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Supreme Court On Reservation: देश के पिछड़े वर्ग को मुख्य धारा में लाने के लिए नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में दाखिले के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है. इसके आधार पर आजादी के बाद से अभी तक हजारों-लाखों लोग लाभान्वित हुए हैं. अब इसी रिजर्वेशन पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है.
नौकरियों में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है. (फाइल फोटो/PTI)Supreme Court On Reservation: सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण नीति और प्रतियोगी परीक्षाओं में मिलने वाली छूट को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है. शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि जो आरक्षित श्रेणी का उम्मीदवार प्रारंभिक परीक्षा (प्रीलिम्स) में छूट या रियायत का लाभ उठाता है, वह केवल फाइनल मेरिट में बेहतर रैंक हासिल करने के आधार पर अनारक्षित (जनरल) सीट का दावा नहीं कर सकता. यह फैसला मंगलवार 6 जनवरी 2025 को इंडियन फॉरेस्ट सर्विस (IFS) परीक्षा से जुड़े एक पुराने विवाद पर सुनाया गया है. जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका को स्वीकार करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया. हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति (SC) वर्ग के एक उम्मीदवार को अनारक्षित श्रेणी में नियुक्ति की अनुमति दी थी, क्योंकि उसने अंतिम मेरिट सूची में सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार से बेहतर रैंक हासिल की थी. सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि यदि किसी उम्मीदवार ने चयन प्रक्रिया के किसी भी चरण में छूट का लाभ लिया है, तो वह अनारक्षित रिक्तियों (अनरिजर्व कैटेगरी) के लिए पात्र नहीं माना जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट के इस लैंडमार्क जजमेंट का दूरगामी असर पड़ेगा. भविष्य में इससे हजारों-लाखों की तादाद में कैंडिडेट के प्रभावित होने की संभावना है. जानकारी के अनुसार, यह मामला वर्ष 2013 की IFS (भारतीय वन सेवा) परीक्षा से जुड़ा है, जो दो चरणों में आयोजित की गई थी. प्रारंभिक परीक्षा और मुख्य परीक्षा, जिसमें साक्षात्कार भी शामिल था. उस वर्ष प्रारंभिक परीक्षा में सामान्य श्रेणी के लिए कट-ऑफ 267 अंक था, जबकि अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए छूट के साथ कट-ऑफ 233 अंक तय किया गया था. SC श्रेणी के उम्मीदवार जी. किरण ने 247.18 अंकों के साथ छूट वाले कट-ऑफ के आधार पर प्रीलिम्स पास किया, जबकि सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार एंटनी एस. मारियप्पा ने 270.68 अंकों के साथ सामान्य कट-ऑफ पर क्वालीफाई किया.
कहां अटका मामला, क्या आया सुप्रीम फैसला?
हालांकि, अंतिम मेरिट सूची में किरण की रैंक 19 रही, जबकि एंटनी की रैंक 37 थी. कैडर आवंटन के समय कर्नाटक में केवल एक सामान्य इनसाइडर रिक्ति यानी वैकेंसी उपलब्ध थी और SC इनसाइडर की कोई सीट नहीं थी. ऐसे में यूनियन ऑफ इंडिया ने सामान्य इनसाइडर पद एंटनी को दिया और किरण को तमिलनाडु कैडर आवंटित किया. इससे असंतुष्ट होकर किरण ने पहले केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) और फिर कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां उसके पक्ष में फैसला आया. सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों फैसलों को पलटते हुए कहा कि IFS परीक्षा एक एकीकृत चयन प्रक्रिया है, जिसमें प्रारंभिक परीक्षा पास करना मुख्य परीक्षा में बैठने की अनिवार्य शर्त है. इसलिए प्रीलिम्स में ली गई किसी भी छूट को बाद के चरणों में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने IFS परीक्षा नियम, 2013 के नियम 14(ii) की व्याख्या करते हुए कहा कि केवल वही आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार अनारक्षित रिक्तियों के लिए पात्र हो सकते हैं, जिन्होंने परीक्षा के किसी भी चरण में किसी भी प्रकार की छूट या रियायत का सहारा न लिया हो.
साजिब रॉय मामले का हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम साजिब रॉय (2025) मामले का हवाला देते हुए कहा कि उम्र, कट-ऑफ या किसी अन्य मानदंड में ली गई छूट भी उम्मीदवार को अनारक्षित सीट के दावे से बाहर कर देती है, जब तक कि नियम स्पष्ट रूप से इसकी अनुमति न दे. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मुख्य परीक्षा या साक्षात्कार में बेहतर प्रदर्शन के आधार पर कोई उम्मीदवार यह दावा नहीं कर सकता कि उसे सामान्य मानक पर चुना गया है, यदि उसने पहले किसी भी चरण में छूट ली हो. यह फैसला न केवल IFS बल्कि अन्य केंद्रीय सेवाओं की परीक्षाओं में आरक्षण और छूट से जुड़े नियमों की व्याख्या के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इससे भविष्य में कैडर आवंटन और नियुक्तियों से जुड़े विवादों में स्पष्ट दिशा मिलने की उम्मीद है.
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बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से प्रारंभिक के साथ उच्च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु…और पढ़ें

