विधानसभा चुनाव 2025
सवाल सबसे बड़ा ये है कि अक्टूबर में राज्य विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में जेडीयू पर इसके संभावित चुनावी प्रभाव पर बिहार की राजनीति में तीखी बहस चल रही है। लालू यादव जैसे नेताओं को छोड़ दिया जाए, तो नीतीश कुमार समाजवादी चेहरा होते हुए भी राजनीति में लचीलापन लेकर चलते हैं। उन्होंने बीजेपी से अपने संबंध को आज भी बरकरार रखा है। जानकार मानते हैं कि नीतीश कुमार सियासत में दोहरी विशेषता लेकर चलते हैं। नीतीश कुमार को धर्मनिरपेक्ष समाजवाद विरासत में मिला है। हालांकि, उन्होंने जब भी मौका मिला, बीजेपी का साथ दिया और बीजेपी का साथ लिया।
मुस्लिम वोट हुए अलग
कुछ समय पूर्व की बात याद करें, तो आपको पता चलेगा कि जेडीयू ने नागरिकता संशोधन अधिनियम यानी सीएए का समर्थन किया था। इसे केंद्र सरकार ने दिसंबर, 2019 में पारित किया था। उस समय जेडीयू के भीतर रहे, प्रशांत किशोर और पवन वर्मा जैसे लोगों ने इसका विरोध किया था। उससे पूर्व जेडीयू ने धारा 370 को रद्द करने का विरोध किया था, लेकिन इसके खिलाफ मतदान करने से परहेज किया। जेडीयू ने ट्रिपल तलाक मामले को खत्म करने के मामले का भी विरोध किया, लेकिन खिलाफ में वोट नहीं दिया। दोनों मौकों पर पार्टी वोट से वॉक आउट कर गई। पार्टी जानती थी कि उससे बीजेपी को ही फायदा होगा।
जेडीयू की राजनीति
जेडीयू ने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह का विरोध नहीं किया। बिहार के मुसलमान ये बखूबी जानते हैं कि नीतीश कुमार बीजेपी के सहयोगी हैं। उनके मन के अंदर ये बात होती है कि कई मुद्दों पर नीतीश कुमार बीजेपी का विरोध करें। ये उपरोक्त उदाहरण बताते हैं कि मुसलमानों ने जेडीयू को कभी सामूहिक रूप से वोट इन्हीं कारणों से नहीं किया। हां, 2015 और 2020 के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम समुदाय ने जेडीयू को जमकर वोट किया। आंकड़े बताते हैं कि जब जेडीयू एनडीए में लौटी, तो उसे मुस्लिमों के महज पांच फीसदी ही वोट मिले। वो भी उन इलाकों में जहां जेडीयू ने मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे।
मुस्लिम वोटों की चिंता
सवाल उठता है कि क्या जेडीयू को मुस्लिम वोटों की चिंता करनी चाहिए? बिहार विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी इस मुद्दे पर विभाजित दिखती है। पार्टी के शक्तिशाली चेहरे हिंदू वोटरों को वरीयता देने के पक्ष में हैं। कारण, सहयोगी बीजेपी का होना बताया जाता है। हालांकि, वक्फ बिल समर्थन के बाद से जेडीयू से मुस्लिम वोटर पूरी तरह नाराज बताए जाते हैं। जानकार मानते हैं कि नीतीश कुमार अब आने वाले दिनों में लंबे समय तक राजनीति में सक्रिय नहीं रह सकते। उधर, पार्टी के अंदर नई पौध पैदा हो रही है। ये पौध धर्मनिरपेक्ष का बोझ ढोना नहीं चाहती।
जेडीयू के अंदर हलचल
पार्टी के अंदर संजय झा, ये खुद बीजेपी से आए हैं। नीतीश कुमार खुद ही ऐसे नेताओं को निर्णय लेने वाली भूमिका में देखना चाहते हैं। ललन सिंह जैसे चेहरे बीजेपी के कट्टर समर्थक बने हुए हैं। जानकारों को लगता है कि नीतीश कुमार के बाद पार्टी की कमान सवर्ण जाति के नेताओं के पास होगी। वो लोग मुस्लिम वोटों का ख्याल नीतीश की तरह नहीं करेंगे। पार्टी के अंदर ओबीसी चेहरों की कमी है। हालांकि, जेडीयू ये देख रही है कि बीजेपी सम्राट चौधरी जैसे कोइरी जाति से संबंध रखने वाले को आगे बढ़ा रही है। जानकार साफ मानते हैं कि नीतीश कुमार की जरूरत बीजेपी को हिंदू वोटों के लिए नहीं, हिंदुओं में ओबीसी और अति पिछड़ी जाति (ईबीसी) के वोटों के लिए है।
चिराग की हालत खराब
वक्फ संशोधन बिल का समर्थन जेडीयू को मुस्लिम वोटों से वंचित कर सकता है। सीमांचल में इसका सीधा असर दिखेगा। वक्फ बिल को लेकर चिराग पासवान की स्थिति भी नीतीश कुमार की तरह हो गई है। वह अपने पिता रामविलास पासवान की तरह धर्मनिरपेक्ष समाजवाद की विरासत नहीं रखते हैं। उन्होंने मुसलमानों को अलग-थलग करने का एक सोचा-समझा जोखिम उठाया है। क्योंकि वह एनडीए के हिस्से के रूप में हिंदू वोटों को एकजुट करने पर निर्भर हैं। चिराग पासवान ने रही सही कसर राजद और कांग्रेस पर “तुष्टिकरण की राजनीति” करने के लिए हमला करके। उसके बाद वक्फ बिल का समर्थन करके और बाबा बागेश्वर का बचाव करके अपने ताबूत में अंतिम कील ठोक लिया है।

