जबकि गांधारी न्यायप्रिय और गलत और सही का आंकलन करने वाली महिला थीं. उनकी जिंदगी लगातार एक के बाद एक दुख आते रहे. पहले तो उनका विवाह ही उनके लिए बहुत बड़ा धक्का था. उन्हें विवाह से पहले तक अंदाज ही नहीं था कि उनकी शादी एक नेत्रहीन शख्स से कराई जा रही है. गांधार की इस राजकुमारी ने जब ये जाना तो वह स्तब्ध रह गईं. कुछ करने की स्थिति में ही नहीं थीं.
शादी होते ही जीवन में लगा पहला झटका
शादी के बाद जब उन्हें मालूम हुआ कि पति नेत्रहीन है, तो वह सकते में आ गईं. उसी समय उन्होंने क्षोभ में ये फैसला लिया कि ताजिंदगी अब अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर रखेंगी. हालांकि ये भी कहा गया कि उन्होंने पति के प्रति निष्ठा और समर्पण के तौर पर लिया. लेकिन कई जगह ये कहा गया कि पट्टी बांधकर उन्होंने जिंदगीभर अपने साथ अन्याय का प्रदर्शऩ किया.
पति के अस्थिर चित्त और स्वाभाव ने दुख और बढ़ाया
तब धृतराष्ट्र के संबंध दासी से बन गए
जब गांधारी गर्भवती थीं, तो धृतराष्ट्र पत्नी की ही एक दासी के प्रति आशक्त हो गए. उससे उनके दैहिक संबंध बने. दासी गर्भवती हुई और उसको युयुत्सु नाम का पुत्र हुआ. गांधारी को जब ये मालूम हुआ तो वह खून का घूंट पीकर रह गई.
गांधारी का जीवन उनके पति धृतराष्ट्र की कमजोरियों, उनके पुत्रों के अनैतिक आचरण, और कुरुक्षेत्र युद्ध में उनकी मृत्यु के कारण दुखों से भरा रहा. (news18)
दुर्योधन और धृतराष्ट्र को कभी समझ में नहीं आई उनकी सलाह
गांधारी ने कई बार धृतराष्ट्र को दुर्योधन के गलत कामों को रोकने की सलाह दी. जैसे पांडवों के साथ अन्याय और द्रौपदी का अपमान लेकिन धृतराष्ट्र ने उनकी बात नहीं मानी. जब दुर्योधन ने पांडवों को लाक्षागृह में जलाने की साजिश रची, तब गांधारी ने इसका विरोध किया, लेकिन धृतराष्ट्र ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की. महाभारत का आदि पर्व (लाक्षागृह पर्व) गांधारी के विरोध का उल्लेख करता है.
महाभारत के युद्ध में सभी 100 पुत्रों के निधन ने गांधारी को दुख में पूरी तरह डूबो दिया. हालांकि बाद के जीवन में भी वह खालीपन और दुख के साथ जीती रहीं. (news18)
गांधारी को मालूम था कि युद्ध होकर ही रहेगा
सभा पर्व में जब दुर्योधन और दु:शासन ने द्रौपदी का अपमान किया तो गांधारी ने इसकी कड़ी निंदा की. धृतराष्ट्र को दुर्योधन को दंडित करने की सलाह दी लेकिन जब धृतराष्ट्र ने कुछ नहीं किया तो गांधारी और दुखी ही हुईं. ये दुख उसकी आशंका को लगातार बढ़ाते थे कि भविष्य में इसका परिणाम बहुत गंभीर होगा. वह आगाह भी करती थी लेकिन कोई नहीं सुनने वाला था.
सभी 100 पुत्र महाभारत के युद्ध में मारे गए
भाई शकुनि की साजिशों को दुख को और बढ़ाया
गांधारी को अगर पति और बेटों ने जिंदगीभर दुखी रखा तो भाई शकुनि ने भी कहीं का नहीं छोड़ा. महाभारत के आखिरी दिनों में गांधारी इस बुरी तरह अपने भाई पर क्रोधित हो उठीं कि उसे भयंकर श्राप दिया. गांधारी ने शकुनि को श्राप दिया कि जिस तरह उसने हस्तिनापुर में द्वेष और क्लेश फैलाया, उसका फल उसको मिलेगा. इस युद्ध में वह तो मारा ही जाएगा बल्कि उसके गांधार में भी कभी शांति नहीं रहेगी.
कहा जा सकता है कि महाभारत में अगर कोई स्त्री वाकई सबसे दुखी थी और उसके हिस्से में हमेशा दुख ही आए तो वह गांधारी थीं. ये भी भाग्य का खेल देखिए कि पुत्रों के निधन के बाद युधिष्ठिर ने धृतराष्ट्र और गांधारी को अपने साथ ही रखा. पर्याप्त आदर दिया. लेकिन वो अपने जीवन में खालीपन और दुख महसूस करते रहे. जब वो अपने जीवन के आखिरी दिनों को बिताने के लिए वन गए और वहां आश्रम बनाकर रहने लगे तो वन में लगी आग ने उन्हें दर्दनाक तरीके से लील लिया.

