Open Prison: दिल्ली हाईकोर्ट के एक फैसले के बाद भारत में खुली जेलें (ओपन प्रिजन) चर्चा के केंद्र में हैं. दिल्ली हाईकोर्ट ने महानिदेशक (जेल) को निर्देश दिया है कि वे खुली जेल के कैदियों के लिए मोबाइल फोन के उपयोग पर एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर (SOP) तैयार कर आठ हफ्तों में लागू करें. जस्टिस संजीव नरुला ने कहा कि यह SOP या तो कैदियों को नियमानुसार मोबाइल रखने की अनुमति दे या फिर एक सुरक्षित प्रणाली बनाए, जिसमें वे जेल परिसर में प्रवेश के समय मोबाइल जमा कर सकें और बाहर निकलते समय वापस ले सकें. यह आदेश एक आजीवन कारावास भुगत रहे कैदी की याचिका पर आया, जिसने अपने खिलाफ 2020 में दी गई सजा और खुली जेल से बंद जेल में स्थानांतरण को चुनौती दी थी. निरीक्षण के दौरान उसके पास मोबाइल फोन, दो सिम और दो चार्जर मिले थे. जिसके बाद उसकी जेल सुविधाएं निलंबित कर दी गईं और उसे बंद जेल भेज दिया गया.
किनको रखा जाता है खुली जेल में
खुली जेलों में आमतौर पर ऐसे कैदी रखे जाते हैं जिन्हें कम जोखिम वाला माना जाता है. या वो कैदी जिन्होंने अच्छा व्यवहार दिखाया है. कैदियों को जेल की चारदीवारी के बाहर घूमने-फिरने और काम या शैक्षिक कार्यक्रमों में भाग लेने की अधिक आजादी होती है. कैदी अक्सर विभिन्न व्यावसायिक प्रशिक्षण, शैक्षिक कार्यक्रमों या आवंटित किए गए काम में भाग लेते हैं. जो उन्हें रिहाई के बाद जीवन के लिए कौशल विकसित करने में मदद करते हैं. पश्चिम बंगाल में जेल और पुलिस अधिकारियों की एक समिति होती है जो खुली जेल में स्थानांतरित किए जाने के योग्य कैदियों का चयन करती है. यह समिति उनके व्यक्तिगत साक्षात्कार और पिछले अनुभव की जांच के बाद उनके स्थानांतरण को मंजूरी देती है. इसी प्रकार राजस्थान में खुली जेल में स्थानांतरित किए जाने के योग्य कैदियों को अपनी सजा का एक तिहाई हिस्सा पूरा करना होता है.
कैसी होती हैं खुली जेल?
खुली जेल एक प्रकार की सुधारात्मक सुविधा है, जहां कैदियों को पारंपरिक जेलों की तुलना में अधिक आजादी दी जाती है. इन जेलों में सुविधाएं कठोर कारावास के बजाय कैदियों के पुनर्वास पर केंद्रित होती हैं. इन जेलों में आम जेलों की तुलना में सुरक्षा उपाय कम कड़े होते हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार कई खुली जेलें कैदियों को अपने परिवार के साथ रहने और अपनी आजीविका कमाने की भी अनुमति देती हैं. पश्चिम बंगाल की खुली जेलों में कैदियों को घूमने-फिरने की पूरी आजादी होती है, क्योंकि रोजाना लॉक-अप की कोई व्यवस्था नहीं होती है. यह सुविधा हर खुली जेल में उपलब्ध नहीं होती, लेकिन राजस्थान और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों की कुछ जेलों में यह व्यवस्था है.
जहां चाहें जा सकते हैं कैदी
खुली जेल के दरवाजे सुबह छह बजे खुलते हैं और रात आठ बजे बंद होते हैं. इस बीच कैदी जहां चाहें जा सकते हैं. हालांकि उन्हें रात आठ बजे तक जेल वापस लौटना होता है. खुली जेलों में रहने वाले कैदियों को जेल के 20 किलोमीटर के दायरे में रोजगार ढूंढ़ने का निर्देश दिया जाता है ताकि वे हर रात जेल लौट सकें. इसके अलावा उन्हें छह महीने के बाद 20 दिनों की पैरोल भी दी जाती है. यह पैरोल नियम अलग-अलग राज्यों में थोड़ा अलग हो सकता है, लेकिन 6 महीने के बाद पैरोल की पात्रता सामान्य बात है. खुले सुधार गृहों में शिफ्ट होने के बाद उन्हें अगले तीन महीने तक खुली जेलों में ही खाना दिया जाता है और उसके बाद कैदियों को अपने खाने का इंतजाम खुद करना होता है.
खुली जेल की खास बातें
1. पारंपरिक जेलों के विपरीत खुली जेलें कैदियों को ज्यादा आजादी प्रदान करती हैं. उन्हें अक्सर काम, शिक्षा या परिवार से मिलने के लिए जेल परिसर से बाहर जाने की अनुमति होती है. इस नजरिये का उद्देश्य कैदियों को समाज में पुनः शामिल करने के लिए तैयार करना है.
2. खुली जेलों में बंद कैदियों को आमतौर पर जेल के बाहर आस-पास के उद्योगों, खेतों या अन्य संस्थानों में काम करने के अवसर दिए जाते हैं. इससे उन्हें कौशल विकसित करने और अनुभव प्राप्त करने में मदद मिलती है, जो रिहाई के बाद उनके जीवन के लिए फायदेमंद हो सकता है.
3. खुली जेलें परिवार के सदस्यों के साथ ज्यादा, लगातार और लंबे समय तक संपर्क की सुविधा प्रदान करती हैं. कैदियों को सप्ताहांत या छुट्टियां अपने परिवार के साथ बिताने की अनुमति दी जा सकती है. जिससे उनके रिश्ते बेहतर होते हैं और उनकी भावनात्मक भलाई को बढ़ावा मिलता है.
4. खुली जेलों में सजा के बजाय पुनर्वास पर जोर दिया जाता है. यहां का माहौल कम प्रतिबंधात्मक होता है और इसका उद्देश्य कैदियों को सामान्यता और जिम्मेदारी का अहसास दिलाकर उनमें सुधार लाना होता है.
5. सभी कैदी खुली जेलों के लिए योग्य नहीं होते हैं. आमतौर पर पात्रता अपराध की प्रकृति, कारावास के दौरान व्यवहार और पुनर्वास की संभावना पर आधारित होती है. कम गंभीर अपराध और अच्छे आचरण वाले कैदियों पर विचार किए जाने की संभावना अधिक होती है.
6. हालांकि माहौल ज्यादा सुकून भरा होता है, फिर भी खुली जेलों में सुरक्षा उपाय मौजूद होते हैं. इनमें निगरानी व्यवस्था, नियमित जांच और कैदियों की आवाजाही पर प्रतिबंध शामिल हो सकते हैं.
देश में खुली जेलों का इतिहास
भारत में खुली जेलों के इतिहास की बात करें तो पहली खुली जेल 1905 में बॉम्बे प्रेसीडेंसी के अंतर्गत शुरू हुई थी. हालांकि यह खुली जेल 1910 में बंद कर दी गई थी. इसके अलावा महिलाओं के लिए पहली खुली जेल 2010 में पुणे के यरवदा में बनाई गई थी. वहीं दक्षिण भारत में पहली खुली जेल 2012 में केरल के पूजापुरा में बनाई गई थी. देश की पहली आधुनिक खुली जेल की शुरुआत उत्तराखंड के सितारगंज में 1953 में हुई थी. इसे अक्सर भारत में खुली जेलों के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है, क्योंकि इसने पुनर्वास के उद्देश्य से काम करना शुरू किया. दिल्ली में, मुख्य रूप से तिहाड़ जेल परिसर के भीतर खुली और अर्ध-खुली (Semi-Open) जेलों की सुविधा मौजूद है. हरियाणा में भी कैदियों के पुनर्वास के लिए ओपन जेल या सेमी-ओपन जेल की सुविधा है. उदाहरण के लिए अंबाला की जेलों में कैदियों को खेती जैसे काम करने की अनुमति दी गई है, जो खुली जेल की अवधारणा को दर्शाता है. राजस्थान को खुली जेलों के मामले में अग्रणी राज्य माना जाता है, जहां सबसे अधिक संख्या में (लगभग 29) खुली जेलें हैं. इस समय भारत में 60 से अधिक खुली जेलें हैं.

