Why Monsson Stop: जून का महीना आते ही देश के लोगों की निगाहें आसमान पर टिक जाती हैं. किसान खेत तैयार करते हैं, शहरों में लोग गर्मी से राहत का इंतजार करते हैं और मौसम वैज्ञानिक मानसून की हर चाल पर नजर रखते हैं. लेकिन इस बार कहानी कुछ अलग है. कुछ दिन पहले तक ऐसा लग रहा था कि दक्षिण-पश्चिम मानसून रिकॉर्ड रफ्तार से पूरे देश को भिगो देगा. केरल से एंट्री लेने के बाद मानसून तेजी से दक्षिण और पूर्वी भारत के बड़े हिस्से को कवर करता चला गया. मौसम विभाग (IMD) भी इसके तेज विस्तार को लेकर आश्वस्त दिखाई दे रहा था. लेकिन अचानक जैसे किसी ने ब्रेक लगा दिया हो. सैटेलाइट तस्वीरों में मध्य, पश्चिमी और प्रायद्वीपीय भारत के बड़े हिस्से बादलों से खाली नजर आने लगे. जून के मध्य में ऐसा दृश्य बेहद असामान्य माना जाता है. यही वजह है कि मौसम वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ गई है. सवाल उठ रहा है कि आखिर मानसून बीच रास्ते में क्यों रुक गया और क्या आने वाले दिनों में इसका असर खेती, जलाशयों और देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है?
यूरोपीय मौसम उपग्रह मेटियोसैट, अमेरिकी एजेंसी NOAA और इसरो के INSAT-3DS से मिली ताजा तस्वीरों ने इस चिंता को और गहरा कर दिया है. आमतौर पर जून के दूसरे और तीसरे सप्ताह में मध्य भारत, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के ऊपर घने मानसूनी बादल दिखाई देते हैं. इस बार तस्वीर बिल्कुल उलट है. विभाग के आंकड़ों के अनुसार 4 जून से 16 जून के बीच मध्य भारत में करीब 65 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई है. यह देश के सभी मौसमीय क्षेत्रों में सबसे ज्यादा है. महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कई जिलों में सामान्य मानसूनी बारिश तक नहीं हुई है. यही वह समय होता है जब खरीफ फसलों की बुआई शुरू होती है. ऐसे में मानसून की यह धीमी चाल केवल मौसम का विषय नहीं रह जाती, बल्कि करोड़ों किसानों और देश की खाद्य सुरक्षा से भी जुड़ जाती है.
मानसून की रफ्तार धीमी होने का मुख्य कारण बंगाल की खाड़ी में मजबूत लो-प्रेशर सिस्टम का न बनना है.
तेज शुरुआत के बाद अचानक थम गया मानसून
- दक्षिण-पश्चिम मानसून ने इस साल 4 जून को केरल में दस्तक दी थी. हालांकि यह सामान्य तिथि से तीन दिन देर से पहुंचा, लेकिन इसके बाद इसकी गति काफी तेज रही. कुछ ही दिनों में मानसून ने केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, गोवा, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार और पूर्वोत्तर भारत के बड़े हिस्से को कवर कर लिया. मौसम वैज्ञानिकों को लगने लगा था कि इस बार मानसून सामान्य से पहले उत्तर और पश्चिम भारत तक पहुंच सकता है. लेकिन जून के दूसरे सप्ताह के बाद इसकी रफ्तार अचानक धीमी पड़ गई और कई इलाकों में इसका विस्तार लगभग रुक गया.
- महाराष्ट्र में मानसून 8 जून के बाद से सोलापुर क्षेत्र के आसपास ही अटका हुआ है. विदर्भ, जहां सामान्य तौर पर 15 जून तक मानसून पहुंच जाता है, अभी भी इंतजार कर रहा है. उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में भी मानसून की एंट्री अब सामान्य से 5 से 10 दिन देरी से होने की संभावना जताई जा रही है. यही वजह है कि मौसम विभाग लगातार नई परिस्थितियों का आकलन कर रहा है.
- मानसून की इस रुकावट का असर जमीन पर साफ दिखाई देने लगा है. कई क्षेत्रों में तापमान फिर बढ़ने लगा है. किसानों ने खेत तैयार कर लिए हैं, लेकिन पर्याप्त बारिश नहीं होने से बुआई का काम प्रभावित हो रहा है. यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो खरीफ सीजन की शुरुआत पर असर पड़ सकता है.
आखिर इस समय कहां पहुंचा है मानसून?
मौजूदा स्थिति में मानसून दक्षिण भारत और पूर्वी भारत के अधिकांश हिस्सों को कवर कर चुका है. पूर्वोत्तर राज्यों में भी अच्छी बारिश जारी है. लेकिन मध्य भारत, पश्चिमी भारत और उत्तर-पश्चिम भारत में इसकी प्रगति अपेक्षित गति से नहीं हो रही है. विदर्भ, मध्य महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश के कुछ हिस्से और उत्तर भारत के कई इलाके अब भी मानसूनी बारिश का इंतजार कर रहे हैं. लखनऊ में सामान्य तौर पर 23 जून के आसपास मानसून पहुंचता है, लेकिन इस बार इसके जून के अंतिम सप्ताह या जुलाई की शुरुआत में पहुंचने की संभावना जताई जा रही है. मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि बंगाल की खाड़ी में यदि अनुकूल सिस्टम विकसित होते हैं तो जून के दूसरे पखवाड़े में मानसून फिर सक्रिय हो सकता है.
बंगाल की खाड़ी में लो-प्रेशर सिस्टम की कमी बनी बड़ी वजह
मानसून की रफ्तार धीमी होने का सबसे बड़ा कारण बंगाल की खाड़ी में मजबूत निम्न दबाव क्षेत्रों का न बनना माना जा रहा है. सामान्य तौर पर जून में एक या दो लो-प्रेशर सिस्टम विकसित होते हैं. यही सिस्टम मानसूनी हवाओं को ताकत देते हैं और नमी को देश के अंदरूनी हिस्सों तक पहुंचाते हैं. इस साल ऐसे सिस्टम लगभग नदारद रहे हैं. परिणामस्वरूप मानसूनी हवाओं को आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त ऊर्जा नहीं मिल सकी. मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक बंगाल की खाड़ी में कोई प्रभावी सिस्टम नहीं बनता, तब तक मानसून की गति सामान्य होने की संभावना कम है.
कमजोर मानसून ट्रफ भी बन रही परेशानी
मानसून ट्रफ वह निम्न दबाव वाली पट्टी होती है जो उत्तर और मध्य भारत में व्यापक बारिश को बढ़ावा देती है. इस बार यह ट्रफ सामान्य से कमजोर बनी हुई है. कमजोर ट्रफ का मतलब है कि वर्षा वाले बादलों का विकास और विस्तार भी सीमित रहेगा. इसके अलावा उत्तर भारत में सक्रिय पश्चिमी विक्षोभों ने भी मानसून की सामान्य प्रगति को प्रभावित किया है. इन मौसमी सिस्टम ने हवा के पैटर्न में बदलाव किया है, इससे मानसूनी धाराएं अपनी पूरी ताकत नहीं दिखा पा रही हैं.
अल नीनो ने बढ़ाई मौसम वैज्ञानिकों की चिंता
इस साल अल नीनो की वापसी भी मौसम वैज्ञानिकों की चिंता का बड़ा कारण है. भारतीय मौसम विभाग पहले ही संकेत दे चुका है कि जून से सितंबर के मानसून सीजन के दौरान मध्यम से मजबूत अल नीनो परिस्थितियां विकसित हो सकती हैं. इतिहास बताता है कि अल नीनो वाले सालों में भारत में सामान्य से कम बारिश होने की आशंका रहती है. अल नीनो प्रशांत महासागर के तापमान में बदलाव से जुड़ी एक वैश्विक मौसमी घटना है, जो मानसूनी हवाओं को कमजोर कर सकती है. इस बार हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) भी तटस्थ स्थिति में रहने की संभावना है, इससे अल नीनो के प्रभाव को संतुलित करने वाली कोई मजबूत सकारात्मक ताकत फिलहाल दिखाई नहीं दे रही.
मौजूदा स्थिति में मानसून दक्षिण भारत और पूर्वी भारत के अधिकांश हिस्सों को कवर कर चुका है. (PTI)
फिर कुछ इलाकों में बारिश क्यों हो रही है?
कई लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि अगर मानसून धीमा पड़ गया है तो देश के कुछ हिस्सों में बारिश क्यों हो रही है. इसका जवाब यह है कि जून में होने वाली हर बारिश सीधे सक्रिय मानसून से नहीं जुड़ी होती. पूर्वोत्तर भारत, पूर्वी राज्यों और कुछ अन्य क्षेत्रों में स्थानीय गरज-चमक वाले बादल, क्षेत्रीय मौसम प्रणालियां और नमी से भरी हवाएं बारिश करा रही हैं. उदाहरण के लिए हाल में नागपुर और विदर्भ के कुछ हिस्सों में हुई बारिश स्थानीय संवहनीय गतिविधियों के कारण हुई थी, न कि पूरी तरह सक्रिय मानसून के कारण. इसी तरह पूर्वोत्तर राज्यों में बंगाल की खाड़ी शाखा और स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों की वजह से लगातार अच्छी बारिश हो रही है.
क्या अभी चिंता करने की जरूरत है?
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि मानसून का कमजोर और सक्रिय चरणों के बीच झूलना कोई नई बात नहीं है. कई बार जून में भारी वर्षा घाटा देखने को मिलता है और जुलाई में अच्छी बारिश इसकी भरपाई कर देती है. हालांकि इस बार चिंता की वजह केवल बारिश की कमी नहीं है. मानसून की धीमी प्रगति, सैटेलाइट तस्वीरों में बादलों की कमी, मध्य भारत में 65 प्रतिशत वर्षा घाटा और अल नीनो के संकेत एक साथ दिखाई दे रहे हैं. यही कारण है कि अगले दो सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं. यदि जून के आखिर तक मानसून फिर सक्रिय हो जाता है तो स्थिति संभल सकती है. लेकिन यदि शुष्क दौर जुलाई तक खिंचता है तो कृषि, जलाशयों और पेयजल उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ सकती है.
मानसून अचानक क्यों रुक गया?
मानसून की रफ्तार धीमी होने का मुख्य कारण बंगाल की खाड़ी में मजबूत लो-प्रेशर सिस्टम का न बनना है. इसके अलावा कमजोर मानसून ट्रफ और उत्तर भारत में सक्रिय पश्चिमी विक्षोभों ने भी मानसूनी प्रवाह को प्रभावित किया है. इन कारणों से मानसून को आगे बढ़ने के लिए जरूरी ऊर्जा नहीं मिल पा रही है.
क्या अल नीनो इस साल मानसून को प्रभावित कर सकता है?
हां, अल नीनो इस साल एक महत्वपूर्ण कारक बन सकता है. मौसम विभाग ने संकेत दिया है कि मानसून सीजन के दौरान मध्यम से मजबूत अल नीनो परिस्थितियां विकसित हो सकती हैं. आमतौर पर अल नीनो भारत में बारिश की मात्रा को कम कर सकता है और मानसूनी हवाओं को कमजोर बना सकता है.
किसानों के लिए अगले कुछ सप्ताह कितने महत्वपूर्ण हैं?
अगले दो सप्ताह किसानों के लिए बेहद अहम हैं. धान, सोयाबीन, कपास और दलहन जैसी खरीफ फसलें समय पर होने वाली जून और शुरुआती जुलाई की बारिश पर निर्भर करती हैं. यदि मानसून जल्द सक्रिय हो जाता है तो बुआई सामान्य हो सकती है. लेकिन बारिश में ज्यादा देरी हुई तो उत्पादन और कृषि अर्थव्यवस्था दोनों प्रभावित हो सकते हैं.

