नई दिल्ली के भारत मंडपम में दो दिन तक चली ब्रिक्स समिट आज खत्म हो गई. ब्रिक्स के मंच पर भारत ने अपनी कूटनीतिक ताकत, ग्लोबल साउथ में अपनी भूमिका और रूस, चीन और ईरान जैसे देशों के साथ अपने रिश्तों को एक साथ साधने की कोशिश की. समिट में नई दिल्ली डिक्लेरेशन को मंजूरी मिली और भारत की तरफ से रखे गए कई प्रस्तावों को आगे बढ़ाने पर सहमति बनी. इनमें आतंकवाद के खिलाफ सहयोग, ग्लोबल गवर्नेंस में सुधार, लोकल करेंसी में कारोबार और आसान क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट जैसे मुद्दे शामिल रहे. समिट के दूसरे दिन प्रधानमंत्री मोदी ने कज़ाकिस्तान, फिलीपींस, मिस्र और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपतियों से भी मुलाकात की और इस सभी देशों के साथ आपसी सहयोग और ग्लोबल डेवलपमेंट पर बातचीत की.
पीएम मोदी ने कहा, ‘BRICS केवल देशों का समूह नहीं, सॉल्यूशन का इकोसिस्टम है. हम आशा करते हैं कि इस समिट से उसमें एडप्ट किया गया न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन, हमारे शेयर्ड विजन और फ्यूचर कॉपरेशन को स्पष्ट दिशा देगा. BRICS अपने तीसरे दशक में प्रवेश करने जा रहा है, अब दुनिया हमसे केवल आडिया और कमिटमेंट नहीं, कंक्रीट रिजल्ट की अपेक्षा करता है… मैं ब्रिक्स के अगले होस्ट के तौर पर चीन को एक बार फिर बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं. न्यू दिल्ली समिट को सफल बनाने के लिए मैं आप सभी का और आप सबकी टीम्स का विशेष रूप से अभिनंदन करता हूं, आप सभी की सुखद और सुरक्षित यात्रा की कामना करता हूं. आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद.’
दिल्ली में हुआ ब्रिक्स समिट सिर्फ़ एक शिखर सम्मेलन की सफलता नहीं है. ये भारत की सफलता है. रात चार बजे तक चली बातचीत. जंग की छाया. देशों के बीच दरार. पुरानी शिकायतें और सुबह एक पन्ना, नई दिल्ली घोषणापत्र. BRICS देशों का साझा ऐलान सर्वसम्मति या कहें कि बिना आपत्ति के जारी किया गया.
- जापान टाइम्स ने लिखा, ईरान युद्ध के बिगड़ते हालात के बीच मोदी ने ब्रिक्स में आम सहमति बनाई.
ब्लूमबर्ग ने लिखा- मोदी ने प्रतिद्वंद्वी देशों को एक पन्ने पर ला दिया. - अमेरिकी मीडिया में BRICS शिखर सम्मेलन को बदलती वैश्विक व्यवस्था के संकेत के तौर पर दिखाया गया.
- न्यू यॉर्क टाइम्स ने लिखा- मोदी विकासशील दुनिया की सबसे असरदार आवाज़
- वॉल स्ट्रीट जनरल ने लिखा- भारत-चीन के बीच रिश्तों में आई नरमी से पता चलता है कि भारत खुद को नए सिरे से ढालने की कोशिश कर रहा है
- रूस के अखबार TASS में लिखा गया- मोदी के नई दिल्ली घोषणापत्र को सर्वसम्मति से अपनाया गया, ये एक बड़ी कूटनीतिक जीत है.
- TASS की एक अलग हेडलाइन में लिखा गया- BRICS को अगले 20 वर्षों के लिए एक महत्वाकांक्षी एजेंडे की आवश्यकता है- मोदी
- अल जज़ीरा ने लिखा- BRICS देशों ने मध्य पूर्व में ‘संयम’ बरतने और वैश्विक व्यापार के सुचारू प्रवाह का आग्रह किया.
- इंडोनेशिया के अखबर Tempo.co ने लिखा- ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026: पुतिन और मोदी ने साझेदारी को फिर से दोहराया
जब दुनिया बंटी हुई थी तब फैसला दिल्ली में हुआ. ईरान–UAE की खाई, पश्चिम एशिया की जंग, चीन–भारत की पुरानी दरार… सबके बीच भारत ने सर्वसम्मति बनाई और ये पैकेज उसी कामयाबी का हिस्सा है. लेकिन आपके मन में सवाल होगा कि भारत को इससे मिला क्या? तो इसका जवाब है 45 पन्नों और 140 बिन्दुओं के नई दिल्ली घोषणापत्र में. BRICS से भारत को तीन बड़ी कामयाबी मिली.
पहला- पहलगाम अब सिर्फ भारत का दर्द नहीं, दुनिया का दस्तावेज़ है… 22 अप्रैल 2025 को 26 जानें गईं थी, जिसकी घोषणा में नाम लेकर सबसे सख्त शब्दों में निंदा की गई. क्रॉस-बॉर्डर आतंक, आतंकियों की फंडिंग और आतंकवादियों को सुरक्षित ठिकाना दिए जाने के खिलाफ मिलकर कार्रवाई करने की प्रतिबद्धता दोहराई और ये भाषा उस चीन के हस्ताक्षर के साथ आई, जिसे पाकिस्तान अपना सबसे बड़ा सहारा मानता है. पहलगाम को वैश्विक टेक्स्ट में बैठाना, ये भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक-कूटनीतिक जीत है इस समिट की.
दूसरा- विश्व व्यवस्था में भारत की कुर्सी फिर लॉक हुई. चीन और रूस ने फिर कहा कि भारत और ब्राज़ील की संयुक्त राष्ट्र में, खासकर सुरक्षा परिषद में, बड़ी भूमिका होनी चाहिए. यानी भारत का स्थायी दावा अब सिर्फ़ दिल्ली की मांग नहीं रहा बल्कि BRICS का सामूहिक वचन बन गया.
तीसरा- ब्लॉक का एजेंडा भारत चला रहा है. प्रधानमंत्री मोदी ने कहा ब्रिक्स अब परिपक्व हो चुका है. अगले 20 सालों का महत्वाकांक्षी एजेंडा चाहिए. समझौतों पर अमल ट्रैक होना चाहिए. मेज़बान सिर्फ़ स्वागत नहीं करता. मेज़बान दिशा तय करता है. दिल्ली ने दिशा तय की. इसलिए ये कहना अधूरा होगा कि ब्रिक्स सफल हुआ. सही वाक्य ये है कि ब्रिक्स इसलिए सफल हुआ क्योंकि भारत ने खेल संभाला.
अब वो तीन रिश्ते जिनके बिना ये दस्तावेज़ कागज़ पर भी न आता.
पहला, ईरान- पश्चिम एशिया की जंग इस समिट की सबसे ऊंची दीवार थी. फरवरी से अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच युद्ध चल रहा है. खाड़ी में जवाबी हमले हो रहे हैं. होर्मुज़ के पास व्यापार और ऊर्जा का खतरा. ब्रिक्स में ईरान भी बैठा है, यूएई भी, सऊदी भी. तीनों अलग मोर्चे पर हैं, लेकिन जो देश ये समिट संभालता, कामयाबी और नाकामयाबी उसी की गिनी जाती है और ये समिट भले ही BRICS का था, लेकिन मंच भारत ने संभाला था.
पीएम मोदी ने कहा, ‘दुनिया में तनाव लगातार बढ़ रहा है और इसका सीधा असर आम लोगों की जिंदगी पर पड़ रहा है. महामारी, जलवायु आपदाओं और सप्लाई चेन में रुकावटों ने दिखाया है कि आज दुनिया के देश एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. ऐसे में किसी एक जगह आने वाला संकट दूसरे देशों को भी प्रभावित कर सकता है.
लेकिन BRICS में साझा घोषणा पत्र तक पहुंचना इतना आसान नहीं था. इसके लिए भारत ने तीन कदम बहुत संवेदशनशीलता से चले. बहुत संयम से… बहुत नजाकत के साथ तालमेल बिठाया.
- पहला कदम- प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति पेज़ेशिकायन से द्विपक्षिय मुलाकात की. एकजुटता का संदेश दिया. संवाद के बाद लंबी साझेदारी का संदेश दिया.
- दूसरा कदम- जंग शुरू होने के बाद ईरान के नेता और अबू धाबी क्राउन प्रिंस की सबसे उच्चस्तरीय मुलाकात भारत की मेजबानी में हुई.
- तीसरा कदम- ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया गया, जिससे ईरान भी दस्तावेज़ पर दस्तखत करे और खाड़ी भी पीछे ना हटे.
भारत ने दोनों देशों में किसी को हारने नहीं दिया, बल्कि दोस्ती और सयोग का पुल बना दिया. ईरान के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री मोदी की केमिस्ट्री की जो तस्वीरें आईं वो तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में छा गईं. पीएम मोदी ने उनका हाथ थामा. पेज़ेशकियान का राष्ट्रपति भवन तक स्वागत किया गया. उनकी बेटी ज़हरा ब्रिक्स बाज़ार तक पहुंचीं. संदेश ये नहीं था कि भारत किसी खेमे में चला गया. संदेश ये था कि भारत इतना बड़ा मंच है कि युद्ध लड़ने वाले भी इस मंच पर समझौता करते हैं और दस्तखत भी यहीं करते हैं. समिट के पहले दिन भारत ने जो कमाया वो और बड़ी चीज़ है. वो है ईरान के साथ विश्वास… खाड़ी देशों के साथ संतुलन और दुनिया के सामने ये छवि कि दिल्ली संकट का समधान है. संकट का शिकार नहीं. यही वजह है कि BICS में भारत की मेजबानी का जादू ऐसा चला कि विपक्ष के नेताओं ने भी इसकी तारीफ की.
कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने कहा, ‘मुझे लगता है कि हम सभी इसका स्वागत कर सकते हैं. ये बहुत व्यापक और अच्छी तरह से तैयार किया गया लगता है. अच्छी बात ये है कि कुछ बहुत ही विवादित और टकराव वाले मुद्दे सामने आ रहे थे फिर भी सभी ने आम सहमति वाले बयान को स्वीकार कर लिया है. मुझे लगता है कि हमें इसका स्वागत करना चाहिए.ट
BRICS में दूसरी केमिस्ट्री पीएम मोदी और शी जिंपिंग से बनी. शी जिनपिंग 2019 के मल्लापुरम मुलाकात के बाद पहली बार भारतीय धरती पर उतरे. 24 घंटे वो भारतीय धरती पर रहे. हालांकि पीएम मोदी और जिनपिंग की दो साल में ये तीसरी मुलाकात थी. 2024 में कज़ान और 2025 में तियानजिन में रिश्ते धीरे-धीरे गर्म हुए और दिल्ली ने उसे मंच दिया. इस बाद दोनों नेताओं के बीच 40 मिनट की बातचीत हुई और भारत की भाषा वो रही जो ताकत दिखाती है, थकान नहीं. प्रधानमंत्री ने कहा, मतभेद विवाद न बनें…. रिश्ता तीन बातों से चले…. आपसी सम्मान, आपसी संवेदनशीलता, आपसी हित. सीमा पर शांति को द्विपक्षीय रिश्ते की बुनियाद बताया गया.
जिनपिंग ने भी कहा चीन और भारत पार्टनर हैं, प्रतिद्वंद्वी नहीं और जो प्रगति आई है उसे संजोना चाहिए. भारत ने कहा, सीमा समझौतों का पालन हो. व्यापार का असंतुलन और बाजार की पहुंच हल हो. चीन अगले साल ब्रिक्स की मेजबानी करेगा, जिसका समर्थन भारत ने किया और जिनपिंग ने सफल आयोजन पर बधाई दी.
तीसरी केमेट्री पुतिन और मोदी में बनी. पीएम मोदी के साथ वही पुराने अंदाज में कदम से कदम मिलाते दिखे. मतलब अंदाज पुराना था लेकिन संदेश नया था. इंडोनेशिया के अखबार से लेकर रूस के टास तक हेडलाइन एक रही. साझेदारी फिर मजबूत… रूस के लिए ये मंच पश्चिमी दबाव के बाहर की सांस है. भारत के लिए रूस रक्षा, ऊर्जा और बहुध्रुवीय व्यवस्था का स्तंभ है, लेकिन इस बार फ्रेम बराबर बैठक का नहीं, मेज़बान का है. घोषणा में यूक्रेन का अलग पैराग्राफ नहीं है. एकतरफा प्रतिबंधों की निंदा थी और ये संदेश अमेरिका के लिए था. और ये भाषा रूस को राहत देते वाली थी, लेकिन भारत को किसी गुट का पिछलग्गू नहीं दिखाती.
ग्रुप फोटो में मोदी, शी और पुतिन के बीच खड़े हैं और ये फ्रेम कोई संयोग नहीं, रणनीति है. और यही वजह है कि रूस के अखबर ने लिखा कि मोदी ने अगले बीस साल का एजेंडा तय कर दिया. यानी भारत रूस का पुराना मित्र भर नहीं रहा. भारत उस मित्रता को संस्था में बदल रहा है. केमिस्ट्री भावना की है और कमान भारत की है.
लेकिन कूटनीति की सबसे बड़ी तस्वीर नेताओं की नहीं होती. परिवारों की होती है. पहलगाम के छब्बीस घर. डेढ़ साल बाद वही हमला दुनिया के दस्तावेज़ में नाम लेकर दर्ज हुआ. और यही वजह है कि पहलगाम आतंकी हमले के सभी पीड़ितों ने प्रधानमंत्री मोदी का धन्यवाद दिया.
शुभम द्विवेदी की पत्नी ऐशन्या द्विवेदी ने कहा, ‘मैं माननीय प्रधानमंत्री को सभी 26 परिवार की तरफ से खास कर शुभम द्विवेदी परिवार की तरफ से बहुत-बुहत धन्यवाद देना चाहूंगी कि उन्होंने आतंकवाद जैसे इतने बड़े मुद्दे को पहली बार, हमारे हिंदुस्तान से किसी ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इतने बड़े स्तर पर उठाया गया है.’
ब्रिक्स समिट खत्म होने के बाद भी भारत मंडपम में पीएम मोदी ने कई राष्ट्राअध्यों से मुलाकात की. नाइजीरिया, कज़ाकिस्तान, बुरुंडी, युगांडा, दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया से व्यापार से ऊर्जा तक, खनिज से स्किलिंग तक बात की. भारत मंडपम में संवाद थमा नहीं, मेज़ दिल्ली की रही लेकिन अब साझेदारी दिल्ली से आगे बढ़ गई है.
विदेश मंत्रालय में पूर्वी क्षेत्र के सचिव सुधाकर दलेला ने कहा, ‘इन दो दिनों के कार्यक्रमों को दो अलग-अलग उद्देश्यों के साथ तैयार किया गया था, कल के सत्र में ग्लोबल गवर्नेंस और बहुपक्षवाद पर सीधे और खुलकर बातचीत हुई और नई दिल्ली घोषणापत्र को अपनाया गया वहीं आज के खुले सत्र का मकसद उस आम सहमति को एक बड़े परिवार और ग्लोबल साउथ के साझेदारों तक पहुंचाना था.’
राहुल गांधी के आरोप की निकली हवा
उधर विपक्ष का एक पुराना आरोप भी इस समिट में अपने-आप कमज़ोर पड़ गया. कांग्रेस और राहुल गांधी बार-बार कहते रहे हैं कि जब कोई विदेशी नेता भारत आता है, तो सरकार विपक्ष के नेता को उनसे मिलने नहीं देती, इजाज़त नहीं मिलती. इस बार तस्वीर उलटी निकली. ब्रिक्स के मेहमान मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम रविवार सुबह राहुल गांधी से नाश्ते पर मिले. मुलाकात में प्रियंका गांधी भी मौजूद रहीं. कांग्रेस ने ख़ुद तस्वीरें जारी कीं. यानी आरोप वही पुराना रहा, मौका नया आया और मुलाकात हो गई. समिट की कामयाबी सिर्फ़ घोषणा तक नहीं थी. दिल्ली में जो मेहमान आए, उनके दरवाज़े विपक्ष के लिए भी बंद नहीं थे. अब इस दफ़ा ये कहना मुश्किल हो गया कि सरकार ने विपक्ष को विदेशी नेताओं से मिलने नहीं दिया.
तो हिसाब एकदम सीधा है. ईरान के साथ भारत ने जंग के पार पुल बनाया. चीन के साथ मतभेद रखा, मेज़ नहीं तोड़ी, अपना पैराग्राफ लिखवाया. रूस के साथ दोस्ती निभाई और दिशा दिल्ली ने दी. भारत को मिला नाम, पहलगाम. मिला दावा, सुरक्षा परिषद. मिला तमगा, विश्व मीडिया का वो शब्द..ये कोई तख्तापलट नहीं है. मिले धन्यवाद, छब्बीस परिवारों के. ब्रिक्स की कामयाबी कोई संयोग नहीं है. ब्रिक्स की कामयाबी भारत की मेज़बानी है, भारत की भाषा है, भारत की इच्छाशक्ति है. दुनिया बंटी हुई थी. फैसला नई दिल्ली का आया. ये ब्रिक्स की जीत है. और ये जीत भारत की है.

