उत्पल कुमार
नई दिल्ली: देश में कुछ ही सार्वजनिक बुद्धिजीवी हैं जो शशि थरूर की तरह विचारधाराओं से परे जाकर बहस छेड़ने की क्षमता रखते हैं. उनके लेख अक्सर गंभीर विमर्श को जन्म देते हैं और पाठकों को सोचने पर मजबूर करते हैं. लेकिन हाल ही में पाकिस्तान पर लिखा गया उनका लेख कई स्तरों पर निराशाजनक लगता है. समस्या भाषा या प्रस्तुति में नहीं, बल्कि उस आधार में है जिस पर उनका विश्लेषण खड़ा नजर आता है. लेख में कई ऐसे अनुमान हैं जो वास्तविकताओं से अलग प्रतीत होते हैं.
2016 के बाद बदली भारत की रणनीति
2016 तक भारत ने कई बार धोखा खाने के बावजूद संवाद की नीति अपनाई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने कार्यकाल के शुरुआती वर्षों में यही नीति जारी रखी. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को शपथ ग्रहण में आमंत्रित करने से लेकर लाहौर की अचानक यात्रा तक कई पहल हुईं. लेकिन जनवरी 2016 के पठानकोट हमले ने इस नीति की सीमाओं को उजागर कर दिया. इसके बाद भारत ने बिना शर्त संवाद की रणनीति से दूरी बनानी शुरू की.
थरूर का तर्क है कि ‘कोई संवाद नहीं’ स्थायी समाधान नहीं हो सकता और चुप्पी तनाव को बढ़ा सकती है. सैद्धांतिक रूप से यह विचार सही लगता है. सामान्य परिस्थितियों में देशों के बीच संवाद स्थिरता ला सकता है. लेकिन पाकिस्तान के साथ संबंधों का स्वरूप पारंपरिक कूटनीतिक ढांचे से अलग रहा है. भारत के लिए चुनौती केवल संवाद की कमी नहीं, बल्कि उस संरचनात्मक विरोध से भी है जो पाकिस्तान की नीति का हिस्सा माना जाता रहा है.
ऐतिहासिक अनुभव और भरोसे की चुनौती
भारत और पाकिस्तान के बीच विश्वास की कमी का इतिहास लंबा है. 2001 संसद हमला, 2008 मुंबई हमला और 2016 पठानकोट हमला ऐसे समय में हुए जब दोनों देशों के बीच संवाद जारी था. इन घटनाओं ने इस धारणा को मजबूत किया कि केवल कूटनीतिक बातचीत आतंकवाद की चुनौती को कम नहीं कर सकी. कई विश्लेषकों का मानना है कि इससे सुरक्षा दृष्टिकोण को प्राथमिकता देने की सोच मजबूत हुई.
मानवीय संबंधों का तर्क और उसकी सीमाएं
थरूर अपने लेख में सीमा पार मानवीय संबंधों को दीर्घकालिक समाधान बताते हैं. यह विचार आकर्षक और आदर्शवादी प्रतीत होता है. भारत ने भी लंबे समय तक पाकिस्तान के नागरिक समाज और उदारवादी वर्ग के साथ संवाद बढ़ाने की कोशिश की. हालांकि, इस नीति से अपेक्षित रणनीतिक बदलाव नहीं दिखा. कई मामलों में यह प्रयास प्रतीकात्मक स्तर से आगे नहीं बढ़ सका.
इतिहास से मिलने वाले सबक
1972 के शिमला समझौते को अक्सर भारत-पाक संबंधों का महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है. उस दौर में भरोसे और कूटनीतिक समझदारी के मिश्रण से समाधान तलाशने की कोशिश हुई. लेकिन कई इतिहासकार मानते हैं कि इसके परिणाम अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहे. बाद के वर्षों में कश्मीर सहित कई मुद्दों पर तनाव जारी रहा. इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या भावनात्मक या नैतिक अपील रणनीतिक वास्तविकताओं को बदल सकती है.
कूटनीति में संतुलन की जरूरत
भारत-पाक संबंधों का इतिहास बताता है कि संवाद और सख्ती दोनों ही रणनीतियों का उपयोग अलग-अलग समय पर किया गया है. यह बहस आज भी जारी है कि स्थायी समाधान किस रास्ते से संभव है. कुछ विशेषज्ञ संवाद को जरूरी मानते हैं, जबकि अन्य सुरक्षा-केंद्रित दृष्टिकोण को प्राथमिकता देते हैं. संभवतः वास्तविक समाधान इन दोनों के बीच संतुलन बनाने में निहित है. भारत के लिए चुनौती यही है कि वह शांति की संभावनाओं को बनाए रखते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता न करे.

