India
oi-Sohit Kumar
Why
World
Leaders
Meet
at
Hyderabad
House:
दिल्ली
में
स्थित
हैदराबाद
हाउस
दुनिया
के
सबसे
ताकतवर
नेताओं
की
मेजबानी
करता
है।
आज,
गुरुवार
4
दिसंबर
को,
रूस
के
राष्ट्रपति
व्लादिमीर
पुतिन
(Vladimir
Putin)
भी
प्रधानमंत्री
नरेंद्र
मोदी
(Narendra
Modi)
के
साथ
अपनी
23वीं
भारत-रूस
(India
Russia)
सालाना
बैठक
के
लिए
इसी
शानदार
इमारत
में
आ
रहे
हैं।
आपने
कभी
सोचा
है
कि
आखिर
क्यों
हर
खास
विदेशी
मेहमान
भारत
आते
ही
अपनी
सबसे
जरूरी
मुलाकातें
यहीं
करते
हैं?
इसके
पीछे
एक
खास
इतिहास,
निजाम
की
शाही
जिंदगी
और
भारतीय
विदेश
नीति
का
मजबूत
कारण
शामिल
है।

शाही
इतिहास:
क्यों
बना
था
निज़ाम
का
ठिकाना?
हैदराबाद
हाउस
का
निर्माण
आज़ादी
से
पहले,
हैदराबाद
रियासत
के
निज़ाम
मीर
उस्मान
अली
खान
ने
करवाया
था।
1920
के
दशक
में,
ब्रिटिश
सरकार
ने
‘चैंबर
ऑफ
प्रिंसेस’
बनाया
था।
जब
राज्यों
के
प्रमुखों
को
इन
बैठकों
के
लिए
दिल्ली
बुलाया
जाता
था,
तो
उन्हें
ठहरने
की
बहुत
दिक्कत
होती
थी।
इसी
कारण
निजाम
ने
दिल्ली
में
अपना
एक
स्थायी
और
भव्य
ठिकाना
बनाने
का
फैसला
किया।
कितना
आया
था
खर्च
यह
महल
राष्ट्रपति
भवन
के
पास
लगभग
12
एकड़
ज़मीन
पर
बना
है।
इसे
बनाने
में
उस
दौर
में
लगभग
50
लाख
रुपये
खर्च
हुए
थे,
जोकि
एक
हैरान
करने
वाला
आंकड़ा
था।
सजावट
के
लिए
बर्मा
से
टीक
की
लकड़ी,
न्यूयॉर्क
से
बिजली
के
सामान,
और
चांदी
के
बर्तन/कटलरी
मंगवाए
गए
थे।
यहां
डाइनिंग
हॉल
इतना
बड़ा
था
कि
एक
साथ
500
मेहमान
शानदार
तरीके
से
भोजन
कर
सकें।
वर्तमान
पहचान:
सुरक्षा
और
ज़रूरी
बैठकों
का
केंद्र
आज़ादी
के
बाद,
यह
संपत्ति
केंद्र
सरकार
के
पास
आ
गई।
1954
में,
विदेश
मंत्रालय
ने
हैदराबाद
हाउस
को
किराये
पर
लेकर
देशों
के
बीच
की
ज़रूरी
बातचीत
के
लिए
इस्तेमाल
करना
शुरू
किया।
समय
बीतने
के
बाद
भी
हैदराबाद
हाउस
की
शानदार
बनावट,
ऊंची
मेहराबें
और
शाही
साज-सज्जा
बरकरार
है।
सुरक्षा
और
प्रोटोकॉल
(नियमों)
के
हिसाब
से
यह
प्रधानमंत्री
की
दो
देशों
के
बड़े
नेताओं
की
आमने-सामने
की
बैठकों
के
लिए
सबसे
अच्छी
जगह
मानी
जाती
है।
यही
वजह
है
कि
दुनिया
का
कोई
भी
बड़ा
नेता
(जैसे
अमेरिकी
राष्ट्रपति,
फ्रांस
के
राष्ट्रपति,
या
व्लादिमीर
पुतिन)
भारत
आते
ही
अपनी
सबसे
अहम
बैठकें
यहीं
करते
हैं।
निज़ाम
ने
क्यों
ठुकरा
दिया
था
अपना
महल?
यह
सच
है
कि
दिल्ली
में
स्थित
हैदराबाद
हाउस
को
1928
में
बनकर
तैयार
होने
के
बाद
भी,
निज़ाम
मीर
उस्मान
अली
खान
ने
इसे
पूरी
तरह
से
खारिज
कर
दिया
था।
भारी-भरकम
खर्च
के
बावजूद,
निज़ाम
को
यह
भव्य
इमारत
पसंद
नहीं
आई,
क्योंकि
उन्हें
यह
यूरोपीय
और
मुगल
शैली
की
‘सस्ती
नकल’
लगी
थी।
रिपोर्ट्स
के
मुताबिक,
उन्होंने
इसकी
तुलना
घोड़े
के
अस्तबल
से
कर
दी
थी
और
इसे
कभी
अपना
घर
नहीं
बनाया।
बाद
में,
1954
में
भारत
सरकार
ने
इस
संपत्ति
को
लीज
पर
ले
लिया
और
1970
के
दशक
में
एक
समझौते
के
तहत
इसे
स्थायी
रूप
से
केंद्र
सरकार
के
अधीन
कर
दिया
गया।
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