Somnath Temple: गुजरात के प्रसिद्ध और 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक भगवान शिव के सोमनाथ मंदिर पर एक से ज्यादा बार मुस्लिम आक्रांताओं का शिकार हुआ. मंदिर को लूटा-खसोटा गया और उसमें तोड़फोड़ भी की गई. आजादी मिलने के बाद इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया था. इसी सोमनाथ मंदिर को लेकर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का रवैया कई मायनों में विचित्र थे. भाजपा नेता और सांसद डॉक्टर सुधांशु त्रिवेदी ने नेहरू के इसी रुख को लेकर उनपर तीखा हमला बोला है. बीजेपी नेता ने सोमनाथ मंदिर को लेकर पंडित नेहरू की ओर से लिखे गए पत्रों का हवाला देते हुए कहा कि उनको भगवान सोमनाथ से सबसे अधिक नफरत थी.
सुधांशु त्रिवेदी ने X पर पोस्ट शेयर कर कहा, ‘अतीत में सोमनाथ को मोहम्मद गजनी और खिलजी ने लूटा, लेकिन आजाद भारत में भगवान सोमनाथ से सबसे अधिक नफरत पंडित नेहरू को थी. इसकी सबसे बड़ी बानगी देखिये कि पंडित नेहरू ने 21 अप्रैल 1951 को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को ‘प्रिय नवाबजादा’ कहकर संबोधित करते हुए पत्र लिखा और उसमें सोमनाथ के दरवाजों की कहानी को ‘पूरी तरह से झूठा’ बताया. पंडित नेहरू ने लियाकत अली खान के आगे एक तरह से सरेंडर करते हुए लिखा कि सोमनाथ मंदिर के निर्माण जैसा कुछ नहीं हो रहा.’ बीजेपी सांसद ने आगे लिखा, ‘आखिर पंडित नेहरू को लियाकत अली खान से ऐसा क्या डर था जो वे उसे सोमनाथ मंदिर के बारे में पत्र लिख रहे थे. पाकिस्तान के प्रोपेगेंडा का सामना करने या भारत की सभ्यतागत स्मृति का बचाव करने के बजाय पंडित नेहरू ने हिंदू ऐतिहासिक प्रतीकों को कम करके पाकिस्तान को खुश करना चुना और आंतरिक आत्मविश्वास के बजाय बाहरी तुष्टीकरण को प्राथमिकता दी.’
Somnath Temple: सुधांशु त्रिवेदी ने सोमनाथ मंदिर से जुड़े नेहरू के कुछ पत्र X पर पोस्ट किए हैं. (@SudhanshuTrived के X अकाउंट से साभार)
‘अंधी तुष्टिकरण की राजनीति’
भाजपा नेता ने नेहरू पर सोमनाथ मंदिर को लेकर करारा हमला बोला है. उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, ‘यह अंधी तुष्टिकरण की राजनीति और मुग़ल आक्रांताओं का महिमामंडन नहीं था तो और क्या था? पंडित जवाहरलाल नेहरू चाहते ही नहीं थे कि सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार हो. ये तो सब जानते हैं कि पंडित नेहरू ने न केवल कैबिनेट मंत्रियों बल्कि राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन तक को पत्र लिख कर सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की ज़रूरत पर सवाल उठाया था और उन्हें उद्घाटन समारोह में शामिल होने से मना किया. लेकिन ये भी सच है कि पंडित नेहरू ने सभी भारतीय मुख्यमंत्रियों को दो-दो बार पत्र लिख कर सोमनाथ मंदिर के निर्माण पर शिकायत करते हुए लिखा कि इससे विदेशों में भारत की छवि खराब हुई है.’
सुधांशु त्रिवेदी ने सोमनाथ मंदिर पर नेहरू के कुछ पत्र जारी किए हैं. (@SudhanshuTrived के X अकाउंट से साभार)
सोमनाथ मंदिर के अभिषेक समारोह का मामला
सुधांशु त्रिवेदी ने आगे लिखा, ‘इतना ही नहीं, पंडित नेहरू ने भारत के सूचना और प्रसारण मंत्री आरआर. दिवाकर को पत्र लिख कर सोमनाथ मंदिर के अभिषेक समारोह की कवरेज को कम करने के लिए कहा, इस समारोह को दिखावटी बताया और यहां तक कहा कि यह समारोह दुनिया में भारत की छवि को नुकसान पहुंचा रहा है. यह भी लिखा कि वह राष्ट्रपति के समारोह में शामिल होने से खुश नहीं हैं. आखिर क्यों?’ वे आगे लिखते हैं, ‘पंडित नेहरू ने भारतीय दूतावासों को पत्र लिख कर सोमनाथ ट्रस्ट को किसी भी तरह की सहायता देने से साफ मना किया, जिसमें अभिषेक समारोह के लिए नदी से पानी के अनुरोध भी शामिल थे. चीन में भारत के राजदूत के एम पनिक्कर को लिखे पत्र में पंडित नेहरू ने खुले तौर पर माना कि उन्होंने राष्ट्रपति के सोमनाथ मंदिर दौरे के असर को कम करने की कोशिश की थी, जिससे साफ पता चलता है कि उन्होंने सिर्फ न्यूट्रल रहने के बजाय मंदिर के उद्घाटन की अहमियत और चर्चा को कम करने के लिए जानबूझकर कोशिश की थी.’
पाकिस्तान में भारत के राजदूत को क्या लिखा?
सुधांशु त्रिवेदी ने बताया कि नेहरू ने उस समय पाकिस्तान के भारतीय राजदूत को भी पत्र लिखा था. भाजपा नेता ने लिखा, ‘पाकिस्तान में भारत के राजदूत को लिखे पत्र में पंडित नेहरू ने कहा कि सोमनाथ मंदिर में अभिषेक के लिए सिंधु नदी के पानी के इस्तेमाल को औपचारिक रूप से नामंजूर कर दिया, विदेश सचिव के ज़रिए यह बताया कि इस अनुरोध को उनकी मंज़ूरी नहीं है और आदेश दिया कि भविष्य में ऐसे किसी भी अनुरोध को पहले से मंज़ूर किया जाए, जिससे भारतीय सरकार खुद को इस समारोह से दूर रख सके और इसके प्रतीकात्मक महत्व को कम कर सके. सेक्रेटरी-जनरल और विदेश मंत्रालय के विदेश सचिव को भी पंडित नेहरू ने पत्र लिखा और निर्देश दिया कि दूतावासों को सोमनाथ ट्रस्ट से पवित्र नदी के पानी के लिए आने वाले अनुरोधों पर बिल्कुल भी ध्यान न देने का निर्देश दिया जाए, जो हिंदू धार्मिक गतिविधियों के प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियों से भी उनकी स्पष्ट बेचैनी को दर्शाता है. उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने पहले ही राष्ट्रपति और केएम मुंशी दोनों को अपनी नाराज़गी बता दी थी.’
तत्कालीन गृहमंत्री को दो-दो पत्र
सुधांशु त्रिवेदी के अनुसार, पंडित नेहरू ने तत्कालीन गृहमंत्री सी राजगोपालाचारी को दो-दो बार पत्र लिख कर सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन में राष्ट्रपति की भागीदारी का खुलकर विरोध किया और कहा कि उन्हें ‘पसंद होता’ अगर राष्ट्रपति इससे न जुड़ते, जो यह दिखाता है कि वे राष्ट्राध्यक्ष को एक बड़े हिंदू सभ्यतागत कार्यक्रम से दूर रखने की सक्रिय कोशिश कर रहे थे, जिसे वे राजनीतिक रूप से असुविधाजनक मानते थे.

