जब हम स्टेशन पर होते हैं, तो यात्रियों के बीच घुले मिले होते हैं. हम हमेशा वर्दी में नहीं होते, कई बार सादे कपड़ों में बिल्कुल आम पैसेंजर की तरह रहते हैं. हमारी नजर ऐसे बच्चों पर होती है, जो अकेले हों. इधर-उधर देख रहे हों. परेशान लग रहे हों. काफी देर से एक ही जगह पर बैठे हों, या इधर-उधर टहल रहे हों. तब हम बच्चे से पूछताछ करते हैं. पूछताछ की इस प्रक्रिया में कई बार, बच्चों के असली मां-बाप मिलते हैं और गुस्सा करने लगते हैं. हम उन्हें समझाते हैं और फिर कहते हैं, ये हमारा काम है.
दोपहर की धूप और ट्रेन की ‘अपर बर्थ’
ये 2004 की बात है. मुझे आज भी याद है दोपहर का वक्त था, स्टेशन पर ज्यादा भीड़ नहीं थी. एक ट्रेन आकर रुकी (शायद प्लेटफॉर्म 3 या 4 पर). ट्रेन लगभग खाली थी. मैं कोच के अंदर चेक करने गई. मैंने देखा कि ऊपर की बर्थ पर एक छोटी सी बच्ची सोई हुई थी. वो 5-6 साल की बच्ची थी. नॉर्मल फ्रॉक में थी. उसे देखकर समझ आ रहा था कि या तो किसी ने उसे डर से छोड़ दिया है. हमने उसे उठाया और ट्रेन से नीचे उतारा. वो कुछ भी बता पाने की स्थिति में नहीं थी. फिर हमने उसे बिस्किट खिलाए और फ्रूटी पिलाई. जब हमने उसे गले लगाया और प्यार दिया, तब वह थोड़ी नॉर्मल हुई. वह बच्ची इतनी छोटी थी कि अपने बारे में कुछ नहीं बता पाई. इसलिए हमने उसे चाइल्ड हेल्पलाइन के जरिए शेल्टर होम भेजा, जहां काउंसलर्स ने उससे बात की.
पहचान कैसे होती है कि बच्चा भागा है या इसकी तस्करी हो रही है? बच्चे अक्सर घबराए हुए होते हैं. कई बार वे झूठ बोलने के लिए ‘सिखाए’ गए होते हैं. जैसे कोई बच्ची कहेगी “मेरे पापा बाथरूम गए हैं.” ऐसे में हम वहीं रुक जाते हैं, थोड़ी दूर बैठकर इंतजार करते हैं. कुछ बच्चे तो तुरंत सच बता देते हैं, लेकिन कुछ बहुत घुमाते हैं. तब हमें थोड़ी ‘सख्ती’ करनी पड़ती है, जिससे सच सामने आ जाता है. हम आम यात्रियों को भी समझाते हैं कि अगर आपको कोई ऐसा बच्चा दिखे जो साथ वाले व्यक्ति से बिल्कुल अलग लग रहा हो या डरा-सहमा हो, तो तुरंत हमें बताएं.
पैसे के लिए परिवार ने बेच दिया
2025 की शुरुआत का एक केस है. गरीब परिवार का एक बच्चा था और बहुत शरीफ सा. वो करीब 13-14 साल का रहा होगा. उसके पिता को टीबी था. पैर पर प्लास्टर था, चारपाई पर पड़े थे. घर में सिर्फ दादी थी. पहले उसने मुंबई में काम किया, बर्तन धोता था. फिर ये दूसरी जगह के लिए निकल रहा था, तब उसे पकड़ा गया. उसके घर की स्थिति खराब थी लेकिन जब उसे समझाया गया, तो बोला मैं पढ़ना चाहता हूं. तो हमने रिकमंडेशन दिया कि इसे पढ़वाएं.
|| एक बार एक मां-बाप मिलने आए, उन्होंने कहा थैंक यू आपने मेरा बच्चा बचा लिया. स्टेशन पर कई बार कुछ माता-पिता आते हैं. कुछ गांव के लोग तो खुश होकर 100-50 रुपए भी खुशी से दे जाते हैं. फिर हम उन्हें कहते हैं कि ये पैसे के लिए नहीं कर रहे, ये हमारा काम है. ||
जब ‘जगत चाचा और मामा और बाबा’ पकड़े जाते हैं
तस्करी करने वाले लोग अक्सर ‘सगे’ बनने का नाटक करते हैं. कोई खुद को चाचा बताता है, तो कोई मामा. बच्चा भी डर के मारे कह देता है “हां, ये मेरे मामा हैं.” ऐसे में दोनों को अलग-अलग ले जाकर पूछताछ करते हैं. जैसे “पिताजी का नाम क्या है?” या “घर के पास कौन सा मंदिर है?” जब जवाब अलग-अलग आते हैं, तो पोल खुल जाती है. ये तस्कर अक्सर 35 साल से ऊपर के होते हैं और बच्चों को घरेलू काम या फैक्ट्रियों में मजदूरी के लिए ले जाते हैं. कई बार देह व्यापार और मानव अंगों की तस्करी भी होती है.
बनारस का वो केस और मासूमों का भविष्य “नवंबर 2025 में हमने बनारस में एक गिरोह को पकड़ा था. तीन ट्रैफिकर्स थे, जिनमें एक महिला भी शामिल थी. वे करीब 28 बच्चों को ले जा रहे थे, जिनमें छोटी बच्चियां भी थीं. एक बच्ची तो मुश्किल से 8 साल की रही होगी. डर हमेशा यही रहता है कि अगर ये बच्चे समय पर न रोके जाएं, तो आगे चलकर इन्हें ऑर्गन ट्रैफिकिंग या देह व्यापार जैसी अंधेरी गलियों में धकेल दिया जा सकता है. तस्करों को हम अरेस्ट करवाकर जेल भेजते हैं, लेकिन हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता बच्चों की घर वापसी होती है. अगर किसी बच्चे के घर का सुराग नहीं मिलता, तो उसे शेल्टर होम में रखकर उसकी पढ़ाई-लिखाई का इंतजाम किया जाता है.”
कई दिन चला धमकियों की सिलसिला
2024 का एक वाक्या है, जिसे मैं कभी नहीं भूल सकती. हमने एक तस्कर को पकड़ा था, जिसका कनेक्शन एक राजनीतिक दल से निकला. मेरे पास धड़ाधड़ फोन आने लगे. एक बड़े नेता का भी फोन आया, वे बोले ‘आपने ही उसे पकड़ा है? क्यों पकड़ा है? क्या सबूत है? उस रात कानूनी कार्यवाही चल ही रही थी कि उनके वकील भी पहुंच गए. उस वक्त तमाम जगहों से पूछताछ हो रही थी, फोन बज रहे थे. एक महिला अधिकारी होने के नाते मेरे लिए बहुत मुश्किल पल था क्योंकि उसके कई दिन बात तक अनजान नंबरों से मुझे कॉल और मैसेज आते रहे.
लड़कियां कई बार घर वापस नहीं जाना चाहतीं
क्या बच्चे वापस नहीं जाना चाहते? हां, अक्सर लड़कियों के मामले में ऐसा होता है. वे घर जाने से इनकार कर देती हैं. इस उम्र में उन्हें सोशल मीडिया की दुनिया और इंटरनेट की दोस्ती बहुत फिल्मी और अच्छी लगती है, जबकि मम्मी-पापा की बातें जहर लगती हैं. वे अक्सर कहती हैं- ‘मम्मी डांटती हैं, मुझे तो उसी लड़के के साथ जाना है.’ इंटरनेट के जरिए दोस्ती कर घर छोड़ देने वाली इन बच्चियों को समझाना और उनकी काउंसलिंग करना हमारे लिए सबसे मुश्किल काम होता है.
मां-बाप कैसे पहचानें बच्चा क्या करने वाला है?
मैं खुद एक मां हूं, इसलिए समझती हूं कि बच्चों को पालना आज के दौर में कितना मुश्किल है. मेरी सलाह सिर्फ इतनी है कि बच्चों पर सिर्फ पाबंदियां न थोपें, उनके दोस्त बनें. खासकर वे इंटरनेट पर किससे बात कर रहे हैं और कितनी देर बात कर रहे हैं, इस पर नजर रखें. उनसे बहस न करें, बल्कि प्यार से उनकी गतिविधियों को समझें. बच्चों को लगना चाहिए कि घर सबसे सुरक्षित जगह है, वर्ना कब उन्हें बाहर की दुनिया खूबसूरत लगने लगती है, हमें पता नहीं चलता.
जिंदगी की ये सारी असल कहानियां RPF इंस्पेक्टर चंदना सिन्हा ने हमें बताई हैं. चंदना सिन्हा पिछले 3 साल में 1500 से ज्यादा बच्चों को बचा चुकी हैं. जिनमें से कुछ घर से भागे बच्चे थे, कुछ की मानव तस्करी हो रही थी. उनकी इस मेहनत के लिए भारतीय रेलवे ने उन्हें 9 जनवरी, 2026 को रेलवे के सबसे बड़े पुरस्कार, अति विशिष्ट रेल सेवा पुरस्कार2026 से नवाजा है.
3 साल: 1,500+ बच्चों का रेस्क्यू
2024: अकेले एक साल में 494 बच्चे बचाए
जुलाई 2024: एक साथ 26 बच्चों को तस्करी से बचाया
9 जनवरी 2026: दिल्ली में रेल मंत्री ने सर्वोच्च सम्मान से नवाजा

