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Mamata Banerjee Sonia Gandhi Controversy: टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी का राजनीतिक रुख अब बदल चुका है. कभी कांग्रेस से दूरी बनाने वाली ममता ने दिल्ली में इंडिया गठबंधन की रैली के दौरान मेरी नेता सोनिया जी को मेरा नमस्ते कहकर सबको चौंका दिया. उन्होंने राहुल गांधी को युवा नेता बताया और वामपंथी नेता एम ए बेबी का भी जिक्र किया. बंगाल चुनाव के बाद कांग्रेस के साथ उनकी यह बढ़ती नजदीकियां राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता को मजबूत करने का बड़ा संकेत है.
ममता बनर्जी इंडिया गठबंधन की रैली में सोनिया गांधी के बगल में बैठी नजर आई. (PTI)
नई दिल्ली. भारतीय राजनीति में कब कौन सा पासा पलट जाए, यह कह पाना हमेशा से मुश्किल रहा है. पश्चिम बंगाल की राजनीति में अपनी एकतरफा ताकत के दम पर पहचान बनाने वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख ममता बनर्जी का हालिया राजनीतिक रुख इसी बात का सबसे बड़ा उदाहरण है. एक समय था जब ममता बनर्जी राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पार्टी को पूरी तरह भाव देने से बचती थीं और अपनी क्षेत्रीय ताकत के बूते राजनीति करती थीं. लेकिन दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में ‘वोट चोरी’ के खिलाफ आयोजित इंडिया गठबंधन की महारैली में उनका बदला हुआ और बेहद नरम तेवर सियासत के गलियारों में चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गया है.
‘मेरी नेता सोनिया जी’ से लेकर ‘युवा नेता’ राहुल तक का सफर
मंच पर ममता बनर्जी का अंदाज पूरी तरह बदला हुआ नजर आया. उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत इन स्पष्ट शब्दों के साथ की, ‘‘मेरी नेता सोनिया जी को मेरा नमस्ते.’’ सोनिया गांधी के ठीक बगल में उनकी मौजूदगी और उनके प्रति यह आदर भाव इस बात का साफ संकेत है कि ममता अब कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के साथ अपने रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित कर रही हैं. इतना ही नहीं, उन्होंने कांग्रेस सांसद राहुल गांधी को ‘लड़ाई लड़ रहे युवा नेता’ की उपाधि दी और लंबे समय तक उनकी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के महासचिव एम ए बेबी का नाम मंच से लेकर सबको हैरान कर दिया. इसके अलावा मल्लिकार्जुन खरगे, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव जैसे नेताओं का जिक्र कर उन्होंने मजबूत विपक्षी एकजुटता का संदेश दिया.
पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद क्यों बदली ममता की रणनीति?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी के इस बदले हुए तेवर के पीछे हालिया राजनीतिक परिस्थितियां और रणनीतिक मजबूरियां जुड़ी हैं. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद से ममता का कांग्रेस और उसके शीर्ष नेतृत्व के प्रति यह उदार रवैया अचानक नहीं आया है. एक वक्त था जब बंगाल की जमीन पर कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक को अपने पाले में करने के लिए टीएमसी और कांग्रेस के बीच तीखी बयानबाजी होती थी. राष्ट्रीय स्तर पर भी विपक्षी गठबंधन के भीतर नेतृत्व और सीट शेयरिंग को लेकर मतभेद जगजाहिर थे.
हालांकि, पश्चिम बंगाल चुनावों के बाद जब ममता बनर्जी ने चुनावी प्रक्रिया और परिणामों पर सवाल उठाए, तो कांग्रेस नेता राहुल गांधी खुलकर उनके समर्थन में आगे आए थे. इसके बाद दिल्ली में सोनिया गांधी और राहुल गांधी से ममता की बंद कमरे में हुई मुलाकातों ने दोनों दलों के बीच जमी बर्फ को पिघलाने का काम किया.
विपक्षी एकता और राष्ट्रीय राजनीति के लिए क्या हैं मायने?
ममता बनर्जी का यह यू-टर्न इस बात का स्पष्ट संदेश देता है कि मौजूदा राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में वह क्षेत्रीय आक्रामकता के साथ-साथ व्यापक विपक्षी एकजुटता को प्राथमिकता दे रही हैं. बीजेपी के खिलाफ आगामी बड़ी लड़ाइयों और राष्ट्रीय रणनीतियों को साधने के लिए ममता अब कांग्रेस को दरकिनार करने का जोखिम नहीं उठाना चाहतीं. उनका यह बदला हुआ अंदाज विपक्ष के खेमे में नई जान फूंकने के साथ-साथ यह भी साबित करता है कि राजनीति में कोई भी स्थायी प्रतिद्वंद्वी नहीं होता, समय और जरूरत के हिसाब से समीकरण खुद-ब-खुद बदल जाते हैं.
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पत्रकारिता में 16 वर्षों से अधिक का सुदीर्घ अनुभव रखने वाले संदीप गुप्ता वर्तमान में News18 इंडिया में बतौर चीफ सब-एडिटर होम पेज पर जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. जटिल और सामरिक विषयों को बेहद सरल भाषा में पाठकों त…

