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Meenakshi Natarajan Case: मध्यप्रदेश की कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है. कोर्ट ने राज्यसभा नामांकन खारिज किए जाने के खिलाफ दायर उनकी याचिका खारिज कर दी. सुनवाई के दौरान अभिषेक मनु सिंघवी ने रिटर्निंग ऑफिसर की कार्रवाई को मनमाना बताते हुए चुनावी निष्पक्षता और समान अवसर पर सवाल उठाए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में सीधे संवैधानिक अदालतें हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं.
अभिषेक मनु सिंघवी ने कोर्ट में चुनावी निष्पक्षता और नामांकन रद्द करने पर तीखी दलीलें दीं. (फाइल फोटो)
नई दिल्ली: मध्यप्रदेश से कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है. शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी और साफ कहा कि ऐसे मामलों में सीधे आर्टिकल 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट या आर्टिकल 226 के तहत हाई कोर्ट हस्तक्षेप नहीं कर सकते. कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद कांग्रेस खेमे में निराशा साफ दिखाई दी. लेकिन सुनवाई के दौरान अदालत में जो बहस हुई, उसने इस पूरे विवाद को और ज्यादा राजनीतिक और संवैधानिक बना दिया. वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने रिटर्निंग ऑफिसर की कार्रवाई को ‘मनमाना’ बताते हुए अदालत के सामने कई तीखे सवाल खड़े किए. उनका कहना था कि अगर बिना तय कानूनी प्रक्रिया के किसी उम्मीदवार का नामांकन खारिज होने लगे, तो चुनावों में ‘लेवल प्लेइंग फील्ड’ खत्म हो जाएगी. यही दलील सुनवाई के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा में रही.
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद न्यायिक हस्तक्षेप सीमित हो जाता है. जस्टिस ए.एस. चंदूरकर और जस्टिस प्रशांत मिश्रा की पीठ ने कहा कि चुनावी विवादों के समाधान के लिए कानून में अलग प्रक्रिया मौजूद है. दूसरी तरफ अभिषेक मनु सिंघवी लगातार यह साबित करने की कोशिश करते रहे कि मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ जिस निजी शिकायत का हवाला देकर नामांकन खारिज किया गया, उसमें अभी तक अदालत ने संज्ञान तक नहीं लिया था. सिंघवी ने कहा कि सिर्फ नोटिस या समन जारी होना पर्याप्त नहीं माना जा सकता. उन्होंने दलील दी कि Representation of the People Act की धारा 33A तभी लागू होती है जब किसी सक्षम अदालत द्वारा आरोप तय किए जा चुके हों.
कोर्ट में सिंघवी ने उठाए दो बड़े सवाल
- सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अभिषेक मनु सिंघवी ने सबसे पहले यह सवाल उठाया कि जब मामले में अभी तक अदालत ने संज्ञान ही नहीं लिया, तो फिर नामांकन खारिज करने का आधार कैसे बन गया. उन्होंने कहा कि BNSS की धारा 223 के तहत संभावित आरोपी को सुनवाई का मौका देना जरूरी है. दूसरा बड़ा सवाल उन्होंने चुनावी निष्पक्षता को लेकर उठाया. सिंघवी ने अदालत से कहा कि यदि इस तरह किसी उम्मीदवार को चुनाव लड़ने से रोका जाएगा तो लोकतांत्रिक चुनावों का समान अवसर वाला सिद्धांत कमजोर हो जाएगा.
- सुनवाई के दौरान जस्टिस प्रशांत मिश्रा ने सिंघवी से पूछा कि क्या कोई ऐसा उदाहरण है जहां रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा नामांकन खारिज किए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सीधे हस्तक्षेप कर नामांकन बहाल किया हो. अदालत ने पूर्व न्यायिक मिसाल का हवाला मांगा. इस पर सिंघवी ने इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण मामले और एमएस गिल केस का जिक्र करते हुए कहा कि चुनावों में समान अवसर संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है. उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि 9 जून को आदेश आया, 10 जून को चुनाव आयोग पहुंचे और 11 जून को सुप्रीम कोर्ट में मामला उल्लेखित किया गया, लेकिन इसके बावजूद चुनाव परिणाम घोषित कर दिए गए.
- सिंघवी ने अदालत के सामने यह भी दलील रखी कि धारा 33A केवल डिस्क्लोजर से जुड़ा प्रावधान है. इसका मतलब यह नहीं कि किसी व्यक्ति के खिलाफ सिर्फ शिकायत दर्ज होने पर उसे चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है. उन्होंने कहा कि कानून में ‘Charges Framed’ यानी आरोप तय होना बेहद जरूरी शर्त है. उनके मुताबिक निजी शिकायत और संज्ञान से पहले की प्रक्रिया को आधार बनाकर नामांकन खारिज करना कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं माना जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?
सुप्रीम कोर्ट ने अंततः यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि चुनावी प्रक्रिया में इस स्तर पर संवैधानिक अदालतों का दखल सीमित होता है. कोर्ट ने कहा कि चुनाव से जुड़े विवादों के निपटारे के लिए कानून में चुनाव याचिका जैसी अलग व्यवस्था मौजूद है. अदालत ने साफ किया कि नामांकन खारिज होने जैसे मामलों में सीधे रिट याचिका के जरिए हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता. इस फैसले को कांग्रेस के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है.
कांग्रेस के लिए राजनीतिक संदेश भी बड़ा
मीनाक्षी नटराजन का मामला केवल कानूनी विवाद नहीं रह गया था. कांग्रेस इसे लोकतांत्रिक अधिकार और चुनावी निष्पक्षता से जोड़कर पेश कर रही थी. अभिषेक मनु सिंघवी की आक्रामक दलीलों से साफ था कि पार्टी इस मामले को राजनीतिक रूप से भी बड़ा मुद्दा बनाना चाहती है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद फिलहाल बीजेपी को मध्यप्रदेश की राज्यसभा राजनीति में राहत मिलती दिखाई दे रही है.
सुप्रीम कोर्ट ने मीनाक्षी नटराजन की याचिका क्यों खारिज की?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद ऐसे मामलों में सीधे आर्टिकल 32 या 226 के तहत हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता. चुनावी विवादों के समाधान के लिए कानून में अलग प्रक्रिया मौजूद है.
अभिषेक मनु सिंघवी ने कोर्ट में क्या मुख्य दलील दी?
सिंघवी ने कहा कि मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ केवल निजी शिकायत थी और अभी तक अदालत ने संज्ञान नहीं लिया था. उन्होंने कहा कि बिना ‘Charges Framed’ के नामांकन खारिज करना मनमाना है.
इस फैसले का राजनीतिक असर क्या हो सकता है?
यह फैसला कांग्रेस के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. वहीं बीजेपी को मध्यप्रदेश की राज्यसभा राजनीति में मजबूती मिल सकती है. कांग्रेस अब इस मुद्दे को लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर राजनीतिक बहस बनाने की कोशिश कर सकती है.
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सुमित कुमार News18 हिंदी में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं. वे पिछले 4 साल से यहां सेंट्रल डेस्क टीम से जुड़े हुए हैं. उनके पास जर्नलिज्म में मास्टर डिग्री है. News18 हिंदी में काम करने से पहले, उन्ह…और पढ़ें

