India
oi-Puja Yadav
Supreme
Court
on
POCSO:
सुप्रीम
कोर्ट
ने
POCSO
कानून
को
लेकर
एक
बेहद
जरूरी
और
अहम
फैसला
सुनाया
है।
अदालत
ने
कहा
कि
जो
कानून
बच्चों
को
यौन
अपराधों
से
बचाने
के
लिए
बनाया
गया
था,
वह
कई
मामलों
में
बच्चों
के
लिए
ही
परेशानी
बन
रहा
है।
कोर्ट
ने
चिंता
जाहिर
करते
हुए
कहा
कि,
कुछ
मामलों
में
इस
कानून
का
गलत
इस्तेमाल
किया
जा
रहा
है,
जिससे
नाबालिगों
को
बेवजह
कानूनी
मुश्किलों
का
सामना
करना
पड़ता
है।
खासकर
ऐसे
मामलों
में,
जहां
किशोर
आपसी
सहमति
से
रिश्ते
में
होते
हैं,
वहां
POCSO
का
कठोर
इस्तेमाल
न्याय
के
उद्देश्य
को
नुकसान
पहुंचा
रहा
है।
ऐसे
में
जरूरी
है
कि
POCSO
कानून
को
समझदारी
और
सही
तरीके
से
लागू
किया
जाए।

इसी
पृष्ठभूमि
में
सुप्रीम
कोर्ट
ने
केंद्र
सरकार
को
निर्देश
दिया
है
कि
वह
POCSO
कानून
में
‘रोमियो-जूलियट’
जैसी
धारा
जोड़ने
पर
गंभीरता
से
विचार
करे,
ताकि
वास्तविक
किशोर
प्रेम
संबंधों
को
अपराध
की
श्रेणी
में
डालने
से
बचाया
जा
सके।
क्या
है
पूरा
मामला?
यह
टिप्पणी
सुप्रीम
कोर्ट
ने
उत्तर
प्रदेश
से
जुड़े
एक
मामले
की
सुनवाई
के
दौरान
की।
इस
केस
में
इलाहाबाद
हाई
कोर्ट
ने
नाबालिग
लड़की
से
जुड़े
यौन
उत्पीड़न
मामले
में
आरोपी
को
जमानत
दी
थी
और
साथ
ही
यह
निर्देश
भी
दिया
था
कि
POCSO
के
हर
मामले
में
शुरुआत
में
ही
पीड़ित
की
मेडिकल
उम्र
जांच
कराई
जाए।
उत्तर
प्रदेश
सरकार
ने
हाई
कोर्ट
के
इस
आदेश
को
सुप्रीम
कोर्ट
में
चुनौती
दी
थी।
POCSO
के
दुरुपयोग
पर
सुप्रीम
कोर्ट
की
चिंता
न्यायमूर्ति
संजय
करोल
और
न्यायमूर्ति
एन.
कोटिश्वर
सिंह
की
पीठ
ने
सुनवाई
के
दौरान
कहा
कि
POCSO
कानून
के
दुरुपयोग
की
ओर
अदालतें
पहले
भी
कई
बार
ध्यान
दिला
चुकी
हैं।
पीठ
ने
कहा
कि-इन
कानूनों
के
दुरुपयोग
को
बार-बार
न्यायिक
संज्ञान
में
लिया
गया
है।
ऐसे
में
यह
जरूरी
है
कि
माइनर
रिलेशनशिप
और
गंभीर
यौन
अपराधों
के
बीच
स्पष्ट
अंतर
किया
जाए।
अदालत
ने
इस
फैसले
की
एक
कॉपी
भारत
सरकार
के
लॉ
सेक्रेटरी
को
भेजने
का
निर्देश
भी
दिया,
ताकि
इस
मुद्दे
पर
नीतिगत
स्तर
पर
विचार
किया
जा
सके।
क्या
है
‘रोमियो-जूलियट’
क्लॉज?
दरअसल,
‘रोमियो-जूलियट’
क्लॉज
का
उन
मामलों
को
में
राहत
देता
है,
जहां
उम्र
में
करीब-करीब
नाबालिग
आपसी
सहमति
से
रिश्ते
में
होते
हैं।
यह
प्रावधान
कई
देशों
में
मौजूद
है,
ताकि
सहमति
से
बने
माइनर
रिलेशनशिप
को
अपराध
की
कैटेगरी
में
न
डाला
जाए।
हालांकि,
भारतीय
POCSO
अधिनियम
में
फिलहाल
यह
क्लॉज
स्पष्ट
रूप
से
शामिल
नहीं
है,
लेकिन
कई
अदालतें
ऐसे
मामलों
में
न्यायिक
विवेक
का
इस्तेमाल
करती
रही
हैं।
उदाहरण
के
तौर
पर
अगर
17
साल
की
लड़की
और
18
साल
का
लड़का
सहमति
से
संबंध
में
हैं,उम्र
का
अंतर
बहुत
कम
है
और
किसी
तरह
की
जबरदस्ती
या
शोषण
नहीं
है।
ऐसे
मामलों
में
अदालतें
कठोर
दंड
से
बचने
का
रुख
अपनाती
हैं।
वहीं,
जबरदस्ती,
शोषण
या
बड़े
उम्र
अंतर
के
मामलों
में
कानून
पूरी
सख्ती
से
लागू
होगा।
हाई
कोर्ट
का
आदेश
क्यों
रद्द
किया
गया?
सुप्रीम
कोर्ट
ने
इलाहाबाद
हाई
कोर्ट
के
उस
फैसले
को
रद्द
कर
दिया,
जिसमें
कहा
गया
था
कि
POCSO
के
हर
मामले
में
जमानत
से
पहले
पीड़िता
की
मेडिकल
उम्र
जांच
अनिवार्य
होगी।
अदालत
ने
कहा
कि
पीड़िता
की
सही
उम्र
ट्रायल
के
दौरान
तय
किया
जाना
चाहिए,
न
कि
जमानत
के
समय।
जमानत
की
सुनवाई
में
अदालत
सिर्फ
यह
देख
सकती
है
कि
उम्र
से
जुड़े
जो
दस्तावेज
(जैसे
जन्म
प्रमाण
पत्र,
स्कूल
रिकॉर्ड)
पेश
किए
गए
हैं,
वे
मौजूद
हैं
या
नहीं।
हालांकि,
सुप्रीम
कोर्ट
ने
यह
भी
साफ
किया
कि
इस
तकनीकी
गलती
के
बावजूद
आरोपी
को
जो
जमानत
दी
गई
थी,
उसे
रद्द
नहीं
किया
जाएगा।
यानी
आरोपी
की
जमानत
पहले
की
तरह
बनी
रहेगी।
‘प्रहरी
की
भूमिका
निभाएं
वकील’
सुप्रीम
कोर्ट
ने
इस
फैसले
में
वकीलों
की
भूमिका
पर
भी
अहम
टिप्पणी
की।
अदालत
ने
कहा
कि
अधिवक्ताओं
की
यह
नैतिक
जिम्मेदारी
है
कि
वे
बदले
की
भावना
से
दायर
मुकदमों
को
आगे
बढ़ाने
से
बचें
और
न्याय
प्रणाली
के
दुरुपयोग
के
खिलाफ
प्रहरी
की
तरह
काम
करें।
अदालत
ने
चेतावनी
दी
कि
यदि
POCSO
जैसे
कानूनों
का
दुरुपयोग
जारी
रहा,
तो
इससे
न्याय
प्रणाली
में
जनता
का
भरोसा
कमजोर
होगा।
सुप्रीम
कोर्ट
का
यह
फैसला
न
केवल
POCSO
कानून
की
व्याख्या
को
जोर
देता
है,
बल्कि
यह
भी
संकेत
करता
है
कि
नाबालिगों
के
प्रेम
संबंधों
को
अपराध
की
नजर
से
देखने
की
प्रवृत्ति
पर
अब
पुनर्विचार
जरूरी
है।
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