कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में जंतर-मंतर पर 49 दिनों तक चले आंदोलन में हर दिन हजारों छात्र जुटे, बड़े नेताओं के भाषण हुए, सरकार और विपक्ष आमने-सामने आए, लेकिन इस पूरे आंदोलन में एक ऐसा चेहरा भी था, जो कभी मंच पर नहीं दिखा, न किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में नजर आया और न ही उसने आंदोलन की अगुवाई की. इसके बावजूद आंदोलन के आखिरी दिनों में वही शख्स सबसे ज्यादा चर्चा में आ गया. प्रदर्शनकारियों के बीच ‘जुनैद भाई’ के नाम से पहचाने जाने वाले मोहम्मद जुनैद की कहानी अब इस पूरे आंदोलन का सबसे चर्चित मानवीय पहलू बन चुकी है.
मंच नहीं, जिम्मेदारी संभाल रहे थे जुनैद
गाजियाबाद के नहाल गांव के रहने वाले मोहम्मद जुनैद CJP के कोई बड़े पदाधिकारी नहीं थे. वे आंदोलन से एक स्वयंसेवक के तौर पर जुड़े थे. उनका काम था जंतर-मंतर पर दिन-रात डटे छात्रों और प्रदर्शनकारियों के लिए खाना, पीने का पानी, दवाइयों और दूसरी जरूरी चीजों का इंतजाम करना.
जब हजारों छात्र धरना स्थल पर मौजूद रहते थे, तब पर्दे के पीछे उनकी टीम यह सुनिश्चित करती थी कि किसी को खाने-पीने या दूसरी बुनियादी जरूरतों के लिए परेशान न होना पड़े. इसी वजह से प्रदर्शनकारी उन्हें सम्मान से ‘जुनैद भाई’ कहकर बुलाने लगे.
आंदोलन के बीच अचानक सुर्खियों में आ गया नाम
कई हफ्तों तक जुनैद केवल व्यवस्थाएं संभालते रहे, लेकिन आंदोलन के अंतिम चरण में उनका नाम अचानक राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया. जुनैद ने आरोप लगाया कि उनके आंदोलन से जुड़े होने की वजह से उत्तर प्रदेश में उनके घर पर पुलिस पहुंची. उनके परिवार का दावा था कि गाजियाबाद स्थित घर की तलाशी ली गई और उनके पिता मुस्तफा को पूछताछ के लिए अपने साथ ले जाया गया. परिवार का यह भी आरोप था कि बैंक पासबुक, पैन कार्ड समेत कुछ दस्तावेज भी अपने कब्जे में लिए गए.
जुनैद की बहन ने आरोप लगाया कि पुलिस उनके पिता पर दबाव बना रही थी कि वे जुनैद को फोन कर दिल्ली से वापस बुलाएं.
मेरठ में रिश्तेदारों को परेशान करने का भी लगाया आरोप
मामला यहीं नहीं रुका. परिवार ने यह भी दावा किया कि मेरठ में रहने वाले उनके रिश्तेदारों को भी परेशान किया गया. हालांकि, मेरठ पुलिस ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया. पुलिस का कहना था कि जिले के किसी भी थाने में जुनैद के रिश्तेदारों को हिरासत में लेने या उनके खिलाफ कार्रवाई का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला है.
यहीं से यह मामला सिर्फ एक परिवार के आरोपों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक बहस का विषय बन गया. एक तरफ परिवार प्रशासन पर दबाव बनाने का आरोप लगाता रहा, तो दूसरी ओर पुलिस लगातार इन दावों का खंडन करती रही.
आंदोलन का ऐसा चेहरा, जिसने कभी माइक नहीं संभाला
दिलचस्प बात यह रही कि आंदोलन के दौरान जहां कई नेता और छात्र प्रतिनिधि लगातार मंच से भाषण देते रहे, वहीं जुनैद शायद ही कभी माइक पर दिखाई दिए. उनकी पूरी भूमिका धरना स्थल की व्यवस्थाओं तक सीमित रही.
लेकिन आंदोलन जैसे-जैसे आगे बढ़ा, वैसे-वैसे ‘जुनैद भाई’ का नाम सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बन गया. कई प्रदर्शनकारियों ने उन्हें उस व्यक्ति के रूप में याद किया, जिसने लगातार 49 दिनों तक धरने पर बैठे छात्रों की जरूरतों का ध्यान रखा.
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद खत्म हुआ आंदोलन
आखिरकार केंद्र सरकार की ओर से कई प्रमुख मांगों पर सकारात्मक आश्वासन मिलने और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद CJP ने अपना 49 दिनों का आंदोलन समाप्त करने का ऐलान कर दिया.
संगठन का कहना था कि सरकार ने परीक्षा सुधारों, प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मामलों की वापसी, आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को सहायता और परीक्षा प्रणाली में बदलाव से जुड़े मुद्दों पर सहमति जताई है. इसके बाद जंतर-मंतर का धरना स्थल खाली हो गया.
लेकिन ‘जुनैद भाई’ की कहानी खत्म नहीं हुई
धरना खत्म होने के बाद जहां आंदोलन के कई चेहरे धीरे-धीरे सुर्खियों से दूर होने लगे, वहीं ‘जुनैद भाई’ की कहानी चर्चा में बनी रही.
उनकी कहानी इस बात की याद दिलाती है कि किसी भी बड़े आंदोलन में सिर्फ मंच पर बोलने वाले लोग ही नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे काम करने वाले स्वयंसेवक भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. खाने-पीने की व्यवस्था से लेकर हजारों लोगों के लिए जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने तक, ऐसे लोग आंदोलन की रीढ़ माने जाते हैं.
यही वजह है कि CJP आंदोलन की चर्चा जब भी होगी, ‘जुनैद भाई’ का नाम उन लोगों में जरूर लिया जाएगा जिन्होंने बिना किसी पद, प्रचार या राजनीतिक पहचान के आंदोलन को जमीनी स्तर पर संभालने में अहम भूमिका निभाई.

