सुप्रीम कोर्ट ने 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR लगाने के फैसले पर फिलहाल रोक लगाने से इनकार कर दिया है. हालांकि कोर्ट ने केंद्र सरकार के इस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस करते हुए कई सख्त और जरूरी सवालों का जवाब मांगा है. सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना की बेंच ने इस मामले में केंद्र सरकार, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI), नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) और यूपीआई एंड सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी से चार हफ्ते के अंदर जवाब मांगा है.
वकील आशुतोष दुबे के जरिए वकील अंजन दत्ता की तरफ से दायर याचिका में केंद्र सरकार के 14 सितंबर के उस गैजेट नोटिफिकेशन को चुनौती दी गई है, जो पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 की धारा 10ए के तहत जारी किया गया था. साथ ही, 15 सितंबर को घोषित उस फ्रेमवर्क को भी चुनौती दी गई है जिसके तहत 2,000 रुपये से अधिक के खास पर्सन-टू-मर्चेंट (पी2एम) यूपीआई ट्रांजैक्शन पर एमडीआर लगाया जाना है. उन्होंने दलील दी कि UPI के आने के बाद ब्लैक मनी से जुड़े ट्रांजैक्शन में कमी आई है.
यह टैक्स है या फीस?
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सरकार से पूछा कि यह टैक्स है या फीस? कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि अगर इसे फीस नहीं कहा जा सकता तो इस तरह रकम लेने का कानूनी आधार क्या है और इसके बदले कौन-सी सेवा दी जा रही है. अदालत ने इस मामले को केवल कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि तकनीकी पहलू वाला मामला भी बताया और सरकार से इन सवालों का विस्तृत जवाब हलफनामे के जरिए देने को कहा.
केंद्र सरकार की तरफ से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एन. वेंकटरमन ने कहा कि ये चार्ज 15 अक्टूबर से लागू होंगे और 96 प्रतिशत ट्रांजैक्शन पर यह चार्ज नहीं लगेगा. एन. वेंकटरमन यह भी कहा कि जरूरी सेवाओं के लिए चार्ज की सीमा 5 रुपये तय की गई है. उन्होंने जोर दिया कि यह टैक्स या सरकारी फीस नहीं है.
फिर जस्टिस बागची ने सवाल किया कि अगर यह फीस नहीं तो इस चार्ज का स्वरूप क्या है? उन्होंने यह भी पूछा कि कार्यपालिका के पास इस तरह का चार्ज तय करने का अधिकार किस सीमा तक है.
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को क्या बताया?
इस पर एएसजी वेंकटरमण ने बताया कि इस एमडीआर से सरकार को एक रुपया नहीं मिलेगा. एएसजी ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजैक्शन प्रोसेस करने में बैंकों का खर्च आता है और क्रेडिट-डेबिट कार्ड ट्रांजैक्शन पर चार्ज लगते हैं, जबकि यूपीआई पेमेंट को अब तक ऐसे चार्ज से छूट मिली हुई है. उन्होंने कहा कि यूपीआई इकोसिस्टम को ठीक से काम करते रहने के लिए यह लेवी जरूरी है.
उन्होंने बताया कि इस व्यवस्था में दो तरह के ऑपरेटर हैं, जिनमें बैंक भी शामिल हैं. उनके मुताबिक यह सरकार की ओर से की जाने वाली कोई वैधानिक वसूली नहीं, बल्कि पेमेंट सिस्टम से जुड़े पक्षों के बीच सेटलमेंट फीस है, जिसे NPCI की ओर से सुविधाजनक बनाया जाता है.
सीजेआई सूर्यकांत ने फिर कहा कि इन सभी तथ्यों को हलफनामे पर रिकॉर्ड में लाया जाना चाहिए. उन्होंने संकेत दिया कि मामला मुख्य रूप से तकनीकी पहलुओं से जुड़ा है.

