Reservation Hatao Andolan: NEET-UG 2026 की बहस के बीच एक नाम अचानक सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ-हर्ष दुबे. खुद को NEET अभ्यर्थी बताने वाले हर्ष के वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहे हैं. वह आरक्षण और अलग-अलग राज्यों के कट-ऑफ और मेडिकल एडमिशन सिस्टम पर खुलकर बोल रहे हैं. उनके भाषण के बाद सोशल मीडिया पर ‘Reservation Hatao Andolan (RHA)’ अभियान को भी काफी चर्चा मिली. हर्ष का दावा है कि वह कई बार मेडिकल कॉलेज की कट-ऑफ के बेहद करीब पहुंचकर भी सीट नहीं पा सके और इसी अनुभव ने उन्हें आरक्षण व्यवस्था और काउंसलिंग सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया.
कौन हैं हर्ष दुबे?
हर्ष दुबे NEET परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्र हैं. उन्होंने न्यूज 18 की टीवी डिबेट में बताया कि वे कई बार NEET परीक्षा दे चुके हैं और हर बार मेडिकल कॉलेज की कट-ऑफ के बेहद करीब पहुंचकर रह गए. उनके मुताबिक उन्होंने चार बार ऐसी स्थिति देखी जब कुछ अंकों के अंतर से उनका MBBS में दाखिला नहीं हो सका.डिबेट के दौरान उन्होंने आरक्षण, अलग-अलग राज्यों में कट-ऑफ के अंतर और मेडिकल एडमिशन सिस्टम पर कई सवाल उठाए. उनका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ और इसके बाद उन्हें लेकर देशभर में बहस शुरू हो गई.
सोशल मीडिया पर’Reservation Hatao Andolan’
इधर सोशल मीडिया पर Reservation Hatao Andolan (RHA)नाम से एक अभियान भी चल रहा है.इस प्लेटफॉर्म पर लाखों लोग जुड़े होने का दावा किया जाता है.इस अभियान का संदेश है-
Educate, Agitate, Organize और इसका प्रमुख नारा है-सारी जाति एक समान, मेरा बस ये देश महान.इस अभियान के जरिए आरक्षण व्यवस्था में बदलाव या समीक्षा की मांग उठाई जा रही है.
आरक्षण की वजह से मेरा NEET में नहीं हो पाया
हर्ष दुबे का सबसे बड़ा दावा यही है कि मेडिकल कॉलेज में दाखिला न मिलने की सबसे बड़ी वजह आरक्षण और अलग-अलग श्रेणियों की कट-ऑफ है. उनका कहना है कि उन्होंने मेहनत की.अच्छे अंक भी हासिल किए लेकिन सामान्य वर्ग की ऊंची कट-ऑफ के कारण उन्हें सीट नहीं मिली.उन्होंने कहा कि वह हर बार बाउंड्री पर जाकर रह जाते हैं यानी मेडिकल कॉलेज की सीट से कुछ ही अंक दूर रह जाते हैं.
सरकार छात्रों से बात करे,नेताओं से नहीं
आरक्षण पर चर्चा क्यों नहीं होती?
हर्ष दुबे का सबसे बड़ा सवाल आरक्षण व्यवस्था को लेकर था.उन्होंने कहा कि सार्वजनिक बहस में पेपर लीक, इस्तीफा और राजनीति पर चर्चा होती है लेकिन आरक्षण की वजह से अलग-अलग वर्गों और राज्यों में बनने वाले कट-ऑफ के अंतर पर कोई बात नहीं करता.उनका कहना था कि यदि देश में एक ही राष्ट्रीय परीक्षा होती है तो फिर मेडिकल एडमिशन के लिए राज्यों के अनुसार कट-ऑफ में इतना अंतर क्यों है?
अलग-अलग राज्यों की कट-ऑफ का मुद्दा
डिबेट के दौरान हर्ष ने दावा किया कि अलग-अलग राज्यों में समान मेडिकल कॉलेजों के लिए अलग-अलग अंकों पर प्रवेश मिल जाता है.उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कहीं 570 अंक पर सीट मिलती है तो कहीं 560 या उससे भी कम अंकों पर दाखिला हो जाता है.इसी आधार पर उन्होंने सवाल उठाया कि यदि परीक्षा पूरे देश के लिए एक है तो काउंसलिंग और सीट आवंटन की व्यवस्था भी अधिक समान क्यों नहीं हो सकती.उन्होंने सुझाव दिया कि एक राष्ट्रीय परीक्षा के बाद अधिक समान और पारदर्शी काउंसलिंग व्यवस्था पर विचार होना चाहिए.
इस्तीफे से छात्रों की समस्या हल नहीं होगी
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर भी हर्ष ने अपनी राय रखी.उन्होंने कहा कि किसी मंत्री के इस्तीफा देने भर से उन छात्रों को मेडिकल कॉलेज की सीट नहीं मिल जाएगी जो वर्षों से तैयारी कर रहे हैं.उनके मुताबिक असली जरूरत परीक्षा और एडमिशन सिस्टम में सुधार की है केवल राजनीतिक कार्रवाई से छात्रों की समस्या खत्म नहीं होगी.
2024 के NEET पेपर लीक आंदोलन का भी किया जिक्र
हर्ष ने बताया कि वर्ष 2024 में जब NEET पेपर लीक का मामला सामने आया था तब वह धरना-प्रदर्शन में भी शामिल हुए थे.उनका दावा है कि उस समय कई छात्र राजनीतिक दलों से मिले, लेकिन बाद में उन्हें कोई ठोस समाधान नहीं मिला.उन्होंने यह भी कहा कि कई आंदोलनों में वास्तविक NEET अभ्यर्थियों की संख्या बहुत कम थी और वहां ऐसे लोग भी मौजूद थे जिन्हें मेडिकल प्रवेश प्रक्रिया की पूरी जानकारी नहीं थी.
NEET साल में सिर्फ एक बार होता है
हर्ष ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा की कठिनाई का भी जिक्र किया.उनके मुताबिक NEET साल में केवल एक बार आयोजित होती है.छात्र पूरे साल तैयारी करते हैं, लेकिन परीक्षा वाले दिन यदि किसी कारण से प्रदर्शन खराब हो जाए, बिजली चली जाए, स्वास्थ्य संबंधी समस्या आ जाए या कोई अन्य दिक्कत हो जाए तो पूरा साल प्रभावित हो जाता है.उन्होंने कहा कि एक दिन की गलती कई छात्रों का पूरा करियर बदल देती है.
आर्थिक असमानता का भी उठाया मुद्दा
डिबेट में हर्ष ने आर्थिक स्थिति का भी जिक्र किया.उन्होंने कहा कि कई छात्र साधारण परिवारों से आते हैं जबकि कुछ छात्र आर्थिक रूप से बेहद मजबूत होते हैं.उनके मुताबिक मेहनत और अंकों के बावजूद यदि सामान्य वर्ग का आर्थिक रूप से कमजोर छात्र सीट से वंचित रह जाता है तो उसकी निराशा स्वाभाविक है.इसी दौरान उन्होंने यह भी कहा कि केवल जाति के आधार पर किसी की आर्थिक स्थिति का आकलन नहीं किया जाना चाहिए और आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के छात्रों की समस्याओं पर भी गंभीर चर्चा होनी चाहिए.
सोशल मीडिया पर शुरू हुई नई बहस
हर्ष दुबे के बयान के बाद सोशल मीडिया पर दो तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं.एक वर्ग ने उनके अनुभवों और सामान्य वर्ग के छात्रों की चुनौतियों का समर्थन किया वहीं दूसरे वर्ग ने कहा कि आरक्षण सामाजिक न्याय और ऐतिहासिक असमानताओं को दूर करने का संवैधानिक माध्यम है और इसे केवल कट-ऑफ के नजरिए से नहीं देखा जा सकता.यही वजह है कि हर्ष दुबे का वीडियो अब केवल एक छात्र की कहानी नहीं रह गया है बल्कि NEET, मेडिकल एडमिशन, आरक्षण नीति और काउंसलिंग सिस्टम पर राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन चुका है.

