामिल एक सर्वे के अनुसार, कैंसर सिर्फ एक बीमारी नहीं है बल्कि बीमारियों का बंडल अपने साथ लेकर आता है. इससे पीड़ित आधे से ज्यादा लोग मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं का सामना करते हैं. देखभाल करने वाले (केयरगिवर) भी तनाव, उदासी और सामाजिक अलगाव महसूस करते हैं. इलाज के महंगे खर्च, कमाई का नुकसान और परिवार की जिम्मेदारियों के कारण कई परिवार आर्थिक संकट में फंस जाते हैं. WHO ने कैंसर को चिकित्सा दिवालियापन (मेडिकल बैंकRUPTCY) का एक प्रमुख कारण बताया है.
2050 तक हो सकता है कैंसर विस्फोट
रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2050 तक दुनिया में कैंसर के नए मामले 67 प्रतिशत बढ़कर 3.5 करोड़ तक हो सकते हैं. इस बढ़ोतरी का सबसे ज्यादा असर गरीब देशों पर पड़ेगा, जहां मामले 133 प्रतिशत तक बढ़ सकते हैं. अमीर देशों में जल्दी जांच और बेहतर इलाज के कारण बीमारी के ठीक होने की दर ज्यादा है. उदाहरण के लिए, स्तन कैंसर से पीड़ित 85 प्रतिशत महिलाएं हाई-इनकम देशों में पांच साल तक जीवित रहती हैं, जबकि कम आय वाले देशों में यह आंकड़ा 45 प्रतिशत से भी कम है.
बचपन के कैंसर में तो स्थिति और भी चिंताजनक है. यूरोप में लिम्फोइड ल्यूकेमिया से ग्रस्त बच्चों के बचने की दर 93 प्रतिशत है, जबकि अफ्रीका के कुछ हिस्सों में यह सिर्फ 19 प्रतिशत है.
इलाज तो दूर जांच की भी सुविधा नहीं
कैंसर के मामले में सबसे ज्यादा दुखद इसके इलाज और जांच की सुविधा है. दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी को बेसिक डायग्नोस्टिक सेवाएं (जैसे पैथोलॉजी और इमेजिंग) तक उपलब्ध नहीं हैं. सब-सहारा अफ्रीका में हर 10 लाख लोगों पर सिर्फ एक पैथोलॉजिस्ट है, जबकि अमीर देशों में यह संख्या 50 गुना ज्यादा है.
ऐसे में WHO की यह रिपोर्ट चिंता पैदा करती है और संदेश भी देती है कि कैंसर अब सिर्फ बीमारी नहीं रह गया है बल्कि यह सामाजिक न्याय, आर्थिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच का सवाल बन गया है. आने वाले समय में यह मौतों का सबसे बड़ा कारण बन सकता है.

